दीपावली है दीपावली..!
प्रति वर्ष आती और जाती दीपावली,
न तम हुआ दूर, न रौशन हुई जग सारी,
जहाँ था उजाला, वहाँ है तम भारी,
बहुत दीप जला, दूर हुई न रात काली।
क्या मनुज अपने भीतर के तम को जलाएगा ?
क्या कभी भूमि से अंधियारा मिट पाएगा ?
या यूँ ही दीप अकेले जलता रह जाएगा ?
ईर्ष्या- द्वेष की छाया उरों में भरा है,
इसे मिटाओं जो दिलों पर अड़ा है,
दीप जलाओं, निशा भगाओं,
किंचितों को कभी तो हंसाओं ।
प्रति वर्ष आती और जाती दीपावाली,
दिलों का दीप जला न अभी तक,
कैसे होगी खुशियों की दीपावली ?
दीया से अगर मिट जाता अंधेरा,
मन में सिर्फ स्नेह ही रह जाता,
दीन- हीन- शोषित सब गाता,
दीपावाली है दीपावली वो गुनगुनाता,
जलता दीप और मनुज मुस्कुराता,
चारों ओर खुशियाँ जगमगाता,
तब दीपावली त्यौहार सफल हो पाता,
प्रति वर्ष आती और जाती दीपावली,
होता जग में खुशियाँ भरी दीपावली |
**************
कभी आना मेरे गांव के गलियों में..!
मेरे गांव के गलियों में-
पेड़ों की फुनगियों में,
रिश्तों के बंधन में,
शुद्ध हवा झोकों में
आम के बगीचों में,
कोयल की कूक में,
दोपहरी के धूप में,
घर में, आंगन में,
माँ की लोरी में,
दादी की गोदी में,
गीत में, संगीत में
त्यौहारों में, तीज में
कभी आना........
मेरे गांव के गलियों में-
सुबह के भोर में,
पक्षियों के शोर में,
हर रिश्ते-नाते में ,
पीपल के छांव में,
मुहल्लों में, घाटों में,
मंदिरों के घंटियों में,
बरगद के झूलों में,
सरसों के फूलों में,
चना के गुच्छों में,
गेहूँ की बाली में,
सूरज की लाली में,
कभी आना........
मेरे गाँव की गलियों में,
धूप में , दीप में,
शंख की फूक में,
यज्ञ की महक में,
पक्षियों की चहक में,
खेतों में,खलिहानों में,
चाय की छोटी दुकान में,
कभी आना.....
मेरे गाँव की गलियों में-
गायों के झुण्डों में,
रिश्तों के संगों में,
होली के गीतों में,
दोस्तों की टोली में,
अपनों के प्रीत में,
सखा- सहेलियों में,
बचपन के यादों में,
काजू की डालियों में,
साइकिल के पहियों में,
जेष्ठ की गरमी में,
पेड़ों की छाओं में,
माघ की ठंडी में,
अग्नि के घेरे में,
बसंती बहार में,
सावन की फुहार में,
कभी आना........
मेरे गाँव की गलियों में-
*******************
कविता :- हृदय की चोट..!
पूरब - पशिचम एक कर डालो,
पर कभी ऐसा हुआ होगा,
कि अंधेरे ने सूर्य को उगने न दिया होगा ?
चाहे जितना जोर लगा लो,
पूरी फुलवारी को उजाड़ डालो,
पर कभी ऐसा हुआ होगा,
कि हवा ने सुगंध को फैलने न दिया होगा ?
चाहे जितना जोर लगा लो,
उड़ते परिंदों को घायल कर डालो,
पर कभी ऐसा हुआ होगा,
कि परिंदों ने उड़ना छोड़ दिया होगा ?
चाहे जितना जोर लगा लो,
आत्मसम्मान को चोट कर डालो,
पर कभी ऐसा हुआ होगा,
कि अमित लड़खड़ा के संभला न होगा ?
चाहे जितना जोर लगा लो,
शब्द वाण से भेद कर डालो,
पर कभी ऐसा भी हुआ होगा,
कि हृदय की चोट स्नेह से न भरा होगा ?
********************
कविता :- मयखाने में..!
मयखाने में,
आते हैं लोग |
मयखाने में
गम को.........
पी जाते हैं लोग |
मयखाने में,
बेहोश होकर,
होश में आते हैं लोग |
मयखाने में,
दुख, दर्द,
भूल जाते हैं लोग |
मयखाने में,
अमीर- गरीब,
एक हो जाते हैं लोग |
मयखाने में,
दिल की बात,
लब पर ....
लाते हैं लोग |
मयखाने में,
मैं को छोड़़ .....
आतें है लोग |
************
कविता :- राही..!
अभी रुकना तेरा काम नहीं,
क्षणिक हार से क्यों घबराना ?
अब मंज़िल ज्यादा दूर नहीं |
समय गुजरता जाता है,
इसमें किसी का जोर कहाँ ?
जो मेहनत करते हैं यहाँ,
होते हैं वह कमजोर कहाँ ?
धावक है तू, क्यों लड़खड़ा रहा ?
तुम- सा वीर ऊर्जस्वित कहाँ ?
पगडंडी वही है कांटों वाली,
अब रुकना तुम्हें मंजूर कहाँ ?
तू नदी अविरल धारा है ?
अभी ठहरना है तुम्हें मना,
अवश्य मंजिल तुम्हें मिलेगा ?
पथ की कर पहचान यहाँ ?
नए जुनून से आगे बढ़ना,
आत्मविश्वास को न डिगाना,
हाॅं ! जीवन की नीरवता में ,
एक दिन खिलेंगे फूल यहाँ |
********************
क्यों भटक रहे हो राहों में..!
आ जाओं कवि के भावों में,
झंझावातों में, शैलों में,
भू,तरंगिणी, मारुत, गगन में,
समीर- सा भटकता रहता तू,
बादलों से घिरता रहता तू,
गरीबी राह भटकायेगा,
तुम्हें कोई पहचान न पायेगा,
तू पत्थर- सा बन जाएगा,
नदियों- सा खुद राह बनाओं,
पथिक बनकर पगडंडी बनाओं,
तब अपने भुजबल से खुद,
नया इतिहास बनायेगा,
क्यों भटक रहे हो राहों में,
आ जाओं कवि के भावों में |
ऊँची इमारत देखों तुम,
परिश्रम करना सीखों तुम,
चिड़ियों- सा घोसला बनाओं,
माली बन कर फूल खिलाओं,
जब काली रात डरायेगा,
कोई तुम्हें खरीदने आयेगा,
जब कोई खरीद न पायेगा,
साम, दाम, दण्ड, भेद, अपनायेगा,
क्यों भटक रहे हो राहों में,
आ जाओं कवि के भावों में |
समय को कोई न बांध सका?
भास्कर को कोई न छान सका?
खुशबू को कौन रोक पाया है?
खग को कौन टोक पाया है?
जब- जब उदासी छायेगी,
प्रिय कवि को साथ पाओगे,
जब तुम खुश हो जाओगे,
सारी दुनिया खुश पाओगे,
फूलों में जो भी सोता है,
कांटों में चल नहीं पाता है,
तू कुछ ऐसा करता चल,
धूल में रहकर पलता चल,
क्यों भटक रहे हो राहों में,
आ जाओं कवि के भावों में |
*************************
कविता :- वाग्देवी..!
उल्लास था संगीत का,
प्रकृति के रंगों में,
रंगने का अवसर था,
वाग्देवी की अराधना में,
व्यस्त थी सरसों |
मस्त थी अलसी,
आम्र की मंजरियां,
चारों ओर सुगंध फैला रही थी |
कोयल मधुर स्वर से,
शंखनाद कर रही थी |
माँ भारती वीणा बजा रही थी |
फिर तितलियों ने चहलकदमी की,
भौरों ने नृत्य- संगीत किया,
फुलवारी संगीतमय हो गया,
अतिथियों का आना- जाना लग गया |
जब प्रकृति सब कुछ लुटा रही थी,
अपना मधुरामय ममत्व,
संसार सोया हुआ था,
भौतिकता में खोया था |
तभी माँ एक संदेश दे गई,
उन तमाम राही को,
जिसे आगे चलना था,
मैंने देखा माँ कुछ खामोश थी,
जाते- जाते कह गई,
बसंत का आगमन नवजीवन का....
संचार था आगे हरियाली का.....
*************
कविता :- पूस की ठंड..!
चारों ओर हवाओं की विसात,
इतनी लंबी काली रातें,
आकाश के तल सूना लागे,
चुप-चुप सब कोई जागे- सोवें,
न सूर्य में गर्मी, न प्रकृति में खुशी,
चारों ओर लगता है सिर्फ उदासी,
न चिड़ियाँ की फुदकन,
न भौरों की गुनगुन,
फिजाओं में हैं सिर्फ सूनापन,
रातों में जागे दिखता गरीब जन, ,
ठिठुरता दिखाई देता उसके कई अंग,
न है कोई साथ- संग,
न है कोई महजब,
न है कोई धर्म,
है तो सिर्फ पूस की ठंड,
न आग है, न अलाव है,
कांपता पूरा आसमान,
एक कपड़ा बची नहीं,
ठंड में भी वो फटी नहीं,
जमीर अभी जिंदा है,
फिर क्यों शर्मीदा है ?
कोई आता एक कंबल दे जाता,
कोई आता एक रोटी दे जाता,
रोजगार कोई दिया नहीं,
जनता का विकास किया नहीं,
लूटने में सब मस्त है,
अपने लिए सब व्यस्त है,
मतदान अभी आया नहीं,
इसलिए तो पूस की ठंड पर,
नेताओं का ध्यान गया नहीं |
*********************
कविता :- चलना ही होगा..!
मुश्किल है मगर,
चलना ही होगा,
जीवन में पतझड़,
पतझड़ में बहार,
नव सृजन का भरमार,
चलना ही होगा |
फटी दरारें,
सूखी नदियाँ,
ठूढा आम,
खामोश चिड़ियाँ,
भष्ट्राचार शासन,
किंकर्तव्यविमूढ़ जनता,
शासक से सवाल,
करना ही होगा,
चलना ही होगा |
फटी एड़ियाँ,
चिपटे गाल,
धंसी आंखें,
दुबके उदर,
जीना ही होगा,
चलना ही होगा |
****************
कविता :- कृतिमान..!
मन के घावों से कहना ,
निरंतर आगे बढ़ना है,
फटी एड़ियों से न डरना |
राहों में कांटे बहुत मिलेंगे,
हृदय के चुभन कांटे होंगे,
गिरते - पड़ते- चलते जाना,
निज घावों को भरते जाना |
शूल देख मन विचलित होगा,
प्रसून से लक्ष्य नजदीक लगेगा,
जब दृग से नेत्रनीर बहेंगे,
तभी तो नया कृतिमान गढेंगे |
तप- तप कर निखर जाना,
कनक के भ्रांति चमक जाना,
आग से तपकर पक जाना,
चट्टान- पर्वत में राह बनाना |
अंगारों पर चलना होगा,
लाक्षागृह में जलना होगा,
श्रम से जीवन सुन्दर होगा,
नीलगगन में आंगन होगा |
हृदय जब व्यथित करेगा,
अंतर्मन में चिंगारी होगा,
बाहर एक खामोशी होगा,
अंदर से तूफ़ान बनेगा |
दहक- दहक कर जलना होगा,
निज हाथों से गढ़ना होगा,
अग्नि कुंड में तपना होगा,
तब स्वयं नया रुप धरेगा,
चारों ओर नवगीत बजेगा |
*********************
कविता :- लक्ष्मण रेखा..!
तब - तब किसी जेहादी से मुलाकात हुई,
माता- पिता से विश्वासघात कर,
जीना अपना दुश्वार किया,
लव जेहादी पर एतबार की,
लक्ष्मण रेखा पार हुई,
टुकड़े पैतीस बार हुई |
उन हाथों को तुम छोड़ चली,
जिसने तुम्हें चलना सिखाया,
पग आंगन से निकाल तू,
काल के गाल में चली गई,
एक जेहादी से छली गई,
लक्ष्मण रेखा पार हुई,
टुकड़े पैतीस बार हुई |
क्या मिला लड़कियों सोचना ?
न जीवन मिला,न मौत मिली,
ये कैसा तुम्हारा हाल हुआ ?
लव जेहादी पर एतबार की,
लक्ष्मण रेखा पार हुई,
टुकड़े पैतीस बार हुई |
सब कुछ भूल जाना तुम,
माँ- बाप का प्यार न भूलना,
जिसने हाथ पकड़ कर चलना सिखाया,
उन हाथों को कभी न छोड़ना,
लव जिहादी पर एतबार की,
लक्ष्मण रेखा पार हुई,
टुकड़े पैतीस बार हुई |
***********************
कविता :- जिम्मेदारी का भार..!
