मंगलवार, जनवरी 04, 2022

रचना :- सुबोध कुमार झा "झारखंडी"

हास्य-व्यंग्यकार की एक

परिचयात्मक अभिव्यक्ति..!

हे भाई!मैं हूँ सुबोध, 
पर हूँ मैं बड़ा अबोध।
महाविद्यालय में हूँ एक व्याख्याता;
पर साहित्य के सिवाय मुझे कुछ नहीं आता।
पढ़ाता हूँ मैं यहाँ अर्थशास्त्र;
पर जानता कुछ कुछ नीतिशास्त्र।
अंग्रेजी में मैं हूँ पढ़ाता; 
पर मुझे हिन्दी ही भाता।
देखो भैया,मैं हूँ एक कवि;
दिन शुरू करता देख रवि।
मैं शिक्षण संस्थान का व्यवस्थापक;
"संथाल हूल एक्सप्रेस" का सम्पादक ; 
राजनीतिक का हूँ विश्लेषक; 
एक आलोचक या समालोचक।
समसामयिक पर खुब लिखता हूँ;
जैसा देखा वैसा ही बकता हूँ।
थोड़ा-बहुत मैं भी गायक हूँ;
पर हिन्दी साहित्य के लायक हूँ।
मैं हूँ एक हास्य व्यंगकार;
एक छोटा मोटा कलमकार।
हिन्दी,हिन्दू और हिन्दुस्तान;
इसी में ही बसे हैं मेरे प्राण।
बस पढ़ना पढ़ाना ही है काम;
प्रो.सुबोध कुमार झा है नाम।

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अलविदा 2021
भाग-2
यह नववर्ष कहाँ हमारा है?
कैसे कहें यह बड़ा प्यारा है?
नव पुष्प है कहाँ खिला?
नव जीवन यहाँ कहाँ मिला?
बच्चे भी यहाँ टेन्सन में हैं;
परीक्षा के प्रीपरेशन में हैं।
बेचारे की हर एक मस्ती चली गई; 
इधर ठंड में कुछ हस्ती चली गई। 
कैसे कहें यह नववर्ष है?
जीवन का यह उत्कर्ष है।
नववर्ष तो तब ही आएगा;
जब पतझड़ चला जाएगा;
कोयल की कूक आएगी;
प्रकृति में रूत लाएगी।
नये पंचांग फिर आएँगे;
नये आयाम फिर लाएँगे।
नये नये आहार खाएंगे,
खुशियाँ अपार लाएंगे।
इन्तजार हो आएगा पहला चैत्र;
मिल बैठेंगे फिर भाई,बहन,मित्र।
ऐसे ही बातों बातों में लिख दिया; 
अंग्रेजी नववर्ष का विरोध किया।

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अलविदा 2021

भाग-1
आज सुबह सबेरे गया था लेकर;
बिमार 2021को डाक्टर के पास;
शाॅक दे गया यह सूचना देकर;
नहीं बची अब कुछ उसमें आश।
डाक्टर ने कहा बस याद कर लो;
अब महज कुछ घंटे का मेहमान;
दम टुटेंगे इसके 12 बजे रात्रि को;
नहीं बचेगा चाहे आएगा भगवान।
गीता में यही कह गए हैं कृष्णा;
सुनो उसे मिटा अपनी तृष्णा।
क्या लेकर कोई आया है;
क्या लेकर वह जाएगा;
कुछ सत्कर्म करो वही रहेगा;
नहीं तो बस 21की तरह जाएगा। 
यही दुनियाँ की रीत है;
कर लो उनसे ही प्रीत है।
मर जाने दो उसे जो बड़ा बुरा था;
19 ,20 और दो हजार इक्कीस;
भूल जाओ कि क्या हुआ था;
स्वागत करो दो हजार बाइस। 
2022

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स्त्रियों के नामों से तैयार यह हास्य व्यंग की कविता :-