जा रहा था मैं माॅर्निंग वाॅक,
रास्ते में देखा लाचार विवश,
सिर में तीन-चार लम्बी बांस लिए,
अंधेरे में छ: किलोमीटर सफर तय किए,
बांस से ज्यादा जिम्मेदारी का था भार,
दुर्गम गिरि परिहास कर रहा था अपार,
नंगे पांव से भूमि नाप रहा थे,
बच्ची, महिलाएं और पुरुष थे कतार,
चेहरे में न थे उनके,भार का आभास,
ठंडी हवाएँ उन्हें संगीत सुना रहा थे,
जब मैं माॅर्निंग वाॅक से वापस आ रहा था,
वे सभी बांस बेचकर घर जा रहे थे,
आपस में बात- चीत कर रहे थे,
चेहरे पर परिवार का मुस्कान लिए,
पास में थे कुछ पैसे और समान लिए ,
उन्हें देखकर मेरा मन प्रफुल्लित हुआ,
क्योंकि जल्दी ही उनके बांस बिक गया |
************************
कविता :- अपने आप से संघर्ष..!
निराशा की घूटे पिये जा रहा हूँ,
मंजिल की खातिर चले जा रहा हूँ,
सफलता की ख्वाबें पाले जा रहा हूँ ,
अपने आप से संघर्ष किए जा रहा हूँ |
डगर टेढ़ी है चले जा रहा हूँ,
एक-एक कदम बढ़ाएं जा रहा हूँ,
खुद से रास्ते बनाए जा रहा हूँ,
एक लक्ष्य मन में पाले जा रहा हूँ,
अपने आप से संघर्ष किए जा रहा हूँ |
गिरता हूँ, उठता हूँ, संभलते जा रहा हूँ,
मंजिल पाने की कोशिश किए जा रहा हूँ,
आंखों में स्वप्न लिए चले जा रहा हूँ,
आशा की दीप जलाएं जा रहा हूँ,
अपने आप से संघर्ष किए जा रहा हूँ |
राह मुश्किल है संभलते जा रहा हूँ,
जीत के लिए प्रयास किए जा रहा हूँ,
उदासी में भी हसे जा रहा हूँ,
मंजिल की खातिर चले जा रहा हूँ,
अपने आप से संघर्ष किए जा रहा हूँ |
होठों पे उमंग लिए बढ़े जा रहा हूँ,
कभी भाग्य से लड़े जा रहा हूँ,
कभी ख्वाबों में जिए जा रहा हूँ,
निरंतर मेहनत किए जा रहा हूँ ,
अपने आप से संघर्ष किए जा रहा हूँ |
*********************
कविता :- मैं एक नन्हीं दीया..
उजाला करने आई हूँ,
किसानों के घर को,
स्वर्ग बनाने आई हूँ |
मैं एक नन्हीं दीया,
मुस्कान देने आई हूँ,
मजदूरों के घर को,
रौशन करने आई हूँ |
मैं एक नन्हीं दीया,
खुशियाँ लेकर आई हूँ,
बेरोजगार के घावों पर,
महलम लगाने आई हूँ |
मैं एक नन्हीं दीया,
उम्मीद जगाने आई हूँ,
आशा और विश्वास को,
दिलों में जगाने आई हूँ |
मैं एक नन्हीं दीया,
प्रकाश- पुंज बनकर आई हूँ,
सरहद पर खड़े सैनिकों को,
देश की ओर से बधाई देने आई हूँ |
************************
कविता:- छोटी-सी दीप..!
मुझ पर खूब स्नेह लुटाओं,
बाती की मैं नन्हीं दीया,
घी से मुझे स्पर्श कराओं |
मुझे खरीदों, उपहार दो,
अपनों की आभास कराऊंगी,
हाथों के छुअन से,
खुशियों से पहचान कराऊंगी |
उम्मीदों की रोशनी हूँ,
दीन-हीनों की खुशहाली हूँ,
मुझे प्रज्ज्वलित कर,
अपने घर को स्वर्ग बनाओं |
दीवाली की दीप पर्व में,
घर- घर दीप जलाते हैं,
प्रेम, अपनत्व, भाईचारा का,
सबको संदेश सुनाते हैं |
दीया बनाने वाले,
अभी भी अंधेरे में सोते,
और उनके बच्चे,
सिसक- सिसक कर रोते,
एक दीया इनके घर जलाएं
थोड़ी -सी खुशियाँ दे जाएं |
रौशन करूँगी तेरी आलय,
आज बन जाएगा देवालय,
मिट्टी का दीप खरीद कर,
गरीबों को मुस्कुराहट दे जाना,
इस दीवाली पटाका नहीं,
दीन- हीनों को भोजन कराना |
मैं मिट्टी की छोटी -सी दीप,
मुझे पर खूब स्नेह लुटाओं,
तेरी आंगन आज सजेगी,
जगमग होगी सबकी दीवाली |
*******************
लापरवाह सरकारी तंत्र..!

मैं और मेरे जैसे लाखों लोग सरकारी व्यवस्था से प्रतिदिन रूबरू होते हैं, लेकिन आत्मस्वार्थ के कारण सरकारी तंत्र को नजरअंदाज करते हैं | जब भी सरकारी कार्यालयों का चक्कर लगाते हैं तो कुछ सरकारी कर्मचारी दफ़्तर में बैठकर कुर्सी तोड़ने का काम कर रहे होते हैं | वे अपने काम के प्रति जवाबदेह क्यों नहीं होते ? जनता द्वारा दिए गए काम दस- पन्द्रह दिनों में करके दे देना चाहिए, वो काम महीनों तक दफ़्तर के फाईलों में धूल फाक रहे होते हैं | आम जनता सरकारी दफ़्तर के चक्कर लगाते- लगाते थक हार कर बैठ जाते हैं |
सरकार द्वारा ऐसे कामचोर कर्मचारियों को चिन्हित करके जबरन सेवामुक्त कर दिया जाना चाहिए | जो लोग काम करना नहीं चाहते हैं सरकार उन्हें जबरन सरकारी दामाद बनाकर रख रहे हैं | जिससे वो सही तरीके से काम करने के इच्छुक नहीं होते हैं | और जो युवा काम करना चाहते हैं , जिसमें काम करने की ललक है, जज्बा है , वो काम के लिए वर्षो से भटक रहे हैं |
प्रत्येक सरकारी दफ्तर में सत्तर प्रतिशत कर्मी कामचोर हो जाते हैं | उम्र के साथ ऐसे कर्मी को सम्मान के साथ सेवामुक्त करके स्वस्थ जीवन जीने के लिए प्रोत्साहन करना चाहिए, ताकि उनके स्थान पर युवा पीढ़ी जनता के काम को अपना उत्तरदायित्व समझकर ससमय पूरा कर सके |
प्रत्येक सरकारी विभागों में वर्षो से उम्रदराज लोग या आलसी लोग जोर- जबरजस्ती अपनी नौकरी को सिर्फ पूरा करना चाहते हैं, उन्हें जनता के काम से कोई सरोकार नहीं, वैसे कर्मी के स्थान पर युवा कर्मी की बहाल करने की व्यवस्था की जानी चाहिए|
प्रत्येक सरकारी विभाग में व्यवस्था लचर हो गई है | वैसे लोगों के हाथ में जिम्मेदारी है जिसमें काम करने की कोई इच्छा शक्ति नहीं है | और जिन्हें काम करने की इच्छा शक्ति है, वो एक नौकरी के लिए मारा- मारा फिरते हैं |
सरकार के लगभग सभी विभागों में ऐसे- ऐसे लोगों के हाथ में शक्ति है, जिन्हें सिर्फ पैसे से मतलब है जिम्मेवारी से नहीं | सरकारी चापाकल खराब पड़े हैं, उन्हें देखने वाले कोई नहीं | सरकारी ट्रांसफर्मर खराब पड़े है, उन्हें कोई मरम्मत करवाने वाला कोई नहीं | टंकी से दिन- रात पानी बहता जाता है, लेकिन इन विभागों के कर्मी को खराब पड़े चीजों को ठीक कराने की कोई रुचि नहीं है | सरकारी भवनों में बारह महीने टंकी के पानी रीसने के कारण करोड़ों का बिल्डिंग ढह जाते हैं, इन बिल्डिंग को देखने वाला कोई कर्मी नहीं | स्कूल- काॅलेजों के साथ- साथ अन्य सभी सरकारी भवनों की स्थिति देखभाल के अभाव में ध्वस्त होने के लिए संबंधित विभाग के अधिकारी को जिम्मेवार माना जाना चाहिए | सरकार के करोड़ों के फंड को मरम्मत के नाम पर डकार जाते हैं, लेकिन बर्बाद होते सरकारी संपत्ति को बचाने का जिम्मेदारी कोई उठाना नहीं चाहते |
बदलाव युवा और काम करने वाले की इच्छा शक्ति रखने वालों लोगों से संभव है, कुर्सी तोड़ने वाले लोगों से नहीं | सरकार को इस विषय पर बुद्धिजीवियों द्वारा गहन चिंतन- मनन कर एक विकासवादी रास्ता अपनाना चाहिए, जिससे समाज, राज्य और देश के नागरिकों का कल्याण हो सके |
*********************
कविता :- शरद पूर्णिमा..!
सज - सवर कर आई,
चारों ओर चांदनी की आभा छाई,
चलों आज चांद का दीदार करते हैं,
शरद पूर्णिमा की रात में गुनगुनाते हैं |
आज राधा की कृष्णा,
यमुना तट पर महारास रचायेंगे,
वंशी बजाकर गोपियाँ बुलायेंगे,
चन्द्रमां की प्रकाश से यमुना झुमेगी,
कृष्ण संग गोपियाँ आज फिर नाचेगी |
आज लक्ष्मी की पूजा होगी,
खीर का महाभोग लगेगा,
चन्द्रमां के दर्शन से,
हृदय में शीतलता छायेगी,
कृष्ण संग गोपियाँ आज फिर नाचेगी |
शरद पूर्णिमा में खुशहाली होगी,
लक्ष्मी की बरसात होगी,
अमृत दुग्ध धरा बहेगी,
आसमान से शीतलता बरसेगी,
कृष्ण संग गोपियां आज फिर नाचेगी |
*********************************
भक्ति गीत :- तेरी चरणों में पुष्प चढ़ाऊँ माँ..!
दुष्टों का संहार करती शेरोवाली माँ,
सृष्टि की रक्षा करती देवी माँ,
कहलाती जगत जननी अंबे माँ |
भक्तों का कल्याण करती दुर्गा माॅं ||
महिषासुरमर्दिनी चंडमुंडविनाशिनी,
अस्त्र और शस्त्र से सुसज्जित माँ,
आदिशक्ति अवतार लेकर आई माँ,
ऋषि- मुनियों में खुशियाँ छाई माँ |
भक्तों का कल्याण करती दुर्गा माॅं ||
लाल चुनरियां वाली सिंहवाहिनी माँ,
सबकी दु:ख-कष्टों को हरने वाली माँ,
नौ रूप धारण करने वाली दुर्गा माॅं ,
कर जोड़ करुं तुम्हारी आरती देवी माँ |
भक्तों का कल्याण करती दुर्गा माॅं ||
तेरी चरणों में पुष्प चढा़ऊॅं माँ,
अपने नयनों में तुमको बसाऊॅं माँ,
तेरी चौखट में दीप जलाऊॅं माँ,
मेरी खुशियों से झोली भर दो माँ |
भक्तों का कल्याण करती दुर्गा माॅं ||
सिंह की सवार करती शेरोवाली माँ,
भक्तों का कल्याण करती दुर्गा माँ ||
*************************
भक्ति गीत :- माँ के नौ रूप..!
माँ के अलावे कोई न दूजा |
ब्रह्मचारिणी माँ है अम्बे,
बाएं हाथ में कमंडल धारे |
तीसरे दिन माँ चन्द्रघंटा पूजन,
मस्तक पर अर्द्धचंद्र दर्शन |
कूष्माण्डा माता मंद हंसी,
चारों ओर ब्रह्मांड में उल्लासी |
स्कंदमाता की चार भुजाएँ,
असूरों का बाजू उखाड़े |
कात्यायन ऋषि की पुत्री कात्यायनी,
भक्तों को मनचाहा वर देने वाली |
कालरात्रि माँ की जो पूजा करे,
शुभ फलदायी माँ को कहा जाएं |
महागौरी माँ श्वेताम्बर कहलाई,
भक्तों को अमित फलदायी |
सिद्धिदात्री माँ से सिद्धियाँ पाएं,
जो करे विधिवत माँ की पूजा,
सब मनोरथ पूर्ण हो जाएं |
******************
श्री की मूरत है बेटियां..!
शंख की ध्वनि और पूजा की थाल है बेटियां,
भक्ति की आराधना और समर्पण की मिसाल है बेटियां,
माँ की ममता और पिता की लाडली है बेटियां,
ईश्वर का उपहार और नौ रूपों की अवतार है बेटियां,
अर्पण और तर्पण निभाती है बेटियां,
रिश्तों की मजबूत नींव बनाती है बेटियां,
आंगन में तुलसी बन महकती है बेटियां,
प्रकृति की जीवन और झंकार है बेटियां,
सभ्यता और संस्कृति की पहचान है बेटियां,
आदि शक्ति और नारायणी स्वरूपा है बेटियां,
दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी अनेक रूपों में पूजनीय है बेटियां,
समृद्धि और सौन्दर्य की परिभाषा है बेटियां,
कोयल की कूक और बुलबुल होती है बेटियां,
पायल की रुनझुन और मधुर गीत है बेटियां,
सृष्टि को गोद में पाले हैं, मत मारो बेटियां,
अमित समय से सृष्टि को बचा रखी है बेटियां,
खुशी की प्रतीत रिद्धि और सिद्धि होती है बेटियां,
श्री की मूरत और लक्ष्मी की सूरत होती है बेटियां,
घर की सुरम्य और सार होती है बेटियां,
अंधेरे में उजाला बन खिलखिलाती है बेटियां,
उदासी में हर दर्द का दवा होती है बेटियां,
हर रूपों में उड़ान भरती है बेटियां |
आस्थाओं का बाजारीकरण..!
कुछ दिनों से देख रहा हूँ, जिस तरह से हिन्दू देवी-देवताओं पर तरह- तरह के फिल्म बनाकर मजाक परोसा जा रहा है, ये हमारे धर्म का सहारा लेकर अपना कारोबार को भरपूर फायदा पहुंचा रहे हैं | ये फिल्म इंडस्ट्रियल अपने फायदे के लिए कुछ भी कर सकते हैं | फिल्म बनाना आपका धंधा है, आप धंधा कीजिए, मुझे कोई समस्या नहीं,लेकिन आप दक्षिण भारतीय कलाकारों से सीखिए और फिल्म बनाइए | आपके फिल्मों को भी दर्शकों का भरपूर समर्थन मिलेगा | लेकिन आप हमारे धर्म का सहारा लेकर खिलवाड़ नहीं कर सकते| आज बाॅलीवुड मूवी को बाॅयकट किया जा रहा है, यह बहुत अच्छी पहल है, इन फिल्मकारों को सबक सिखाने के लिए | मैं बाॅयकट का समर्थन करता हूँ | फिल्मों के साथ- साथ खाद्य सामग्री के पैकेटों में हिन्दू देवी- देवताओं के चित्र छाप कर अपना उद्योग- कारोबार को चमका रहे हैं| लोग उन खाद्य- पदार्थ का उपयोग कर उन देवी- देवताओं के चित्र लगे हुए पैकेटों को जहाँ- तहाँ फेक देते हैं| इस तरह की गंदी मानसिकता वाले लोग सिर्फ हिन्दू धर्म के देवी- देवताओं के साथ ही ऐसा क्यों करते हैं? फिल्मों के साथ- साथ उन सभी खाद्य सामग्री का बहिष्कार करना चाहिए, जिसमें हमारे धर्म के देवताओं का फोटो लगाकर बिजनेस किया जाता है | चनाचूर का पैकेट हो या चावल का, अगरबत्ती का पैकेट हो या मसाला का, हमारे धर्म के नाम पर धंधा किया जाता है | सामग्री का इस्तेमाल करके पैकेटों में छपी चित्रों को जहाँ- तहाँ फैक दिया जाता है | जिन देवी- देवताओं को हम पूजते हैं, उनके चित्रों को उद्योग के लिए इस्तेमाल किया जाता है | आखिर इसके गुनहगार कौन है? अधिकतर देखा गया है इन चित्रों का इस्तेमाल गैर हिन्दू कंपनी के मालिक द्वारा किया जाता है | मुझे किसी धर्म से कोई गिला- शिकवा नहीं| लेकिन हिन्दू धर्म के साथ खिलवाड़ कतई बर्दाश्त नहीं | सरकार और हिन्दू संगठन को चाहिए कि जो भी हिन्दू धर्म के देवी- देवता का इस्तेमाल निजी स्वार्थ के लिए करते हैं, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो |
************************
कविता :- कैसे हिन्दी दिवस मनाऊँ मैं..?
कैसे हिन्दी दिवस मनाऊँ मैं ?
एक दिन हिन्दी दिवस मना के,
क्या हिन्दी को सम्मान दे पाऊँ मैं ?
कोई गुजराती, कोई मराठी,
बंगाली, तेलगु कहलाते हम,
एक राष्ट्र का एक भाषा हो,
हिन्दी की जयकारा लगाऊँ मैं |
दीन- हीन और मजलूमों की,
कराते सबकी पहचान हम,
हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्थान का,
बड़े चाव से नारा लगाते हम |
अपनी भाषा से प्रेम है तो,
हिन्दी को सिरमौर बनाऊँ मैं,
एक देश का एक भाषा हो,
जन-जन को बताऊँ मैं ?
दो अक्षर का अंग्रेजी ज्ञान,
हिन्दी का मुंह चिढा़ऊॅं मैं,
निज भाषा से शर्माते हो तो,
कैसे राष्ट्रभाषा बन जाऊँ मैं?
हिन्दी- अंग्रेजी की बात हो,
अंग्रेजी की ठाट दिखाऊँ मैं,
अपनी भाषा से प्रेम नहीं तो,
कैसे हिन्दी दिवस मनाऊँ मैं ?
**************************
कविता :- हिन्दी का सम्मान करें..!
हिन्दी भाषा राष्ट्र की शान,
हिन्दू- मुस्लिम, सिक्ख - ईसाई,
सबको यह भाषा है प्यारी,
हिन्दी की करो यशगान,
सबको देती है ये सम्मान,
हिन्दी की यही परिभाषा,
सबको गले लगाती हिन्दी,
सब भाषा को अपनाती हिन्दी,
सम्मान से जीना सिखाती हिन्दी,
कश्मीर से कन्याकुमारी तक,
हिन्दी का जयकारा होगा,
अखंडता का नारा होगा,
हिन्दी सबका सहारा होगा,
सूर, तुलसी ,मीरा का पद होगा,
रामचरितमानस का पाठ होगा,
प्रेमचंद की देहाती हिन्दी,
घर-घर की निज भाषा हिन्दी,
देश नहीं अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी,
फिजी, मारीशस, अमेरिका,
विदेशों में भी बोली जाती हिन्दी,
अपनी हिन्दी का सम्मान करें,
14 सितम्बर हिन्दी दिवस मनाएं,
निज भाषा का पहचान कराएं |
**********************
कविता :- मैं क्या लिखता हूँ..?
तुम्हीं तो बताओं , मैं क्या लिखता हूँ ?
नायक होता तो , अभिनय करता,
नर्तक होता तो , नृत्य करता,
कवि हूँ , कविता लिखता हूँ,
जिज्ञासा से भरा लेख लिखता हूँ,
पढ़ों तो जानों , मैं क्या लिखता हूँ ?
जो मन में आए, वे सब लिखता हूँ,
तुम्हीं तो बताओं, मैं क्या लिखता हूँ ?
मजदूरों की मजबूरी लिखता हूँ,
किसानों की लाचारी लिखता हूँ,
दीन- दुखियों की उदासी लिखता हूँ,
युवाओं की बदहाली लिखता हूँ,
संतों की साधना लिखता हूँ,
मजलूमों की वेदना लिखता हूँ,
तुम्हीं तो बताओं, मैं क्या लिखता हूँ ?
पवन की मंद-मंद झोकों को, आवाज देता हूँ,
बिजली की कड़कड़ाहट से नजरें मिलाता हूँ,
कोयल - की कूक,
झिंगुरों - की चिकचिक,
टहनियों - का थिरकन,
सभी पर नज़र रखता हूँ,
तुम्हीं तो बताओं, मैं क्या लिखता हूँ ?
बच्चों का भूखे पेट रोना,
कबाड़ों का चरचराना,
गाड़ी की गड़गड़ाहट,
चारों ओर आवादी का शोर,
जहाँ देखों लम्बी कतारें,
कोई कुछ कहता,
कोई कुछ सुनता,
निराशा में छिपी हुई आशा.....
मैं तो कवि हूँ क्या कहूँ ?
रवि बनकर ऑंखें खोल जाता हूँ,
तुम्हीं तो बताओं , मैं क्या लिखता हूँ ?
*******************
कलम भी साथ लाया हूँ..!
इतिहास से कुछ सीखने आया हूँ,
बच्चों का भविष्य गढ़ने आया हूँ,
कलम भी साथ लाया हूँ |
बीती घटनाओं को समेटने आया हूँ,
गलतियों को सुधारने आया हूँ,
भारत की गाथा बताने आया हूँ,,
कलम भी साथ लाया हूँ |
सबको अधिकार बताने आया हूँ,
दीन-दुखियों को हक दिलाने आया हूँ,
कोई किसी का हक न डकार जाए,
कलम भी साथ लाया हूँ |
सत्य-अहिंसा का पथ अपनाने आया हूँ,
गांधी-सुभाष के सपने सजाने आया हूँ,
सपनों का भारत बनाने आया हूँ,
कलम भी साथ लाया हूँ |
राजनीति की गलियों में,
मैं सत्ता बदलने आया हूँ,
जनता को जगाने आया हूँ,
कलम भी साथ लाया हूँ |
मैं चुप्पी तोड़ने आया हूँ,
मुख-बधिरों को आवाज देने आया हूँ,
अधिकार की बात बताने आया हूँ,
कलम भी साथ लाया हूँ |
भारत की अस्तित्व बचाने आया हूँ,
सोने की चिड़ियाँ बनाने आया हूँ,
आवाम को जगाने आया हूँ,
कलम भी साथ लाया हूँ |
भारत का भविष्य गढ़ने आया हूँ,
निरक्षरों को साक्षर करने आया हूँ,
शिक्षा का महत्व बताने आया हूँ,
कलम भी साथ लाया हूँ |
*********************
कविता :- शत-शत प्रणाम..!
1
करते उनके चरणों में हम, शत - शत प्रणाम |
जीवन की प्रथम पाठशाला, माँ की गोद होता,
निज भाषा का ज्ञान और संस्कार हमें सिखाता,
मीठी- मीठी बातों से करते हमारा गुणगान,
शीश झुकाकर करते हैं गुरुवर, शत - शत प्रणाम |
2
अज्ञानता रुपी अंधकार में, शिक्षा की दीप जलाते हैं ,
जीवन के सुख - दुःख में, चलने की राह बताते हैं,
अपनी शिक्षा- ज्ञान से करते हमें धनवान,
शीश झुकाकर करते हैं गुरुवर, शत - शत प्रणाम |
3
अपने ज्ञान की सागर से, गागर को भर देते,
भर देते हैं जीवन में सम्मान से जीने की शान,
लिए कुछ बिना ही देते हैं, अज्ञानी को ज्ञान,
शीश झुकाकर करते हैं गुरुवर, शत - शत प्रणाम |
4
सबके जीवन में शिक्षा की दीप जलाते हैं,
ऊंगली पकड़ कर लिखना हमें सिखाते हैं,
अपने ज्ञान चक्षु से,करते है हमारा मार्गदर्शन,
शीश झुकाकर करते हैं गुरुवर, शत - शत प्रणाम |
5
गुरुओं ने हमें ईश्वर से रुबरु कराया,
ज्ञान की रोशनी से, जग को किया उजियारा,
ज्ञान- ज्योति से दर्शन कराएं, बढ़ाएं मान- सम्मान,
शीश झुकाकर करते हैं गुरुवर, शत - शत प्रणाम |
6
देव- दनुज दोनों को पढ़ाएं, होते हैं ये महान,
राजा- रंक को ज्ञान देते, यही तो है उनकी पहचान,
ईश्वर ने भी लिया गुरुओं से शिक्षादान,
शीश झुकाकर करते हैं गुरुवर, शत - शत प्रणाम |
7
सत्य- अहिंसा का पाठ पढा़एं,
न्याय - अन्याय से अवगत कराएं,
हो हमेशा गुरुजनों का आदर और सम्मान,
शीश झुकाकर करते हैं गुरुवर, शत - शत प्रणाम |
***************
कविता :- खामोशी..!
शांत जल से पूछों,
विशाल गिरि से पूछों,
अंबर से पूछों |
हवा क्या है ?
जीवन का अनमोल औषधि,
निरंतर चलने वाली,
अपनी निरंतरता के लिए प्रसिद्ध |
पानी क्या है ?
प्यासा के लिए अमृत,
जीवन देने वाली,
इसके बिना जीवन शून्य |
शीतलता क्या है ?
शशि की बड़प्पन,
सारी दुनिया के लिए,
ठंडी मुस्कान बिखेरना |
पुष्प क्या है ?
जीवन की सार,
खुद बिखर कर,
दूसरे को सूरभि देना |
*******************
पंखों में उडा़न भरता हूँ..!