भक्तिभाव में सिर्फ स्त्रियों के ही नाम
माना कि स्त्रियाँ हैं करती अधिक भक्ति;
उन्हें हमसे हैं सदा मिलती अधिक शक्ति।
पर पता नहीं क्यों भक्तिभाव में सदा,
होते रहे हैं सिर्फ स्त्रियों के ही नाम;
इसलिए रहते आए हैं हम सदा खफा,
क्या हमारा यहाँ है नहीं कोई काम?
क्या सिर्फ स्त्रियाँ ही हैं करती "पूजा"?
क्या ईश्वर के लिए हम हैं कोई दूजा ?
क्या उन्हीं के ही नाम होती "अराधना"?
क्या सिर्फ उन्हीं की पुरी होती "मनोकामना"?
क्या अपने वश की बात नहीं "अर्चना"?
क्या हम नहीं कर सकते कुछ "अर्पणा"?
क्या हम सिर्फ बनाए उनके लिए नाश्ता?
मेहनत करें हम और वो खाए पाश्ता।
क्या नहीं निकले यहाँ अपना कोई रास्ता?
क्या भगवान पर अपनी नहीं है "आस्था"?
अच्छा सिर्फ तुम ही सजाओ थाल "आरती" का;
पर मैं तो सदा गुणगान करूँ माँ "भारती" का।
तुम ही बनो ईश्वर की कोई "आराध्या";
तुम ही गावो नित्य माँ की "संध्या"।
पर चाहे दिन हो या हो घोर "निशा";
चाहे दोपहर हो या हो पहली "उषा"।
मेरे तो मन मंदिर में सदा बसे हैं राम;
अर्पित करूँ "पुष्प" हम सुबहो शाम। 
अर्पण करूँ अपना "श्रद्धा" "सुमन";
सदा सुन्दर "सुबोध" हो अपना अंतर्मन।
भक्तिभाव में हो सदा अपनी "जागृति";
बनी रहे ऐसी "भावना" व अपनी "प्रकृति"।
देखो! दिखावे में हम नहीं हैं जाते ;
ईश्वर खुद ब खुद हैं अपने पास आते।

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 ~: खतरनाक हास्य :~
पहली बार गया ससुराल..!
 
पहली बार की थी मैं शादी;
कर ली थी खुद की बर्बादी;
नयी नवेली आयी शहजादी; 
फिर बढ़ी घर की आबादी।

मैंने बात कहाँ थी मानी;
मैंने शादी करने की ठानी;
थोड़ा घर का था मैं बुद्धू ;
करता था अपनी मनमानी।

शादी भी उसी का हिस्सा था;
जीवन का विचित्र किस्सा था;
कर लो तो भी पछताओ;
नहीं करो फिर भी पछताओ।

जब पहली बार गया ससुराल; 
सालों ने कर दिया बुरा हाल;
सह देती थी मेरी घरवाली;
मैं तो वहाँ हो गया बेहाल।

घरवाली तो थी ही घरवाली; 
कुछ और आ जातीं बाहरवाली;
खुद मिलीभगत उनकी भी होती;
मुर्ख बनाती फिर देती ताली।

घरवाली थी बड़ी मतवाली; 
पर नकचढ़ी मिली थी साली;
उपर से एक बदमाश साला;
बात बात पर देता गाली।

बीबी तो बीबी होती है;
साली बिना नहीं ससुराल;
सरहज तो मिश्री होती है;
पागल साला करे बेहाल।

यदि पड़ोस में हो ससुराल;
तो भैया हो जाओ पैमाल;
बात बात में सास पहुँचकर;
कर दे मम्मी का बुरा हाल। 

साला साली खुब गरियावे;
नित्य नए कपड़े सिलवाए;
रोज सबेरे घर पहुँचकर;
तैयार भोजन चटकर जाए।

तंग तंग कर दिया उनलोगों ने;
रंग में भंग कर दिया उन सालों ने।
गया था पहली बिदागिरी कराने;
पत्नी वहीं थी गया था लाने।

पहली बिदाई को ही कहते गौना;
लेकिन बनके रह गया था बौना।
दरअसल मैं बिना मिठाई गया था;
इसीलिए वहाँ खटाई मिला था।

सौ बात की ये बात याद रखना;
बिना मिठाई ससुराल न जाना।
तब तुम फिर इज्जत पाओगे;
नहीं तो मेरी तरह भुगते जाओगे। 

लोग मुझे कहते प्रोफेसर;
पर पत्नी से रहता डर-डर;
कोरोना बन आयी है साली;
इसीलिए रहता हूँ मैं घर पर।

जो भी हो देखो भईया; 
जबसे मैं बना था सईंया;
पहले था मैं बड़ा "अबोध";
अब जाके मैं बना "सुबोध"।


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खतरनाक हास्य :- एक पड़ोसन जल मरी..! 