जल - सी सरल मन में,
मिट्टी -सी कोमल तन में
विचार भरता हूँ,
संस्कार भरता हूँ,
पंखों में उडा़न भरता हूँ |
मान- सम्मान,
प्रेम - अपनत्व,
पद- प्रतिष्ठा बताता हूँ,
सबको विश्वास दिलाता हूँ,
पंखों में उडा़न भरता हूँ |
छोटी- छोटी ननिहालों का,
भविष्य गढ़ता हूँ,
सही- गलत का पहचान,
कराता हूँ,
डांटता हूँ, पुचकारता हूँ,
शब्द वाण से तपाता हूँ,
निखारता हूँ ,
पंखों में उडा़न भरता हूँ |
नन्हें- मुन्ने राही को,
राह दिखाता हूँ,
टेढ़े - मेढ़े राहों में,
चलना सिखाता हूँ,
शब्दों से रुबरु कराता हूँ,
देश का भविष्य गढ़ता हूँ,
पंखों में उडा़न भरता हूँ |
पंख फैलाना सिखाता हूँ
उड़ना सिखाता हूँ,
अनंत आसमान नापने सिखाता हूँ,
भविष्य की नींव गढ़ता हूँ,
पंखों में उडा़न भरता हूँ |
निराशा में आशा भरता हूँ,
बुझे हुए लौ को जलाता हूँ,
संवेदनशील बनाता हूँ,
कर्तव्य पथ पर चलाता हूँ,
पंखों में उडा़न भरता हूँ |
**********************
देश भक्ति गीत :- आजादी अमृत महोत्सव..!
साथ में आपार खुशियाँ पाया है,
हर - घर तिरंगा फहरायेंगे,
आजादी का अमृत महोत्सव मनायेंगे |
देश 75वां स्वतंत्रता दिवस मनायेगा,
आजादी का झंडा हर- घर फहरायेगा,
भारत की ध्वजा हमारी शान,
हमारे देश की यही पहचान ,
हर - घर झंडा फहरायेंगे,
आजादी का अमृत महोत्सव मनायेंगे |
कश्मीर से कन्याकुमारी तक,
समुद्र तल से आसमान तक,
हर - घर तिरंगा लहरायेंगे,
आजादी का अमृत महोत्सव मनायेंगे |
देश की आन, बान और शान,
हर हिन्दुस्तानी की पहचान,
ये आजादी बहुत कीमती है,
खून से कीमत चुकाई है,
आजादी का मान रखना है,
दुश्मनों का संहार करना है,
हर - घर तिरंगा लहरायेंगे,
आजादी का अमृत महोत्सव मनायेंगे |
दिल में देश भक्ति का जज्बा होगा,
हर हाथ में हिन्दुस्तान का ध्वजा होगा,
गाँव से शहर तक हर्षोल्लास होगा
पर्वत की ऊँचाई पर तिरंगा होगा,
हर - घर तिरंगा लहरायेंगे,
आजादी का अमृत महोत्सव मनायेंगे |
*******************
भक्तों के है बाबा सहारे..!
अनाथों के आप ही नाथ,
जिसका कोई भी नहीं,
उनके है भोलेबाबा आप,
भक्तों के है बाबा सहारे,
डम - डम - डम - डम डमरू वाले |
दुखियों की दु:ख हर लो बाबा,
सबको खुशियाँ दे दो बाबा,
अमीर- गरीब का भेद मिटा के,
जीवन में सबकी ज्योत जला के,
भक्तों के है बाबा सहारे,
डम - डम- डम - डम डमरू वाले |
देवों के देव महादेव हैं अंतर्यामी,
सबकी मनोकामनाएं पूरी कर दे स्वामी,
दुखियों के दु:ख हर लो बाबा,
कुछ चमत्कार कर दो बाबा ,
भक्तों के है बाबा सहारे,
डम - डम- डम-डम डमरू वाले |
भोलेबाबा है औघड़दानी,
सबको देता है दाना - पानी,
सच्चे मन से जो जयकारा लगाए,
बाबा को अपने आस - पास पाए,
भक्तों के है बाबा सहारे,
डम - डम - डम - डम डमरू वाले |
भक्तों के दु:ख हरने वाले,
बाबा है सबसे भोले - भाले,
ऊँचे हिमालय में बसने वाले,
सबको दे दें खुशियाँ सारे,
भक्तों को ऐसी शक्ति दे दें,
भक्तों के है बाबा सहारे,
डम - डम - डम - डम डमरू वाले |
******************
कविता - बरखा रानी..!
वसुधा की प्यास बुझाओं ना,
तालाब, नदी, और झरना प्यासी,
आ जाओं न बरखा रानी |
सूखी खेत है, फटी डगर है,
कृषक मायूस - सा बैठा है,
रिमझिम- रिमझिम बरसकर,
खेतों में भर दो खूब पानी,
आ जाओं न बरखा रानी |
बच्चे नहीं है मेड़ों पर,
हाथ में लिए छतरी ,
सिमट गए हैं घरों पर,
आ जाओं ना बरखा रानी |
आई नहीं, बरखा रानी ,
कैसे होगी धान रोपनी,
सूखी खेत पुकार रहीं हैं,
आ जाओं न बरखा रानी |
सूख रही है पेड़ - पौधें
हरियाली भी समाप्त हो चली,
मायूस- सी पशु- पक्षी,
मिलती नहीं भरपेट दाना- पानी,
आ जाओं न बरखा रानी|
******************
कविता :- चलों कुछ सवाल करते हैं..!
चिड़ियाँ चहचहाहट सुनाती नहीं ,
चलों बसंत से कुछ,सवाल करते हैं ?
फूलों में महकती खुश्बू आती नहीं,
पंखुड़ियों अब मुस्कुराती नहीं,
चलों फूलों से कुछ,सवाल करते हैं ?
गौरेया अब घरों में आते नहीं,
अपना घोंसला बनाते नहीं,
चलों गौरेया से कुछ,सवाल करते हैं ?
चहरे- से हॅंसी गायब हो गई,
मुस्कुराहट वर्षों की बात हो गई,
चलों चेहरे से कुछ,सवाल करते हैं ?
सावन में अब मेघ आतें नहीं,
रिमझिम- रिमझिम बरसते नहीं,
चलों सावन से कुछ,सवाल करते हैं ?
बचपन का वो उल्लास नहीं,
साथियों का अब साथ नहीं,
चलों बचपन से कुछ,सवाल करते हैं ?
धान रोपती महिलाएं गाती नहीं,
खेतों की शोभा अब वो बढ़ाती नहीं,
चलों उन महिलाओं से कुछ,सवाल करते हैं ?
कलम अब सच लिखती नहीं,
ईमानदार के साथ दिखती नहीं,
चलों कलम से कुछ,सवाल करते हैं ?
इंसानों में इंसानियत नहीं,
प्यार में अब जज्बात नहीं,
चलों इंसानों से कुछ,सवाल करते हैं ?
***************
गज़ल :- व्यस्त है भीड़ जुटाने में..!
पुष्प की अभिलाषा कभी पूछ लेना राज दरवारों में ||१||
खून-पसीने की सोंधी खुशबू आती है देश की मिट्टी में,
मिट्टी को पराया न समझना देश का कर्ज़ हैं रोम-रोम में ||२||
कसमें खाते हैं हमारे संविधान की बडे़ चाव से,
खून चूसने के लिए नजरें गढ़ाएं हैं ,भूमि पुत्रों में ||३||
सूटबूट में शानों शौकत करते दिल्ली के दरबारों में,
देश के खनिजों को लूट रहे,निज तिजोरी भरने में ||4||
किसान खेतों को छोड़ गए,तुम जैसे गद्दारों से,
होकर भूमिपुत्र भी,रह गए मिट्टी के मकानों में ||५||
चारों तरफ लूट-मचा रखी,मंत्री- अफसरशाहों ने,
भारत के रुपये को लील रहे,विदेशों में जमा कराने में ||६||
देश विकास का नाम हुआ,न गरीबों का कोई काम हुआ,
देश में गरीबी बढ़ती गई,नेताओं की झोली भरती गई बेइमानी में ||७||
चलों "अमित"! अपना कुछ फ़र्ज निभाएं देश हित में,
जनता का पैसा लूटने वाले,व्यस्त है भीड़ जुटाने में ||८||
******************
कविता :- शुभचिंतकों को धन्यवाद..!
उन -उन शुभचिंतकों को धन्यवाद |
जीवन पथ पर जाने- अनजाने,
जो भूल गए उसे अलविदा,
साथ चलते- चलते सुख- दुख की,
भूल न जाना, उन राही को,
जिस - जिस से सम्मान मिला,
उन - उन शुभचिंतकों को धन्यवाद |
चलते- चलते मन चूर हुई,
न जाने कितने दूर हुई,
कितने जाने-पहचानें छूट गई,
उनकी स्मृतियाँ भूल गई,
जिस - जिस का सम्मान मिला,
उन- उन शुभचिंतकों को धन्यवाद |
समय - चक्र की चाल में,
न जाने कितना दर्द मिला,
कुछ ने महलम- पट्टी बाँधा,
कुछ ने शब्द- वाण - से तिरस्कार किया,
कुछ अच्छी यादों में सिमट गए,
कुछ का हृदय परित्याग किया,
जिसे याद आए, वो अपने थे,
पराए स्वप्न बनकर उड़ गए,
जिस - जिस का सम्मान मिला,
उन- उन शुभचिंतकों को धन्यवाद |
******************
कविता :- दीप जलाएं..!
उजड़े बगियाँ को फिर सजाएं,
बिखरे पुष्पों को समेटे,
वनमाली को फिर मनाएं,
चलों आज फिर दीप जलाएं |
टूटे स्वप्नों को फिर सजाएं,
अधूरे ख्वाबों को फिर बसाएं,
गहरे जख्मों पर महलम लगाएं,
वैद्य को आज फिर बुलाएं,
चलों आज फिर दीप जलाएं |
शिक्षारुपी दीप जलाएं,
अज्ञानता को दूर भगाएं,
अंधकार में रोशनी फैलाएं,
गुरुजनों - से शिक्षा पाएं,
चलों आज फिर दीप जलाएं |
असफलता से मत घबराएं,
सफलता की नई राह बनाएं,
एक उम्मीद फिर - से बोएं,
स्वयं से स्वयं को पहचान कराएं,
चलों आज फिर दीप जलाएं |
****************
भक्ति रचना :- राजीव नयन को वनवास..!
एक कुमारी जनक दुलारी सीता,
बंध गई राम के संग हर्षिता,
हुई सूर्यवंश की कुलवधू,
दशरथ के कहलाने लगी पुत्रवधू |
एक दिन राजा दशरथ ने ऐलान किया,
राम को युवराज बनाने का निश्चय किया,
यह सुन रानी कैकेयी तिलमिलाई,
रातों- रात एक चक्रव्यूह रच डाली |
हुआ सुबह राजीव नयन को वनवास,
राम संग सीता, लक्ष्मण गए साथ- साथ,
ऐसी अशुभ दिन अयोध्या में आई,
फूट- फूट कर पूरी अयोध्या रोई,
सूनी हो गई राजभवन प्यारी,
फूलवाड़ी भी मुरझा गई सारी |
खुशी- खुशी से वनवास पूर्ण करने की ठानी,
कुछ दिन बाद आई एक विपत्ति जानी,
सुर्पनखा की आंखें जम गई कौशिल्या नंदन पर,
अत्याचार देखा न गया, जानकी माता पर,
क्रोधित लक्ष्मण नाक काट गए, कामिनी की,
असुरों में बात फैलाई गई, मान- हानि की |
बहन का बदला लेने, भेष बदल कर रावण आया,
सीता को हर ले गया,अबला जान,
राम- लक्ष्मण खोज- खोज हुए परेशान,
साथ मिला हनुमान का, सीता का पता लगाया,
नारी का हरण, राम से न सहाया ,
कर दिया लंका से, अधर्मियों का सफाया,
जीत लिया लंका को,भूमिजा हुई मुक्त,
चारों ओर देवताओं ने बिखेरा पुष्प |
चौदह वर्ष का पूर्ण हुआ वनवास,
राम,लक्ष्मण,सीता, आए घर वापस,
दशहरा के साथ -साथ, दीवाली भी आई,
अयोध्या वासियों ने दीपों की माला सजाई |
*******************
सफलता का कुंजी पिता..!
मेरी आन,
मेरी शान पिता |
मेरी अरमानों का,
पहचान पिता |
सफलता का कुंजी पिता,
परिश्रम सीखाते पिता |
गलती पर डांटते पिता,
अच्छाई पर फूले न समाते पिता |
मेरी सीख पिता,
मेरी जीत में पिता,
मेरी परछाई में पिता,
मेरी सब्र में पिता,
मेरी परवरिश में पिता,
मेरी लेखनी में पिता,
जीतने की ललक में पिता,
मेरे रुप में पिता,
मेरे रंग में पिता,
जीवन के कण-कण में पिता |
मेरे गम को बांचते पिता,
मेरी पहचान को सींचते पिता |
ऊंगली का सहारा पिता,
मेरी चाल,मेरी ढाल पिता,
जीवन के रंगमंच के नायक पिता |
*************************
कविता :- चलों कुछ पेड़ लगाएं..!
पृथ्वी को हरा - भरा बनाएं,
जीवनदायिनी प्रकृति हमारी,
मुफ़्त में बांटती खुशियाँ सारी,
प्रकृति हमसे कुछ नहीं लेती है,
बिना मूल्यय सब कुछ देती है |
बूंद- बूंद पानी, अमृत- सा मूल्य,
पर्यावरण बचाओं, यही सबका पून्य,
कुछ पेड़ लगाते हैं, हरियाली लाते हैं,
आओं मिलकर पर्यावरण बचाते हैं |
मिट्टी - से जीवन मिलती है,
बीज एक लगाकर, सौ पाते हैं,
सभी के लिए भोजन देती हैं,
अमीर- गरीब का भेद न करती,
भोजन सबको उपलब्ध कराती |
जड़ी-बुटी - से भरी प्रकृति हमारी,
इसलिए तो है सबसे प्यारी,
सबके लिए प्राणवायु देती,
बदले में कुछ भी न लेती,
आओं मिलकर न्याय करते हैं,
चलों प्रकृति से प्यार करते हैं |
**********************
गजल :- झील सी गहरी ऑंखें..!
मैं डूब जाऊँ उसमें तुम्हारी परछाई है ||1||
तुम्हारी बालों में काली घटा सिमटी है,
क्या बताऊँ ? तू कितनी कीमती है ||2||
गालों पे तुम्हारी हर पल खुशी झलके,
हमेशा सुख की नींद ले तुम्हारी पलकें ||3||
तुम रुप- सौन्दर्य की श्रद्धा हो,
मेरे लिए हमेशा आराध्या हो ||4||
जब तुम खुशियों की दीप जलायेगी,
मुझे हमेशा अपनी साथ पायेगी ||5||
तुम्हारी होठों की मुस्कान में , खिल जाऊँ,
तू साथ दे तो दुनियां में, खुशी का दीप जलाऊॅं ||6||
तुम्हारी मधुर मुस्कान में, चांदनी झलकती है,
भानू की किरणों से तुम, सोने -सी चमकती है ||7||
कृष्णा के पवित्र प्रेम की मूरत हो तुम,
बन न सकी रुकमणि, राधा हो तुम ||8||
विशुद्ध प्रेम की खिलखिलाहट हो,
कलम जाने तुम मेरी लिखावट हो ||9||
चलों आज दिल से दिल की बात करते हैं,
ये प्रेम हमेशा मुस्कुराता रहे, फरियाद करते हैं ||10||
झील-सी गहरी आंखें, डूबने न देना,
हो जाए अंधेरा तो, दीप जला देना ||11||
****************************
गज़ल - लहरों से दो-दो हाथ करते हैं |
अपने मेहनत से दरिया में तैरना ||1||
बनकर गोताखोर मझधार पार करना,
पंखों में उड़ान भरकर आसमां पार करना ||2||
लहरें तो आएगी ही किनारा के लिए,
उतरना होगा समुद्र की गहराई मापने के लिए ||3||
लहरें आती है जाती है , उसे थमने न देना,
नौका सागर पार करेंगे, पतवार चलाते रहना ||4||
धूप भी अच्छी है झुलसाने के लिए,
बारिश की बूंदें होगी,बचाने के लिए ||5||
लाख घर जले, दिल में चिंगारी रखनी होगी,
सत्ता किसी की भी हो, परखनी होगी ||6||
लाख बुराई हो, मानवता को बचाना होगा,
सच के साथ हमेशा खड़ा रहना होगा ||7||
टेढ़ी डगर है,कुछ कद़म डगमगायेंगे,
चलते- चलते खुद संभल जायेंगे ||8||
गरीबी मिटती नहीं रोटी के टुकड़ों से,
सबकों उनके हिस्से का पढ़ाई चाहिए ||9||
हो जाएं अपने पैरों पर खड़ा ऐसी शिक्षा चाहिए,
कोई सहारा मिल जाएं, एक फरिश्ता चाहिए ||10||
बेचा जा रहा देश की मिट्टी, यही शोर है,
ईमानदारी की खुशबू फैलायें , यही जोर है ||11||
कब तक हमारी वोट से लुटतें रहोगे हमें,
अब तो अन्याय छोड़ों, पहचानने लगें हैं तुम्हें ||12||
चलों लहरों - से दो - दो हाथ करते हैं,
पतवार नहीं, बाजुओं से समुद्र पार करते हैं ||13||
**********************
अपनों से थोड़ा प्यार कर लो..!
फेसबुकिया रिश्तों के अथाह गहराइयों में डूबता सच्चा रिश्ता गौण होता जा रहा है| फेसबुक में नया- नया रिश्ता ढूँढना एक शौक - सा हो गया है या कहा जाय मजबूरी | फेसबुक में चाहें हम कितने भी लोगों तक पहुँच जाएं, दिलों में उतरने के लिए हकीकत की जमीन पर आना होगा | सर्कस का जोकर- सा जिन्दगी में सब अनजान लोगों में अपने को ढूँढता है कि कोई उनका अपना बने | जिसे लोग जानते नहीं है, पहचानते नहीं है , उनका असली नाम तक पता नहीं, उनसे दोस्ती का हाथ बढाते हैं | वो सही है या गलत ये सब जाने बिना उनके सामने अपने आप को महफूज़ महसूस करते हैं | फेसबुक के अधिकतर मित्रों से शायद मुलाकात भी न हुई हो, सिर्फ एक फ्रेंड रिक्वेस्ट से हम उनके हो जाते हैं और वर्षों से जिनके साथ- साथ बड़े हुए, उनसे बातें करना मुनासिब नहीं समझते | सामने कड़वी ककड़ी जैसे बातें करने वाले, ऑनलाइन मीठी- मीठी बातें करने वाले - से बेहतर है | लोग बचपन के गाँव घर के दादा- दादी, चाचा- चाची, भैया- भाभी, भाई- बहन ,साथी- संगी को भूलकर अनजान लोगों को अनजान राहों में ढूँढ़ते- फिरते हैं | हम कितने ही- मित्र फेसबुक में बना ले, लेकिन सुख- दु:ख में फेसबुकिया यार काम नहीं आते, काम आते हैं तो वही जो बचपन से साथ- साथ खेलते हैं, पढ़ते हैं, झगड़ते हैं, साथ में बैठकर खाना खाते हैं, तू-तू, में- में करते हैं | एक गर्व होता है कि वो मेरा गाँव का है, बचपन का यार है| ठीक है फेसबुक, इस्टाग्राम, ट्यूटर सूचनाओं का एक अच्छा माध्यम हो सकता है, लेकिन विलासिता और दिखावटीपन में हम अपने यथार्थ रिश्ते से कदम-दर-कदम दूर होते जा रहे हैं |आज ग्रामीण परिवेश में रंगमंच का न होना अपनों से दूर होने का मुख्य कारण है| हमें समाज को एकसूत्र में बांधने का बीड़ा उठाना होगा| कुछ लोगों को बढ़-चढ़ कर सामाजिक कार्यों में हिस्सा लेना होगा | एक सशक्त समाज ही- सशक्त देश का निर्माण करने में अहम भूमिका निभा सकती है | हमें अपनों को नहीं पहले खुद को ढूंढ़ना होगा कि हम कहाँ खोते जा रहे हैं ? फेसबुक से बाहर निकल कर खोये हुए रिश्ते- नातों को पुनर्जीवित करना होगा |
आओं चले दो-दो कदम आगे बढ़ाएं,
एक तुम्हारा हाथ, एक मेरा हाथ,
मिलकर एक समाज का निर्माण करें,
आओं सब मिलकर हाथ बढा़एं |
*************
कविता :- पुष्प..!
बिखर जाए तो मुरझा जाती है |
खिलों मगर फूल की तरह,
टूटकर भी सुगंध दे जाती है |
कोई ऐसा काम करो, फूल जैसा नाम करो,
मुरझाने के बाद भी पहचान छोड़ जाती है |
फूल खिले तो बगियाँ में सज जाती है,
सूख जाए तो बिखर जाती है |
फूलों का भी अपना वसूल होता है,
जो प्यार से स्पर्श करे सुगंधित कर जाता है |
फूलों से फूलवाड़ी खिलखिलाती है,
न रहे तो वीरान कर जाती है |
फूल जीवन में खुशी की पहचान है,
जो भी इसे समझ जाए वही महान है |
इमानदारी फूल से सीखों, बिखर कर खुशियाँ लुटाती है,
उसमें दिखावटी कुछ नहीं, सिर्फ सच्चाई होती है |
फूल सिर्फ फूल नहीं, गुथी हुई एक माला है,
परिवार को एकसूत्र में बांध रखें, वही तो एक धागा है |
युग- युग से हमेशा साथ निभाता,
राजा हो या रंक सबके बगियाँ में खिलता |
**********************
लघुकथा :- अभिमन्यु घिर गया..!
......पता नहीं माँ इस वर्ष भी नियुक्ति प्रकिया शुरु होगी कि नहीं | छ: वर्ष से नियुक्ति नहीं होने से अभिमन्यु निराश होकर चिंतित मुद्दा में दिखाई देते हैं | माँ कहती है अभी जो सरकार बनी है वह क्या कह रही है ? .. क्या बोलूं माँ धृतराष्ट्र रुपी सरकार सिर्फ नियमावली रुपी चक्रव्यूह बना रही है | धृतराष्ट्र रुपी सरकार की बनाई गई नियमावली को गंगापुत्र भीष्म पितामह के पास भेजा गया है | पता नहीं वह कब तक नियमावली को सही या गलत का फैसला सुनायेंगे | अभिमन्यु अपनी माँ को बताते हैं कि माँ धृतराष्ट्र रुपी सरकारें आती है , जाती है और ऐसा चक्रव्यूह रचती है कि हमारे जैसे हजारों युवा चक्रव्यूह में फसकर दम तोड़ देते हैं|
माँ कहती है चुनाव से पहले तो बोले थे प्रतिवर्ष पांच लाख और पांच करोड़ नौकरी देंगे | अभिमन्यु कहता है माँ यही तो झूठा वादा है हमारा वोट लेने का | जीत जाने के बाद ऐसे- ऐसे नियम लाते हैं कि सरकार के बनाये गए नियमों के जाल में न जाने कितने अभिमन्यु का स्वप्न टूटते जाते हैं |
माँ कहती है सरकार को कोई कुछ नहीं कहता है | सब मिलकर बोलने से तो सुनेगा ना वह | अभिमन्यु माँ को कैसे समझाएँ कि माँ धृतराष्ट्र रुपी सरकार अंधी और बहरी है, कभी नहीं चाहती है कि अभिमन्यु आगे बढ़े | उसे सिर्फ राजपाट से मतलब है, राजनीतिक रोटी सेकने से मतलब है, राज्य की युवाओं से नहीं | दो राजनीति दलों के चक्रव्यूह में हमेशा अभिमन्यु ही मारा जाता है | कभी दो तरह की नियमावली बनाकर राज्य को हिस्सों में बांटकर, तो कभी लिंग भेद के नाम पर, तो कभी समानता का अधिकार का हनन करके, युवाओं को जाल में इस तरह जकड़ देती है कि वह कभी बाहर नहीं निकल पाता | और धृतराष्ट्र रुपी सरकार के जाल में फसकर अभिमन्यु बेसहारा, लाचार, और विवश नज़र आता है | और वह सरकार के बनाए जाल में फसकर फड़फड़ाता है, जितना निकलना चाहता है, उतना ही उस जाल में फसता ही चला जाता है |
भोली- भाली माँ चक्रव्यूह में फंसे अभिमन्यु को देखती रह जाती है, उस चक्रव्यूह से अभिमन्यु को निकाल नहीं पाती है, लेकिन अचानक अभिमन्यु को अपने पिता याद आते हैं, जो हमेशा संघर्ष, परिश्रम और धैर्य को बनाये रखने का सीख दिया करते हैं |
*****************
कविता :- मजदूरनी..!