क्या बताऊँ एक दिन की बात;
शायद बीत रही थी आधी रात; 
तभी पड़ोस में खटपट शुरू हुई;
देखा चल रही थी *मुक्का लात*।

सभी पड़ोसी घर झाँक रहे थे;
दम्पत्ति खुद को ही आँक रहे थे;
रूकने का तो बस नाम नहीं था;
दोनों एक दुसरे को भाँप रहे थे।

झगड़ा दोनों का बढ़ता गया;
एक दुसरे पर थे अड़ता गया;
दम्पत्ति खुद का घर फोड़ रहे थे;
एक दूसरे का दिल तोड़ रहे थे।

एक पड़ोसन को पूरव पश्चिम याद आया;
उसने उसी फिल्म का एक गाना बजा दिया-

"कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे;
तड़पता हुआ जब कोई छोड़ दे;
तब तुम मेरे पास आना प्रिये;
मेरा दर खुला है,
खुला ही रहेगा तुम्हारे लिए।"

तभी दृश्य कुछ उलट हुआ,
पत्नी का कायापलट हुआ,
एकदम सन्नाटा सा छा गया,
अब पत्नी को पति था भा गया।

देख पड़ोसन जल मरी,
आज उसी से थी डरी,
दरवाजा खिड़की सब बंद हुआ,
अब पति को थी रिझाने चली।

अब पत्नी की ही बारी थी,
वही किसी गाना की तैयारी थी,
उसे खानदान फिल्म याद आया,
फिर वही गाना था बजा दिया -

"तुम्हीं मेरी मंदिर,
तुम्हीं मेरी पुजा,
तुम्हीं देवता हो,
तुम्हीं देवता हो।"

रचना में पति की जीत हुई;
पति की पत्नी थी मीत हुई;
एक काली रात थी चली गई;
जो थी बीत गई सो बात गई ।

कवि भी पति रूपी एक प्राणी है,
सो उसकी पति पक्ष में वाणी है,
संगीत से खुद में शक्ति भरो,
और अपने पति की भक्ति करो।

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एक देखा जो सुन्दर गोरी
एक देखा जो सुन्दर गोरी;
पता नहीं कहाँ की छोरी;
दिल थाम देख दंग रह गया;
मन को मोह गयी थी मोरी।

मृगनयनी सी तेरी अंखियाँ,
इशारों में कहे सारी बतियाँ,
मासूम परी सी सबसे अच्छी,
जितनी भी थी तेरी सखियाँ।

मत जाना तुम कोई गाँव;
रहना सदा तुम प्रेम की छाँव;
मत जाना तुम कहीं धूल में;
छिल जाए बस तेरे पाँव।

मत जाना तुम कहीं धूप में,
मुर्झा आ जाए तेरे रूप में,
आ चल देता मैं अपना ठाँव,
एक सुन्दर सा हो अपना गाँव।
एक सुन्दर सा हो अपना गाँव।

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कबाड़ीवाला..!

अब क्या जमाना आ गया,
पुरानी यादें बिसरा गया;
कुछ बात पहले की ऐसी थी,
वो याद दिलाकर चला गया।

हर साल दिवाली के पहले;
एक कबाड़ी वाला आता है;
टुटे फूटे सामान जो निकले;
घर से आकर ले जाता है।

कुछ फटी पुरानी चीजों को,
वह साथ लेकर जाता है;
बदले में चंद सिक्कों को, 
पाॅकेट में छोड़कर जाता है।

क्या कभी ऐसा भी कोई आएगा,
जो टुटे फूटे दिल को ले जाएगा?
बदले में दो मीठे बोल बोलकर;
भूली बिसरी यादों को दोहराएगा?

इस साल वह फिर से आएगा,
फिर वही बात दोहराएगा;
अबकी उस टुटे दिल को देखना;
बस वह फिर से जोड़ जाएगा।

जीवन में कई दाव देखे जाते हैं
जो हर दिल को तोड़ जाते हैं
कई ऐसे घाव दिए जाते हैं
जो हर रिश्ते को छोड़ जाते हैं।

बिखरे सामानों में जो देखा,
एक डुगडुगी बजाती गुड़िया थी;
उसी सामानों में था फेका,
वह दिल जोड़ने वाली बुढ़िया थी।

मैंने उसे घर उठा लाया ,
अपने टुटे दिल की बात बताया;
बस वही पुरानी याद जो आयी,
एक आह उठी बस मन भर आया।

एक दिन ऐसा भी आएगा;
जब हर रिश्ता छोड़ जाएगा;
जब होगा हर रिश्ते का तेल खत्म; 
तो समझो जीवन का खेल खत्म।

जीवन भी एक खिलौना है;
बस हँसते हुए बिताना है;
जब तक जियो शान से जियो;
फिर तो कबाड़खाना ही जाना है।

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आलेख :- रब नवाज़ आलम نامنگار :- ربنواز عالم

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