दिन- रात मजदूरी करके पेट भरती हूँ,
न कड़ी धूप - से डरती हूँ,
न पानी से, न ठंडी से,
डरती हूँ तो फूटी किस्मत से,
मजदूरनी हूँ, मजदूरनी हूँ||
लाचार हूँ, विवश हूँ, मजबूर हूँ,
इसलिए तो पीठ पर छोटी बच्ची बांधकर काम पर खड़ी हूँ,
माँ हूँ ,मजबूर हूँ, न किसी की बोझ हूँ,
गरीबी की बोझ लिए चलती हूँ,
मजदूरनी हूँ, मजदूरनी हूँ||
न भाग्य अपना, न भगवान अपना,
बच्ची का पेट पालू, यही एक सपना,
न महलों का शौक, न गहनों की चाहत,
दो वक्त की रोटी और तन पर कपड़ा मिल जाए,
कुछ काम मिल जाए, कुछ काम मिल जाए,
मजदूरनी हूँ, मजदूरनी हूँ||
मजदूर दिवस की बातें सुनती हूँ,
कुछ लोग आते सेल्फी खींच जाते,
मना भी न कर पाती हूँ,
उसके साथ एक हंसी हस जाती हूँ,
कड़ी धूप में खडी़ हूँ,
भाग्य के पीछे पडीं हूँ,
दो वक्त के रोटी के लिए लड़ी हूँ,
पीठ पर बच्ची का ममत्व लिए खड़ी हूँ
एक बच्ची की माँ हूँ,
मजदूरनी हूँ, मजदूरनी हूँ,
कड़ी धूप में खड़ी हूँ||
*******************
लघुकथा :- बेस्ट स्टूडेंट..!
बारहवीं कक्षा की छात्राएं अब अपनी - अपनी घर जाएगी, इसलिए मेरा बेस्ट स्टूडेंट वह होगी, जो सरल स्वभाव की हो, मृदुभाषी हो, आज्ञाकारी हो, और पढ़ने में अच्छी होने के साथ -साथ कक्षा में नियमित उपस्थित रहती है| ओम सर की बात सुनकर सभी छात्राएं एक- दूसरे की नाम लेने लगी कि वर्तमान सत्र का बेस्ट स्टूडेंट कौन है? कुछ देर शोर- गुल होने के बाद ओम सर सभी को शांत करते हुए कहते हैं कि इस सत्र का बेस्ट स्टूडेंट सोनी कुमारी है| सोनी अपना नाम सुनते ही अपनी खुशी की आंसू को रोक नहीं पाती और अपनी आंसूओं को पोछने लगती है|
कक्षा में सबसे बेस्ट स्टूडेंट का खिताब पाते ही, सोनी कई छात्राओं के ऑंखों में चुभने लगी| न जाने बेस्ट स्टूडेंट बनना सोनी को तत्काल उस समय तो बहुत अच्छा लगा, लेकिन एक- दो दिन बाद ओम सर का दिया हुआ बेस्ट स्टूडेंट का तोहफा उसे सभी छात्राओं से अलग- थलग कर दिया| जो छात्रा कक्षा में हमेशा से प्रथम बेंच में बैठा करती थी, वह अब सबसे पीछे बेंच में पहुँच गई थी|ओम सर को सभी छात्राओं का सोनी के प्रति रूखा- रूखा व्यवहार समझ में आ रहा था|
परीक्षा समाप्त होते ही सभी छात्राएं अपनी - अपनी घर चली जाती है,लेकिन ओम सर मन ही मन सोच रहे थे कि अब कभी बेस्ट स्टूडेंट नहीं चुनूंगा|
*****************
गजल :- बिन कहे..!
सब कुछ...
कह जाती हो
तुम!
आवाज बनकर
मेरी......
गुनगुना जाती हो
तुम!
आकर पास सपनों में
ख्वाब......
दिखा जाती हो
तुम!
उम्मीद बनकर
जीने की राह...
दिखा जाती हो
तुम!
हंसी बनकर
होठों पर....
मुस्कुरा जाती हो
तुम!
बिन कहे
सब कुछ...
कह जाती हो
तुम!
आंखों में
नींद न हो तो..
सुला जाती हो
तुम!
कभी - कभी तो
नींदों से...
जगा जाती हो
तुम!
बिन कहे
सब कुछ...
कह जाती हो
तुम!
*********************
लघुकथा :- टिफिन बॉक्स..!
विद्यालय की गैलरी में प्रवेश करते ही....... सर हमलोग का कक्षा आइए ना!...... सर हमलोग का कक्षा आइए ना!... अमित सर को देख कर उमा और लक्ष्मी दोनों छात्राओं ने एक साथ पुकार लगाई.......दोनों षष्ठ कक्षा की छात्रा होने के कारण,अमित सर अनसुना करते हुए अपने नियत कक्षा लेने चले गए,क्योंकि अमित सर कक्षा नवम से कक्षा बारहवीं तक के छात्राओं को पढ़ाया करते हैं|नवम कक्षा में पढ़ाते हुए,उन छोटी-छोटी बच्ची का आवाज अमित सर के कानों में गूंज रहे थे| पुनः कुछ देर बाद अमित सर को देखकर.....आइए ना सर हमलोग का कक्षा.......हमलोग का कक्षा में कोई भी सर नहीं आते हैं, आप तो आइए सर.....बच्ची की बातों ने दिल को छू लिया........कुछ सोचकर अमित सर न चाहते हुए भी उन छोटी- छोटी बच्ची को पढ़ाने षष्ठ कक्षा में चले जाते हैं|
सभी बच्चियाँ खडी़ होकर, गुड मॉर्निंग कह कर, अमित सर का स्वागत करती है| फिर सभी बच्चियों का परिचय लिया जाता है और उसके बाद एक-एक को श्यामपट्ट के पास बुलाकर हिन्दी-अंग्रेजी भाषा में बारह महीने का नाम और अंकों को शब्दों में लिखने के लिए कहते हैं| शुरू-शुरू में बच्चियों को श्यामपट्ट में लिखने में परेशानी होती है,लेकिन कुछ देर में सभी बच्ची को लिखने में इतना आनंद लगने लगा कि निडर होकर श्यामपट्ट में अच्छी तरह से लिखने लगी|पूरे तीस-पैतीस बच्चियों ने श्यामपट्ट का इस्तेमाल किया|
आज का कक्षा समाप्त हुआ सुनते ही लक्ष्मी बोल पड़ी........सर आप नाश्ता करके आए हैं या नहीं? सर मजाकिया अंदाज में बोले नहीं| इतना सुनते ही लक्ष्मी ने कहा सर मैं आपके लिए नाश्ता लाई हूँ| ... अमित सर पूछे क्या लाई है?.... लक्ष्मी अपने बैग से टिफ़िन बक्स निकालते हुए बोली सर देखिए ना| जब उस टिफ़िन को खोला गया,तो अमित सर को भूजा हुआ चूड़ा और बहुत ही कम मात्रा में चनाचूर नजर आया| अमित सर,लक्ष्मी से बोले इसमें तो सिर्फ चूड़ा है,चनाचूर कहाँ है? छोटी-सी लक्ष्मी तुतलाते हुए बोली....... सर चनाचूर तो हम खा गए हैं| उसकी बातों से हंसी आ गई|अमित सर छोटी-सी बच्ची का आदर और सम्मान देखकर मुस्कराए और मन ही मन बुदबुदाए..........शबरी का झूठा बेर राम के लिए और आज छात्रा का भूजा हुआ चूड़ा अध्यापक के लिए|अमित सर टिफिन बॉक्स को वापस करते हुए बोले बाबू तुम खा लेना| मैं तो रुम से नाश्ता करके आया हूँ| अब मैं चलता हूँ.... सभी छात्राओं ने एक स्वर में खडी़ होकर थैंक्यू सर कहते हुए अध्यापक को कक्षा से विदा किए|
***********************
पोइला बैसाख..!
कवि रवींद्रनाथ की एक पंक्ति-नोबो आनंद जागो,आजि नबो रवि किरणें |अर्थात नववर्ष के प्रभात हमारे हृदय को आलोकित करती है| प्रतिवर्ष चौदह-पन्द्रह अप्रैल को बंग्ला समाज के लोग पोइला बैसाख को नूतन वर्ष मनाते है|एक सप्ताह पहले रामनवमी त्यौहार से बांग्ला नववर्ष की तैयारी में जुट जाते हैं|बांग्ला समाज का अपना धार्मिक मान्यता के कारण पोइला बैसाख को नववर्ष मनाते हैं, क्योंकि पन्द्रह अप्रैल तक सभी के घरों में रबी फसल आ जाता है|गेहूं,चना,सरसों,सेम,मसहूर,चिकना,अरहर आदि फसल से घर भर जाते हैं|इतने सारे अनाजों को देखकर सभी के चेहरे पर खुशी झलकती है|फलों में केद,शहतूत,आम,जामुन,कटहल,ताल आदि तरह के फल वृक्षों में दिखाई देते हैं|वृक्षों में नई-नई पत्ते निकलते हैं|वृक्ष फूल-फल से लद जाते हैं|
बांग्ला नववर्ष खुशी का प्रतीक है|पोइला बैसाख में बंग समाज के लोग नये-नये कपड़े पहनते है|मंदिर जाते हैं|एक-दूसरे को शुभो नबो बोरसो कह कर नए साल की बधाई देते हैं|घर में तरह-तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं|इस दिन रसगुल्ला और मछली खाने का विशेष महत्व है|
लोककथा के अनुसार अकबर के शासन काल में टोडरमल ने बैसाख मास से ही राजकाज की नई व्यवस्था लागू किया था| चैती फसल लोगों के घरों में आ जाने से,लोगों में खुशी का उल्लास रहता है|बंग समाज में पुराना लेखा-जोखा को समाप्त कर पोइला बैसाख से नया खाता प्रारंभ किया जाता है|
बांग्ला नववर्ष मनाने का विशेष कारण यह होना चाहिए कि जहाँ पूरा देश अंग्रेजी नववर्ष के पीछे भाग रहा हैं,वही बंगभाषी भारतीय नववर्ष को जीवित रखने के लिए संघर्ष कर रहा है|अंग्रेजी नववर्ष सभी को याद रहता है,लेकिन अपना भारतीय नववर्ष कुछ लोगों तक ही सीमित रह गया है| आज बच्चों से लेकर व्यस्क तक को अंग्रेजी नववर्ष का धून सवार है|आज सभी लोग अपनी सभ्यता,संस्कृति, परंपरा,आस्था,विश्वास को समाप्त करने पर तुले हुए हैं|
बांग्ला नववर्ष हमें हमारी संस्कृति,सभ्यता,रहन-सहन,खान-पान जीवित रखने की जिजीविषा को दर्शाता है|हमें पश्चिमी सभ्यता को त्याग कर अपने सभ्यता की ओर वक्त रहते लौटना होगा,नहीं तो आने वाले वर्षों में भारतीय संस्कृति इतिहास के पन्नों में मिलेंगे,किसी के घर में नहीं| हम सभी को मिलकर अपनी संस्कृति,सभ्यता को बचाए रखना होगा|यही नववर्ष हमारी पहचान है|
बैसाख का महीना आया,
साथ में रबी फसल लाया,
पूरी घर में गेहूं,जो,चना की बोरियां
*चलो करते हैं पोइला बैसाख की तैयारियां*|
***********************
केबिल कार में झूलती जिंदगी..!
10 मार्च दिन रविवार रामनवमी पर्व के अवसर पर जिला देवघर झारखंड का एकमात्र रोपवे में जैसे ही यात्रा प्रारंभ की,वैसे ही टाॅप लेवल के रोप का सैट टूट गया| या कहें आने-जाने वाली दो केबिल कार आपस में टकरा गई, जिससे केबिल कार रोपवे में 766 मीटर लंबी और पहाड़ी पर 392 मीटर ऊँची जगह में झूलने लगी और उसमें बैठे लोग केबिल कार रोपवे में फंस गए| घटना की जानकारी मिलते ही स्थानीय लोगों के साथ-साथ स्थानीय प्रशासन भी बचाव कार्य में जुट गए,लेकिन असफलता हाथ लगी|इस बीच दो लोगों ने अपना जान गंवाया| स्थिति को भापते हुए केन्द्र सरकार से सहायता मांगी गई| बचाव दल घटना स्थल पर पहुँच कर परिस्थितियों को देखकर, राहत और बचाव कार्य में लग गए| केबिल कार में फंसे जिन्दगी को सेना के जवान ने अदम्य साहस और हिम्मत से बचाया|बचाव कार्य के दौरान एक व्यक्ति की हाथ छूटने से मृत्यु हो गई|बचाव कार्य में एनडीआरएफ,आईटीबीपी और वायुसेना के जवान लगे हुए थे| जब तक सबको निकालते तब तक रात हो चुकी थी और दो बच्चें शेष रह गए थे,बचाव कार्य में लगे सैनिक को साथियों ने निकलने के लिए कहा तो उस सैनिक ने बच्चें को छोड़कर जाने से मना कर दिया और रात भर वह सैनिक बच्चों के साथ केबिल कार में रहा|पुनः तीसरे दिन जान पर खेलकर निसंदेह अपना काम किया,सभी लोगों को नीचे उतारा| सेना ने माना यह रेस्क्यू ऑपरेशन सबसे कठिन रहा|अततः सेना ने सैतालीस लोगों को सही- सलामत नीचे उतारा| इन सैनिकों की जितनी प्रशंसा की जाए कम होगा|
इस घटना से यह सीख मिलती है कि पर्यटक विभाग के लापरवाही के कारण ऐसी घटना को आमंत्रित करती है|स्थानीय जिला प्रशासन को समय-समय पर रोपवे का मरम्मत कार्य करना चाहिए,जिन्होंने अपनो को खोया है,उन्हें सांत्वना और आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए|जिम्मेदार लोगों पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न हो|
********************
गजल :- मैं तुम्हें चाहता हूँ....
मैं तुम्हें चाहता हूँ इस कदर||
किसान चाहे फसल जिस कदर|
मैं तुम्हें चाहता हूं इस कदर||
तितली चाहे फूल जिस कदर|
मैं तुम्हें चाहता इस कदर||
मीन चाहे पानी जिस कदर|
मैं तुम्हें चाहता इस कदर||
चातक चाहे स्वाति नक्षत्र का बारिश जिस कदर|
मैं तुम्हें चाहता इस कदर||
मीरा चाहे श्याम जिस कदर|
मैं तुम्हें चाहता हूँ इस कदर||
भक्त चाहे ईश्वर जिस कदर|
मैं तुम्हें चाहता हूँ इस कदर||
धड़कन चाहे स्वांस जिस कदर||
मैं तुम्हें चाहता हूँ इस कदर||
राधा चाहे कृष्ण जिस कदर|
मैं तुम्हें चाहता हूँ इस कदर||
हनुमंते चाहे श्रीराम जिस कदर|
मैं तुम्हें चाहता हूँ इस कदर||
****************
श्रीराम जन्मोत्सव..!
चैत्र नवरात्र पूजा के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को सूर्यवंशी परिवार में राजा दशरथ के राजमहल में बड़ी रानी कौशल्या के पुत्र के रूप में एक बालक का जन्म हुआ,जिसका नाम पड़ा राम|राम के जन्म के साथ ही अयोध्यावासी खुशी से गीत गाने लगे-
"भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी|
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी"||
रामनवमी भगवान राम के जन्मदिवस के अवसर पर मनाया जाता है|भगवान राम का जन्म चैत्र नवरात्रि के दिन हुआ था|यही कारण है कि हिन्दू धर्म लोग भगवान राम के जन्मदिन को रामनवमी के रूप में बड़ी धूम-धाम से मनाते हैं|
राम के जन्म का एकमात्र उद्देश्य मानव मात्र का कल्याण करना,मानव समाज के लिए एक आदर्श समाज की मिसाल पेश करना और अधर्म का नाश कर धर्म की स्थापना करना|धर्म का अर्थ किसी विशेष धर्म के लिए नहीं बल्कि एक आदर्श कल्याणकारी की स्थापना से है|राम सिर्फ एक नाम नहीं,राम एक आदर्श,राम एक सत्य है| पितृभक्ति,मातृभक्ति,गुरुभक्ति,भ्रातृ- प्रेम,मित्र-प्रेम और समस्त संसार के मनुष्य,पशु-पक्षियों का प्रेम राम में विद्यमान है|राम प्रत्येक रिश्ते-नाते को बखूबी निभाते हैं| राम एक धर्म विशेष नहीं, राम तो सभी के है| राम का पुरुषोत्तम रूप सभी का आदर्श है| राम व्यक्ति मात्र नहीं, राम कर्म है, धर्म है, वचन है-
"रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई"|
राम पूज्यनीय के साथ- साथ अनुकरणीय भी है|राम भाई-भाई में प्रेम का प्रतीक है|पितृभक्ति का साक्षात् मूर्ति है|मनुष्य जाति के लिए राम सत्य, प्रेम,भाईचारा,आदर्श के प्रतीक है|भगवान राम के विचार, संस्कार को आत्मसात कर के श्रीराम जन्मोत्सव मनाने का उद्देश्य पूरा हो सकता है|
*********************
कविता :- आशाओं के दीप..!
अपने अरमानों को सजाएं रखना,
गिरना - उठना, फिर गिरना,
उठकर फिर चलने लग जाना,
आशाओं के दीप को जलाएं रखना|
आंसुओं को छुपाना,खुशी में, मुस्कराना,
बस चलना -चलना -चलना,
थोड़ा रुक -सा जाना,
उठकर फिर चलने लग जाना,
आशाओं के दीप को जलाएं रखना|
जीवन में आंधी- तूफान का आना,
तूफान का थमने का इंतजार न करना,
बस चलना-चलना-चलना,
थोड़ा रुक- सा जाना,
आशाओं के दीप को जलाएं रखना|
कभी सुख का होना, कभी दु:ख का होना,
कभी जिंदगी पर इतराना, कभी मलाल करना,
बस चलना- चलना- चलना,
थोड़ा रुक - सा जाना,
आशाओं के दीप को जलाएं रखना|
फूलों -जैसे खिलना, खिलकर मुरझा जाना,
फिर खिलना, खिलकर मुरझाना,
बस चलना-चलना-चलना,
थोड़ा रुक - सा जाना,
रुक कर फिर चलने लग जाना,
आशाओं के दीप को जलाएं रखना||
*************************
खोरठा कविता :- झारखंडी युवा..!
जेकरा जिताय लो हमर काका-काकी,
वहे लुटी लेलको झारखंड के माटी,
सोना ऐखन झारखंड हमर,
होय गेलो माटी- माटी,
हाय रे हमर झारखंडवासी,
जेकरा जिताय लो हमर काका-काकी|
वहे लुटी लेलको झारखंड के माटी||
जल-जंगल के बात करे वाला हेमंत दादा,
भूली गेलो युवाओं के नौकरी के वादा,
नेता-मंत्री लोगन खातिर नया -नया गाड़ी,
झारखंड के युवा पीढ़ी के बनाय देल भिखारी,
आरो झारखंड के विकास खातिर खजाना खाली,
हाय रे हमर झारखंडवासी,
जेकरा जिताय लो हमर काका-काकी|
वहे लुटी लेलको झारखंड के माटी||
झारखंड इक्कीस साल के होय गेलल,
जवानी में बूढा झारखंडी युवा भे गेलल,
जे भी पेयले झारखंड के कुर्सी,
बढाई देलक हम युवाओं के धकधकी,
हाय रे हमर झारखंडवासी,
जेकरा जिताय लो हमर काका-काकी|
वहे लुटी लेलको झारखंड के माटी||
**************************
लघुकथा :- मेघा जल्दी आ जइयो..!
.......... बिरजू सिर पर हाथ रखकर आसमां की गहराई को बूढ़ी ऑंखों से नापने की कोशिश रहा था, लेकिन बूढ़ी आंखें आसमां की गहराई को नापने में नाकाम रही| ........ एका-एक ढाक की आवाज के साथ... सुनों... सुनों ... सुनों....गाँव वालों...कल सुबह चार बजे हम गाँव वाले शहर की ओर पलायन करेंगे,क्योंकि गाँव के पंचों ने मिलकर यह निर्णय लिया है कि मौसम को देखकर ऐसा लग रहा है कि इस वर्ष भी बारिश नहीं होने वाली है| इस बात को सुनकर आसमां को नापते हुए बिरजू धम्म कर जमीन पर बैठ गया| पोता दौड़ कर आया और उसे खटिया में ले जाकर सुलाया तथा दादा के लिए पानी लाने गया|.......... वैशाख- ज्येष्ठ की तपिश, दूर- दूर तक मेघ का कोई अता-पता नहीं| बिचड़ा बौने का समय नजदीक आ रहा है| किसान परेशान, पेड़- पौधे सूख रहे हैं| नदी- तालाब में पानी नहीं, प्रकृति से जैसे हरियाली इतिहास बन चुकी है| पशु- पक्षी, मनुष्य की तरह भीषण गर्मी में व्याकुल|
बहत्तर वर्षीय बिरजू खटिया से लेटे- लेटे सोच रहा है इससे पहले कभी ऐसा दिन नहीं देखा था| हमारे समय में तो बारिश की कमी कभी नहीं होती थी| आज से बीस बरस पहले समय- समय में बारिश हो जाती थी| पता नहीं अब दो-तीन साल से ऐसा क्यों होने लगा| विज्ञान हर क्षेत्र में प्रगति कर रहा है, किन्तु बारिश लाने में असफल है|
बिरजू की उदासी को देखकर श्याम बताया कि अत्यधिक पेड़- पौधों की कटाई,बड़े-बड़े कल-कारखाने का खुलना,अनियंत्रित वायु प्रदूषण, समय पर वर्षा न होने का प्रमुख कारण है| पोते का बात सुनकर बिरजू बोला- तुम्हारा विज्ञान हर क्षेत्र में तरक्की कर रहा है| क्या तुम पानी बरसाने के लिए कोई उपाय नहीं कर सकते हो?दादा की बात सुनकर श्याम बोला एक उपाय है प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन काल में कम से कम पांच पेड़ लगा दे तो आने वाले कुछ वर्षों में सही समय में बर्षा हो सकती है|
घर के जरुरी समान को समेटते हुए श्याम दादा जी से कहा गाँव वाले शहर जाने के लिए तैयार है| कुछ लोग गाँव छोड़कर जा चुके हैं| भारी मन से बिरजू अपनी पुरखों की पुश्तैनी जमीन-जायदाद, बाग-बगीचे को प्रणाम किया, आंगन की मिट्टी को सिर पर लगाया और आंसू पोछते हुए घर के आंगन से जैसे ही बाहर कदम रखा,देखते ही देखते आसमां में चारों ओर काली घटा उमड़ने लगी और भारी गर्जन के साथ बिरजू के साथ-साथ आसमां भी रोने लगे| बिरजू के गम के आंसू खुशियों के आंसू में बदल गए|बारिश रुकते -ही गाँव वाले कुदाल लेकर अपने-अपने खेतों की ओर दौड़ पड़े|
*************
मेरी अभिलाषा..!
अंधेरे में चिराग लिए चलता हूँ,
उजाला का उम्मीद लिए फिरता हूँ,
गिरता हूँ उठता हूँ थक कर बैठ जाता हूँ,
जीने की लक्ष्य लिए बढ़ता हूँ|
अंधेरे में चिराग लिए चलता हूँ||
रोता हूँ हंसता हूँ,
खुद से बातें करता हूँ,
स्वयं से दिन-रात लड़ता हूँ,
लड़- लड़ स्वयं को गढ़ता हूँ,
जीने की लक्ष्य लिए बढ़ता हूँ|
अंधेरे में चिराग लिए चलता हूँ||
तेरा- मेरा कोई मेल नहीं,
मैं अपने पीछे पड़ता हूँ,
पल- पल कदम उठाने को,
मैं नीत- नीत आगे बढ़ने को,
जीने की लक्ष्य लिए बढ़ता हूँ|
अंधेरे में चिराग लिए चलता हूँ||
मेघ बन उड़ना चाहता हूँ,
रिमझिम- रिमझिम बरसना चाहता हूँ,
तप्त धरा में ठंडक नहीं,
बर्फ बनकर ठंडक देना चाहता हूँ,
जीने की लक्ष्य लिए बढ़ता हूँ|
अंधेरे में चिराग लिए चलता हूँ||
भौरों -सा गुनगुनाना चाहता हूँ,
झरना -सा बहना चाहता हूँ,
तारों -सा टिमटिमाना चाहता हूँ,
सूर्य -सा चमकना चाहता हूँ,
शशि -सा शीतलता चाहता हूँ,
जीने की लक्ष्य लिए बढ़ता हूँ|
अंधेरे में चिराग लिए चलता हूँ|
मैं जन- जन का गीत लिए फिरता हूँ||
********************
कविता :- बंगाल की आग ( मार्च :- 2022. )
किसने खेली खून की होली?
ये तो बताना होगा,
जनता को जगना होगा,
बीरभूम की माटी में,
किसने खेली...........?
राजनीतिक दलों के फेर में,
ऐसे उझले मानुष -जन,
खून की होली ऐसी खेली,
जले हुए को पहचान न पाई,
बीरभूम की माटी में,
किसने खेली.......?
हिन्दू- मुस्लिम की आड़ में,
तुम गुंडागर्दी करते हो,
हिन्दू- मुस्लिम की नारा को,
अब तुम कलंकित करते हो,
बीरभूम की माटी में,
किसने खेली......?
दस मानुष को जलाया गया,
कोई न बचाने आगे आया,
दमकल कर्मी को रोका गया,
जलने को सबको छोडा़ गया,
बीरभूम की माटी में,
किसने खेली खून की होली??
***************
लघुकथा :- परीक्षा..!
वार्षिक परीक्षा शुरु होने के एक महीना पहले से अमित कुमार छात्राओं को तैयारी कराने के लिए दो- दो घंटों के अतिरिक्त कक्षाएं लेने लगे तथा एक- एक छात्राओं को खड़ा करके प्रश्नोत्तर करवाने लगे| अधिकतर छात्राओं को प्रश्नोत्तरी विधि से तैयारी करने में आनंद आने लगा, तो कुछ के अंदर डर सताने लगा, पता नहीं सर की डांट आज किसे लगेगी? मार्च महीने के अंतिम सप्ताह में सबसे पहले हिन्दी विषय की परीक्षा होने वाली है| परीक्षा को लेकर सभी छात्राएं नियमित रुप से कक्षा में उपस्थित रहने लगी, शिक्षक तरह- तरह के प्रश्नों से सभी छात्राओं को रु- ब- रु कराते हैं|परीक्षा जैसे- जैसे नजदीक आ रहें हैं, छात्राएं उत्साह के साथ- साथ दवाब का भी अनुभव कर रहीं हैं| छात्राओं का दो साल से लाॅकडाउन के कारण स्कूल बंद रह जाना कहीं न कहीं उसके पढ़ाई पर गहरा प्रभाव पड़ा है|
कोरोना-19 वायरस ने खास कर छात्राओं को पढ़ाई से कोसो दूर कर दिया, क्योंकि गरीब परिवार की छात्राएं ऑनलाइन कक्षाएं नहीं कर पाई| पिछले वर्ष विद्यार्थियों को पिछली कक्षाओं का रिजल्ट देखते हुए प्रमोट कर दिया गया था|
इस बार विद्यार्थियों के साथ- साथ शिक्षकों को भी ज्यादा मेहनत करने पड़ रहे हैं, क्योंकि बच्चों के अच्छे रिजल्ट से ही शिक्षक को खुशी और पहचान मिलती है|
विद्यालय से घर जाने के बाद अमित कुमार बच्चों के परीक्षाफल को लेकर बहुत चिंतित थे|बारहवीं कक्षा के छात्राओं को डांटना अमित कुमार को अच्छा नहीं लग रहा था, लेकिन एक शिक्षक अपना फर्ज से बंधा था, अपने छात्राओं को अत्यधिक मेहनत कराने के लिए|
अमित कुमार सोच रहे थे कि हिन्दी शिक्षक होने के नाते उनका छात्राओं के प्रति नैतिक मूल्यों, कर्तव्य बोध, रहन-सहन और संस्कार देना उनका प्रथम कर्तव्य है|
शिक्षक समाज का दर्पण होता है,वह उन सभी बच्चों के द्वारा हमेशा परीक्षा देते रहते हैं,एक शिक्षक का परीक्षा कभी खत्म नहीं होता|
*******************
लघुकथा :- चराई पाखी..!
( गौरैया)
प्रफुल्लित मन से पत्नी राधा को आवाज लगाते हुए बोले,आज आमादे बाड़ी ते ओनेक बोसोर पोर चराई पाखीर जोड़ा ऐसेछे| पत्नी राधा घर में फुदकते हुए गौरैया के जोड़ें को देखकर दाना लाने अंदर जाती है|
आज से दस- पन्द्रह वर्ष पूर्व लगभग सभी फूस और मिट्टी के घरों में मिलने वाली गौरैया एक दम -सी लुप्त हो गई| मनुष्य ने अपना पक्की घर बनाने के चक्कर में इन नन्ही परिंदों का घर को नष्ट कर दिया| गौरैया पेड़- पौधे में अपना घोंसला सुरक्षित नहीं मानते, इसलिए मनुष्य के घरों के दीवारों और छप्परों पर अपना घोंसला बनाते हैं|
हम मनुष्य को भी इन गौरेया के संरक्षण के लिए दीवारों पर कुछ रिक्त स्थान छोड़ देना चाहिए| ताकि इनकी संख्या बरकरार रहे| पर्यावरण के लिए गौरैया किसान मित्र भी कहा जाता है| क्योंकि ये छोटे- छोटे कीट- पतंग को अपना निबाला बनाते हैं, जो फसल के लिए अच्छा होता है|
पत्नी राधा दाना लेकर आती है और गौरैया को बुलाती है| गौरेया दाना खाने नहीं आती है, लेकिन राधा की फूलदानी में अपना घोंसला बनाने में लग जाती है|
यह देखकर ओम को बहुत खुशी होती है|
ओम, राधा से पानी का बोतल लेते हुए ऑफिस के लिए निकल जाते हैं और राधा फूलदानी में गौरेया के जोड़ें को निहारने लगती है| राधा संकल्प लेती है वह इन चिड़िया की अच्छी से देखभाल करेगी|
***************
लघुकथा :- गुलाल..!
हैलो...... कौन...?
पहचानों....
हूं....... चंदा दीदी
नहीं.....
प्रियंका दीदी
नहीं....
नीलू दीदी
नहीं....
आवाज से पहचानों
*नहीं पहचान पा रहे हैं| शोर-गुल और नेटवर्क प्रोब्लम के कारण आवाज पहचान में नहीं आ रही है*|
ओके भूल गए हो, मत पहचानों..
नाम बता दो.........
...... राधा
ठीक है दो बजे के बाद बात करते हैं, एक अजीब- सी खुशी के साथ कृष्णा ने राधा से कहा|
फोन कट जाता है और कृष्णा अठारह वर्ष पूर्व की पुरानी यादों में खो जाता है|
एक साथ पढ़ने वाली मासूम- सी राधा, समय और परिस्थिति वश अब बहुत समझदार हो गई है| लेकिन उनकी मासूमियत आज भी वहीं है जो पहले थी| कब दो बज जाता है पता ही नहीं चलता है|
झपकी मारते हुए, मोबाइल काॅल के साथ कृष्णा चौककर उठता है| हाँ बोलों,खामोशी......के साथ बात शुरु होती है- दोनों पुरानी बातों को बड़ी खमोशी से याद करते- करते चुप- सा हो जाते हैं|
बातों ही बातों में पता चलता है राधा बालिका उत्थान के लिए कार्य करती है, ये सुनकर कृष्णा को बहुत खुशी होती है| राधा सोचती है इस होली में गुलाल उडे़ या न उडे़, लेकिन मेरे मन में अठारह साल से जो तन्हाई छुपी हुई थी, इस होली में गुलाल बनकर उड़ रहा है| राधा, कृष्णा को होली की शुभकामनाएं देती है और गुलाल उड़ाने लग जाती है| कृष्णा उनके निस्वार्थ प्रेम में खो जाता है.....
********************
लघु कथा :- होलिकात्सव..!
आम के पेड़ के नीचे खटिया में बैठा हुआ अस्सी वर्षीय रामू मन ही मन अमरबेल की तरह झुम रहा था| क्यों न झूमे भाई चार साल बाद इतनी सुन्दर फसल होने वाली है| खलियान में फसल देखकर रामू फूले नहीं समा रहा है|फागुन के महीने में जंगल में पलाश के पुष्प और किसानों के घर में रवी फसल न हो तो रंगों का त्यौहार का आनंद नहीं आता|
आज रात होलिका दहन की तैयारी हो रही है| चारों ओर खुशी का माहौल है| रात्रि के अंधकार में होलिका दहन करके सभी अपने- अपने घर चले जाते हैं|
....एक कौतूहल भरी चीख के साथ गाँव वालों की नींद खुलती है|*सब कुछ खत्म हो गया.....
पूरा खलिहान जल गया.... होलिकोत्सव की एक चिंगारी ने सब कुछ खत्म कर दिया|
बच्चे से बूढ़े तक की चीख सुनाई देती है|
रामू और अन्य गाँव वालों का सब खुशी एक पल में खत्म हो जाता है| अब तक होली का त्यौहार मनाने का विचार गाँव वाले छोड़ चुके हैं| सभी के चेहरे पर सिर्फ गरीबी, लाचारी, बेबसी नजर आ रहें हैं|
एकाएक गाड़ी में जोर से ब्रेक लगने की आवाज से सबकी चिंता मग्न ध्यान गाड़ी की ओर जाता है| उसमें दो सरकारी बाबू उतरते है| गाँव वाले सरकारी बाबू को बैठने के लिए खटिया बढ़ा देते हैं|
सरकारी बाबू एक-एक कर सभी किसानों को आवाज लगाते हैं, और कहते हैं सभी के रवी फसल की बीमा करवाई जा चुकी थी| आप सभी एक-एक करके अपना बीमा का पैसा ले लीजिए| रामू को समझ नहीं आ रहा था कि फसल के जल जाने के बाद भी पैसा कौन दिलवा रहे हैं|
एका - एक फोन आता है.... हैलो बापू.. फसल का पैसा मिल गया न| बेटा की आवाज सुनकर रामू का आवाज भारी हो जाता है| पुत्र मोहन बताते हैं बापू पूरे गाँव वाले का फसल बीमा करवा दिए थे, इसलिए सबको फसल का पैसा मिला|
फसल का पैसा पाकर, गाँव वाले होलिकोत्सव मनाने लग जाते हैं और जले हुए होलिका की राख को उड़ाने लग जाते हैं|
******************
लघु कथा :- बोझावाली..!
संजली.... ओ...... संजली..... आज जंगल जाएगी ना लकड़ी लाने| हाँ दीदी जाऊंगी, घर में खाना पकाने के लिए जलावन खत्म हो गई है और बिना जलावन का बच्ची की दूध भी तो गर्म नहीं कर सकती|
कुछ देर बाद संजली एक कचिया और रस्सी लेकर अपनी छ: महीने की बेटी को पीठ में बांधकर लकड़ी लाने के लिए चल पडी़| इंटर पास संजली सोची भी नहीं थी कि झारखंड राज्य बनने के 21 साल बाद भी उसके पति को काम के तलाश में अपने पत्नी और एक महीने की छोटी -सी बच्ची को छोड़कर प्रदेश जाना पड़ेगा|
इन बातों को सोचती हुए संजली कब जंगल पहुँच गई, उसे तनिक भी पता न चला| गांव की सभी महिलाएं सूखी लकड़ी का गट्ठर बांध कर गांव वापस आने लगी| संजली अपनी गाँव की औरतों से बहुत पीछे छूट गई| वह बार- बार बोझा उतार कर अपनी बेटी को दूध पिलाया करती है|
शांत सड़क और घनघोर कुहासा को चीरती भारी अंतर्मन से संजली आजादी के 75 साल बाद भी गरीबी से जुझती आगे बढ़ रही थी | पेड़- पौधे झुक- झुक कर सलाम कर रही थी,और नन्ही- नन्ही चिड़ियाँ गीत सुना रही थी| बच्ची की रोने से पहले संजली अपने सिर से लकड़ी का बोझा तो उतार चुकी ,लेकिन गरीबी की बोझा नहीं|
**********************
लघु कथा :- आज की शिक्षा..!
पापा रिमझिम के आंसू को पोछते हुए मन- ही- मन सोच रहे थे कि रिमझिम को पढ़ाई करवाने के लिए मैं दो-दो टयूशन मास्टर को घर बुलाता हूँ| स्कूल में भी अच्छी पढ़ाई होती है| लेकिन मैं किताबी ज्ञान को ही सब कुछ समझ रखा था|
इसलिए हमेशा पाठ्य- पुस्तक पढ़ने के लिए कहता था| आज पता चला बच्चे को किताबी ज्ञान के साथ- साथ सामान्य ज्ञान की भी जरूरत है|
पापा कुछ कहते, तब तक मासूम -सी रिमझिम सो चुकी थी..|
********************
लघु कथा :- माँ एक मूरत..!
........ क्या कहूँ चाची! इस बार फिर लड़की हुई अंचला ने अपनी पड़ौसी चाची लक्ष्मी से कही| चावल से कंकड़ चुनती हुई बहु राधा का दिल बैठ गया सासु माँ की बात सुनकर| घर में चार बेटी पहले ही कम थी क्या बुदबुदाती हुई चंचला बहु को आंख दिखाती हुई आंगन से अंदर आ गई|
बहु राधा छ: साल पीछे की यादों में खो गई, जब उन्होंने दो लड़की होने के बाद ऑपरेशन करवा लेने की बात कही थी, उस समय सासु माँ ने ही जिद करते हुए ओर बच्चे लेने की कसम दे दी थी| राधा सोच रही थी इस पुरुष प्रधान समाज में लड़कियों का जन्म लेना एक अभिशाप जैसा है | एक तो बच्चियों के जन्म के समय जिन्दगी और मौत से लडा़ई, और अब सासु माँ की प्रतिदिन की किचकिच| माँ- माँ देखों वार्षिक परीक्षा में कक्षा षष्ठ में प्रथम होने के लिए मुझे पुरस्कार मिला| राधा अचानक पुरानी ख्यालों से बाहर होती है और श्री को मिला पुरस्कार निहारने लगती है| श्री प्रतिदिन अपनी माँ राधा को स्कूल में सीखी हुई महिला सशक्तिकरण की बात बताती है और कहती है माँ मैं एक दिन बहुत बड़ा ऑफिसर बनूंगी अमित सर कहते हैं| श्री की बात सुनकर राधा के आंखों में आंसू आ जाती है| श्री अपने नन्हीं हाथों से माँ की आंसू को पोछती हुई गले लग जाती है , माँ मुस्कुरा देती है|





































कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें