गुरुवार, नवंबर 09, 2023

रचना :- सपना चंद्रा..!

दिल्लगी उसी से जो दिल से नहीं था
सफ़र में कोई भी साहिल नहीं था

कुछ उसने कहा,कुछ दिल ने सुना था
कभी भी मगर वो हासिल नहीं था

चेहरों में कोई चेहरा आमिल नहीं था
सितारों सा कोई झिलमिल नहीं था

ख्वाहिशों की खातिर झूक जाते मगर
तबीयत में मेरे यह शामिल नहीं था

शराफ़त से जीना ही उसूल जिंदगी का
उनको लगा कि मैं काबिल नहीं था

बात अपनी आखिर समझाता किसे मैं
दो-चार से ज्यादा फ़ाजिल नहीं‌ था

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दोजख..!

कौन सी है ये दुनिया..
ये स्वर्ग है तो फिर...
कीचड़ में कमल क्यूँ..?
अगर नर्क है तो फिर...
ईश्वर नाम सबल क्यूँ..?
अगर दोनों नहीं है
तो फिर इतनी गहरी
खाईयाँ क्यूंँ..???
क्या यही दोजख है
भँवर और लहर के बीच!
कोई आता है,कोई जाता है
एक दुनिया से दूसरी दुनिया
का एक सफर तो नहीं..
क्यूँकि पूरे जीवन यात्रा में
कुछेक वर्ष ही स्वर्णिम है। 
जब हर चीज चोटी पर हो,
बात हुस्न की,दौलत की या
काया की माया की...
फिर रुग्ण शरीर,झूलते चेहरे
थका शरीर!!
हम और अहं सब यहीं के
टिक-टिक साँसों पर ऐतवार कहाँ,
आग बरसती आँखे पथरा जाती
दया,याचना और तिरस्कार
से भरपुर यह यात्रा...
तब आएगी मौत भी हँसते हुए। 
उफ्फ ये जीवन ....

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क्षितिज पर..!

दूर क्षितिज पर हुआ मिलन है
कहें आज सिंदुरी शाम है ये
रेत का सागर बहते-बहते
पुछा किसका नाम है ये

यादें टकराती रही लहरों से 
जाने क्यूँ आकर बार-बार
विस्मृत सा बस होना चाहे
पर कोई लिख जाता हरबार

थपेड़ों से मिलती चोटें इतनी
हल्की चुभन में दर्द बहुत है
आँखें तो जैसे झील बनी है
भीतर मौसम सर्द बहुत है

तन्हा-तन्हा औ खोये से अब
इस मन के भीतर रात घना सा
कभी सूरज पहुँच पाएगा क्या
जब सामने सब है अनमना सा। 


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मेघ और दीप्त का....
रिश्ता एक प्रीत का....
स्याह बादल जल भर ..
आवारा क्यूँ बिचरता है..
मिलने को रश्मियां से....
वो भी तो तड़पता है....
एक क्षणिक सा स्पर्श....
और ,तरंगे कड़कती है...
फिर बिछोह की पीड़ा...
संग अपने ढोती है...
इस मिलन की चाह में...
करती है इंतजार ...
आए मौसम बारिश का...
खत्म बात गुजारिश का...
बिन मेघ अस्तित्व विहिन...
भूल ताकत रहती क्षीण...
मिलन एक क्षण का....
ये इश्क किस रंग का...
इस मिलन बिछोह की 
मूक गवाही देकर....
आखिर !!!!!!!!
वो अंबर भी तो रोता है...


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किसी और से दिल लगाते कैसे
तेरे सिवा  कोई  भाया नहीं  था

जाने कैसे खबर  सबको  हुई थी
राज किसी  को बताया नहीं था।
 
तुमसे ही कहें अपने दिल की बातें
कभी लगा हमको पराया नहीं था। 

कशिश थी,नमी थी,जरा सी बग़ावत
मगर बगैर तेरे चैन पाया नहीं था। 

रूबरू मिलने की जो चाहत हो आई
गुमां का कहीं कोई साया नहीं था।

दरमियां हमारे कोई फासला नहीं था
दिल इस कदर कभी रोया नहीं था। 

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सागर है पास, बैठा प्यासा किनारा है
कुछ उनसे पुछ जिन्हें जिंदगी ने मारा है। 

जमाने से शिकायत होती तो कह देते
मगर अपनों में रहकर अपनों से हारा है।

गर्दिश के दिन भी क्या खूब रहे यारों
शुक्र कि अपने हाथ नहीं कहींं पसारा है।

बिक रहा ईमान धेले सा भी मोल नहीं
मतलब की खातिर जीता जमाना सारा है। 

कुछ तजरबा हुआ थोड़ी देर हुई मगर
जहां की भीड़ में कौन कितना हमारा है। 

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कुछ कदम ही सही,मेरे साथ तो चलो
आ जा कि मुस्कुराए जमाने गुजर गए। 

कोई खिलौना नहीं,जिंदा इंसान हूँ मैं
दिल में जख्म छुपाए जमाने गुजर गए। 

दफ्न है इस दिल में टीस एक पुरानी सी 
दर्द का हाल जताए जमाने गुजर गए। 

लौट आने की बात तो कबके गुजर गए
दिल में ही बात दबाए जमाने गुजर गए। 

सोचूँ तो खिलखिलाए ज़माने गुज़र गए
खुद का साथ निभाए ज़माने गुज़र गए। 

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कहीं कराहता हुआ
एक समृद्ध किले का 
जर्जर अवशेष ...
कैसे गुमनामी को
सह पाता है...
कोई इसकी सिसकियां
सुनता क्यूँ नहीं..
अनकहे से दर्द को
पढ़ता क्यूँ नहीं
बेचारगी में बदल गया
उस हद का कद
कैसे टुकड़ो में टूटा
अपनी ही सरहद
कभी जिसकी दीवारें
जीवंत हो बोलती थी,
आज भरभराती हुई
ईंट की तह क्यूँ है..?
कहने को बेकरार
कई ऐसे राज
दफ़न क्यूँ है...
रौशनी और अंधेरा
दीवारों के आरपार
अपनी-अपनी जगह
मौन क्यूँ है..??

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जब आँखों में कोई ख्बाव भाता ही नहीं है
ऐसे खुदा से बोलो फरियाद क्या करें हम। 

गुजरा हुआ माज़ी सबक ऐसा सिखा गया
किसी नये मसले पर इरशाद क्या करें हम। 

औरतों के हक में इमदाद भला क्या करें 
ख्यालात ही ऐसी कि आजाद क्या करें हम। 

चेहरे पर चेहरे रख फरेब देते रहे हैं लोग
चोट लगी हो दिल पर दिलशाद क्या करें हम। 

अश्कों को पीकर होठों को बंद रखना अच्छा
हाथ गर छुट ही गया फिर रूदाद क्या करें हम। 

शिकवे सारे रह गए ,ख्बाव अधूरे रह गए
उसे याद करके खूद को बर्बाद क्या करें हम।

उल्फत की सजा के अब हकदार हो रहे हैं
किस्मत अगर रही रूठी नाशाद क्या करें हम।

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बंदिश :-आने को है..!

शाख पर फूल है,बहार है चमन में
ख़ुशनुमा सी शाम अब आने को है।

पलभर की देर है सवेरा होने को है
रंजो-गम की रात बीत जाने को है।

जान जाने लगी है वो आने को है
दरमियां जो वादे वो निभाने को है।

छँट जाएगा अंधेरा रौशन होने को है
बस घर-घर दीप जल जाने को है। 

आँखों वाले अंधे,कान वाले बहरे 
ऐसे इंसा बस लड़ने- लड़ाने को है।

उल्फ़त की बातें सीखो इन बहारों से
खुशियाँ ही खुशियाँ ये कमाने को है।

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महत्व..!

"सुगनी !.बाजार नहीं चलेगी।धनतेरस है तो कुछ खरीद लेगें।" अपनी पड़ोसन से मालती ने कहा।
"मालती!.मेरा मन नहीं होता इस धनतेरस में बाजार जाने का,क्यूँकि ये हम जैसों के लिए नहीं है।"
"अरे काहे नहीं है..?सोना-चांदी बिकती है तो मिट्टी भी तो बिकती है।"
"मिट्टी तो नहीं रोती कभी...सुगनी पागल है तू!"
"मालती याद है न!.पिछली बार तुम्हारा इंतजार करने के लिए एक दुकान के सामने खड़ी थी और उसने कितनी बुरी तरह झिड़का था।"
"कहा ये झोला-झक्कड़ लेकर यहाँ मत खड़े रहो,जाओ कहीं और।" 
"मुझे भूले न भूलाए बनता है वो दिन,घर आकर बहुत रोई थी।"
सुगनी भी यह सुनकर थोड़ी रुआंसी सी होकर बोली,"छोड़ न!काहे को याद करती है।"
"कुबेर ना आए ना सही पर लक्ष्मी तो हमारे घर आएगी।झाड़ू में लक्ष्मीजी का बास होता है इससे सकारात्मक ऊर्जा आती है।" 
"हमलोग अपनी जरुरत की चीज खरीदेगें ,कहते है इस दिन मिट्टी के दीये और झाड़ू खरीदना शुभ होता है।" 
"एक से प्रकाश होता है और दूसरे से घर की गंदगी साफ होती है।" 
"इससे ज्यादा और हमें क्या चाहिए.. साफ-सुथरे माहौल में जिंदगी रौशन रहे।"


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भूख..!

हफ्तों से सड़क के बायीं ओर बने पैदल पाथ के एक किनारे उसने अपना डेरा जमा रखा था।
मैले -कुचैले कपड़े और शरीर पर भिन्नाती मक्खियाँ ..दो दिन हुए खाने को कुछ नहीं मिला था। 
पागल या असहाय समझ आते-जाते लोग कुछ पैसे फेंक जाते पर वह पैसों को उठाकर मुँह में डालता और बुरा सा चेहरा बना फेंक देता। 
उसकी ऐसी अवस्था पर एक भूख ही थी जो उसको रह-रहकर कुरेदती रहती। 
उसे रुपये में स्वाद का अभाव लगता जिसे समझने वाला कोई नहीं था। 
लोग कहते," पागल है क्या..कोई रुपया फेकता है भला।"

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बस इतना सा..!

आँख खोलते ही
सामने दिखा था
एक पगडंडी, एक रास्ता
कैसे कहूँ कि कितना..
किससे मेरा वास्ता.
पगडंडी पर जीवन
खिलखिलाती थी...
रास्ता मेरे साथ ही
हमसफर सी चलती थी.
गिरकर,उठकर फिर
संभलना औ चलना
वहीं पगडंडी थी
और चंचल से मेरे कदम...
संकरा सा होता .
पर थाम लेते थे कदम....
लहलहाते खेत से 
मेरे मन की उमंग...
पाने को खुशियां
जद्दोजहद की जंग...

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चौराहा..!

हर सौ कदम पर 
एक चौराहा का होना
इंसान उसी चौराहा पर
चलता रहता है...
आगे बढ़ता जाता है
नयी पहचान के लिए...
बदलाव चौराहा का
उसके भाग्य में नहीं...
दिन,महीने,साल में
बस उम्र साथ चलती है..
एकदिन भूले-भटके 
जो इंसान आएगा..
चौराहे की शक्ल में
अपना खोया पता पाएगा..

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बदमाश लड़की..!
मनोहर की पहली पत्नी की मृत्यु करीब चार वर्ष पहले हुई थी। गरीबी या यूँ कहें कि बेचारी बचपन से ही अधूरी भाग्य लेकर पैदा हुई थी।
अपनी कोख से जन्म भी दिया तो एक बेटी ही..
कुछ दिन से बीमार रहने लगी थी। पता नहीं ये कौन सा ज्वर चढ़ा था जो उतरने का नाम ही नही लिया,,उसकी जान ही ले ली।
मालती नाम था उसका..वही जो कोमल लता सी होती है..देहरी की शोभा बढ़ाती हुई। 
कोई कहता देख कितना सुंदर सा नाम है तुम्हारा.. तभी तो ससुराल की मुख्य द्वार पर दोनों ओर से मालती की लताएँ उसका मन मोह लेती।
कोई भी दुख उसे उतना नहीं सालता,क्यूँकि उसे उम्मीद थी एक दिन जीवन के रंग जरुर बहुरेगें। 
पति की शिक्षा एक सुखमय भविष्य दे सकती है। 
चली गई चुपके से..कोई नीम-हकीम काम ना आया,दवा-दारू सब व्यर्थ। 
मनोहर पत्नी के गम में बच्ची को गोद में लिए फफक पड़ता,कैसे होगी इस नन्ही सी जान की परवरिश..?
सबने समझाया,गाँव में बसे माँ-बाप ने उसे जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया.."जा बेटा कुछ बन जा ताकि इसका भाग्य बदल जाए।"
मनोहर शहर वापस आ गया..मेहनत रंग लाई और सरकारी नौकरी मिल गई। 
सबके चेहरे खिल उठे..पर बच्ची समझ नहीं पाई हर किसी के चेहरे पर आई ये अचानक सी मुस्कुराहट का कारण।
एक अच्छे घर से रिश्ता आया था..गरीबी में पला अरमान कुलांचे भरने लगा।सरकारी नौकरी का मोलभाव बाजार में ऊँचे स्तर पर था सो उसने भी अपनी एक कीमत तय कर ली।
बाजार के भाव में पिता का रंग बदरंग हो गया ,वह बिक गया। 
दुल्हे के रुप में पिता को देख बच्ची पुछ बैठती है..
"पापा आप कहाँ जा रहे हैं..?"
"मैं!मैं तुम्हारे लिए नयी माँ लाने जा रहा हूँ। "
बच्ची खुश होकर गले लग जाती है। "पापा जल्दी आना लेकर नयी माँ को लेकर ,लोरी सुननी है।"
"हाँ!हाँ..ठीक है। अब देख तेरी बदमाशी नहीं चलेगी। " 
बच्ची इस शब्द से अंजान थी..उसने पुछा "ये बदमाशी क्या होती है..?"
"वही जो तू हमेशा बाप से चिपकी रहती है"..किसी महिला ने उसके गाल को पुचकारते हुए कहा।
"मैं तो पापा की बेटी हूँ न..?"
"अब सब भूल जा..खरीदने वाले ने तेरी भी कीमत अदा कर दी।"
"देख झोपड़ी की जगह पक्का मकान तैयार हो गया।"
"मुझे नहीं चाहिए नयी माँ..मुझे पापा के पास जाना है।"
आवाज लगाती उस बच्ची की निगाहें हँसते हुए चेहरों को देख रही थी जिसमे उसके अपने ही थे।
बच्ची है वक्त आने पर सब समझ जाएगी...
नयी माँ के आगोश में सारी खुशियाँ कैद हो गयी।अब वह बच्ची नहीं थी ,एक बदमाश लड़की थी। 

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आलेख :- हिंदी दिवस..!
किसी भी देश की मातृभाषा उसकी शक्ति होती है।देश के विकास में भाषा का योगदान होता है।14 सितम्बर 1949 को हिंदी को अधिकारिक भाषा  बनाई जाए,संविधान सभा में निर्णय लिया गया था।इसे राजभाषा का भी दर्जा मिले यह भी प्रयास किया गया। भारत के जन-जन के बीच सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा हिंदी है।
14 सितंबर 1953 को पूरे भारत में हर वर्ष 'हिंदी-दिवस ' मनाया जाता है। 
हिंदी विश्व भर में बोली जाने वाली भाषाओं में तीसरी भाषा है।विश्व की प्राचीन,समृद्ध और सरल भाषा होने के साथ -साथ हिंदी हमारी राजभाषा है।यह वो भाषा है जो हमें विश्व पटल पर  सम्मान,स्वाभिमान और गर्व  दिलाती है।
हिंदी को वैश्विक स्तर पर प्रचार और प्रसार के ख्याल से दो बार मनाया जाता है।
विश्व हिंदी दिवस और राष्ट्रीय हिंदी दिवस जो कि 10जनवरी और 14सितंबर को मनाई जाती है।
इस दिवस के बहाने अहिंदी भाषी या हिंदी से परहेज रखने वाले भी इसे याद कर लेते है।हिंदी दिवस मनाने का उदेश्य भी यही है कि अंग्रेजी के बढ़ते चलन के कारण इसकी अनदेखी को रोका जा सके।
महात्मा गाँधी ने इसे मानक भाषा मानते हुए जनमानष की भाषा भी कही थी।इसे राष्ट्रभाषा के रुप में मानने का प्रयास निरर्थक ही रहा,परंतू इसे राजभाषा का दर्जा जरुर मिल गया।हिंदी एक आधिकारिक भाषा होने के साथ ही भारतीय संस्कृति की संवाहक भी है।
हिंदी दिवस मनाने का उदेश्य स्पष्ट है,ताकि लोग अपनी भाषा" जिसे मन की भाषा भी कही जाती है।यह मन के बंद पड़े ताले को खोलने में समर्थ है",से रुबरु हो सकें,क्योंकि जब तक हिंदी का उपयोग वृहत तौर नही किया जाएगा तबतक इसका विकास असंभव है।
हिंदी एक समृद्ध भाषा है जिसकी गरिमा उसकी शुद्धता है।हिंदी के प्रयोग में सिर्फ हिंदी ही होनी चाहिए।
 ये जो हिन्दी दिवस समारोह हिंदी क्षेत्रों में बड़े धूमधाम से मनायी जाती है वास्तव में अहिन्दी भाषी क्षेत्रो में मनायी जाए तो उत्तम  हो सकता है।अब तो बंगाल और दक्षिण भारत में भी हिंदी बोली जाने लगी है। हमें यह याद रखनी चाहिए कि वर्ष 1828 में प्रथम" हिंदी दैनिक" गैर हिंदी प्रदेश से ही प्रकाशित की गयी थी।
आज हिंदी का प्रयोग वृहत स्तर पर हो ,हर जगह प्रयास किए जा रहे हैं।चाहे हमारी मीडिया हो ..इलेक्ट्रानिक या प्रिंट मीडिया हिंदी अपना स्थान बनाए हुए है। देश भर में सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली समाचार पत्र का माध्यम हिंदी ही है।

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सक्षम..!
अनुप अपनी बहन सोमी को दंगल में देख खूद पर काबू नही कर पाया। बीते दिनों को याद कर भावूक हो उठा था। 
उसे वो दिन अच्छी तरह याद है जब सोमी एक छुई-मुई सी शर्मीली लड़की थी।
अक्सर मनचले उसे परेशान करते। कहीं भी आना -जाना दूभर हो गया था उसका। कब तक वह उसके साथ साये की तरह रहता। उसके सीधे और भोलेपन से अनुप चितिंत रहता।
आगे का सफर कैसे काट पाएगी वह..हर कदम पर मेरा सहयोग लेकर चलती है। 
इसी सोच-विचार पर खोया ..अचानक से वह उठ बैठा। 
क्यूँ ना इसे इस काबिल मजबूत और साहसी बना दिया जाए ताकि अपनी रक्षा वह स्वयं कर सके।
अगले दिन सुबह जगते ही अनुप सोमी को लेकर पास के अखाड़े में जा पहुँचता है। 
"पहलवान जी,ये मेरी बहन है और इसे मैं आपके पास लेकर आया हूँ ताकि आपके सानिध्य में यह एक फौलादी ताकत बनकर उभरे।"
"ये करेगी पहलवानी!..शरीर पर माँस के नाम पर चिड़ियाँ भर ही..नहीं हो पायगा इससे। ले जाओ घर और घर के ही काम-काज पर ध्यान देने को कहो।" 
"गुरुजी!. मैं सीखना चाहती हूँ पूरी शिद्दत से..अगर आप मुझे सिखा सकें तो।" 
"एकबार फिर से सोच लो लड़की ,इतना आसान नहीं है ये।"
"अगर बीच में छोड़ा तो फिर कभी नहीं आना मेरे सामने।"
"मुझे आपकी सारी शर्तें मंजूर है।"
घर-परिवार वाले विरोध करते लेकिन सोमी के साथ भविष्य में कोई अप्रिय घटना ना घट सके इसके लिए उसे मानसिक और शारीरिक दोनों ही तरह से मजबूत बनना होगा। 
सोमी को प्रत्येक दिन समाज के तानों का सामना करना पड़ता।पर अनुप हमेशा उसका मनोबल बढ़ाता रहता। 
तुझे जबाव देना है इनसब को सोमी,इसके लिए खूद को तैयार करना होगा।
सोमी के कठिन परिश्रम और अनुप का हर कदम पर अपनी बहन को साथ देना,...आज उसके सामने चलचित्र की भांति चल रहा था। 
ये वही सोमी है विश्वास ही नहीं होता। आज वह एक जिम ट्रेनर और कुश्ती की जानी-मानी खिलाड़ी है।कई लड़कियों का आर्दश बन चुकी सोमी एक मिसाल बन कर उभरी है। 

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लघुकथा :- बंधक..!
"सुन री छोरी!,काम करने के लिए ही तू यहाँ पर है।इसलिए नखरे दिखाने का सोंचना ही मत।" 
"तुम्हारा बाप तो बोल कर गया था कि सारे पैसे लौटा देंगे। लेकिन गया तो मर ही गया। "
"अब वो पैसे कौन चुकता करेगा..?बोल!!"
"मेरे यहाँ टकसाल है क्या..?"
"जैसा -जैसा मैं कहती जाऊँ वैसा करती जा। "
"दादी,मैं थक जाती हूँ और ये सब करना हमको अच्छा भी नहीं लगता।" 
बारह वर्षीय रानू ने बड़ी ही कोमलता से कहा था। 
बित्ते भर की लड़की और जबान इतनी बड़ी!!
"खबरदार जो दादी बोली,मुझसे रिश्ता जोड़ती है!मालकिन कह,समझी।" 
"जी दाऽऽआ..नहीं,नहीं !जी मालकिन। "
सारा दिन काम कराते हुए उस बच्ची के जख्मों पर जानकी देवी का कभी ध्यान ही नहीं जाता। नाजूक सी हथेलियाँ पानी के संपर्क में लगातार रहने से खराब होने लगी थी। 
रात को सोते समय भी हथेलियाँ रीसती रहती।दर्द के मारे नींद भी कहाँ आती थी। 
उसे रात होने की जितनी खुशी होती सुबह होने का उतना ही डर। 
पूजा-पाठ का पाखंड करने वाली जानकी देवी सुबह के चार बजतही आवाज लगाती। 
"अरे छोरी उठ जल्दी,हमारे ठाकुर जी के जगने का वक्त हो चला है। "
सारे कमरों में पानी के छींटे मारती रहती।पानी से अपार प्यार की वह मनोरोगी बन चुकी थी। जिसका खामियाजा उस घर में रहने वाले को चुकाना पड़ता।
बेचारी रानू,किस जन्म का पाप उसे यहाँ ले आया था। साँस लेने की भी फुर्सत नहीं थी। 
मालकिनऽऽ कहते हुए वह बेहोश हो गिर पड़ी...
अरे!,ठीक से चलती क्यूँ नहीं। चल उठ। 
कई बार आवाज लगाने पर भी हरकत न होता देख पास आकर देखने लगी। 
उसके हाथ को पकड़ उठाना चाहा तो, हथेलियों से रीसता पानी जानकी देवी के हाथों को भींगा गया। 
उसकी ऐसी हालत की वही तो जिम्मेवार थी। इस पानी के खेल में सब पानी -पानी हो गया।
 ग्लानि और शर्मिंदगी से अपने चेहरे को देर तक ढँक वह खड़ी रही।

**********************

तुम्हें पढ़- पढ़ हम देख लेते है
हम लिखेंगे तो कायदा हो जाएगा। 

यूँ गर  तुम  होते  रहे  रूबरु
हमसे यकीनन राब्ता हो जाएगा। 

तुम्हारी नजरों की ही जुस्तजू है
देखना एकदिन खता हो जाएगा। 

अक्स जिसका आँखों में मेरे कैद है
ऐसे तो नहीं कभी रिहा हो पाएगा।

वक्त ही तो है ठहरेगा ही नही
रूह जिस्म से  रिहा हो जाएगा। 

याद करते है,अकेले ही होते हैं
साथ जो चलो काफिला हो जाएगा। 

****************

लघुकथा :- कीमत..!
रोज की तरह ही रमा कमरे की साफ-सफाई कर रही थी .
कोनों मेें झाड़ू लगाते समय एक सिक्का कोने में दिख गया,पर उसने उसे वहीं छोड़ दिया.
कई दिनों से यह क्रम चल रहा था...
एक मन होता उठा ले फिर कुछ सोंच कर छोड़ देती.
कौन सा ज्यादा है,एक रूपए का ही तो सिक्का है.
सिक्का अपनी उपेक्षा से आहत होता,पड़ा-पड़ा अपनी कीमत ढूँढ रहा था.
पहले कितनी पुछ थी..किसी बच्चे के हाथ लगे तो फिर कितनी खुशी मिलती थी.अब तो बच्चे भी उसकी ओर नहीं देखते.
एकबारगी उसे लगा,अब वाकई उसका जमाना चला गया है.बड़े नोटों के मुकाबले उसकी क्या औकात..?
तभी उसने देखा किसी शुभ कार्य हेतू उसकी तलाश जोरों पर थी .
तभी रमा को याद आया..कोने में तो सिक्का है ही.कब से परेशान हो रही थी.
पर अब सिक्का थोड़ा मलिन पड़ गया था.
कोई बात नहीं...इसे रगड़कर अभी चमका देती हूँ.
फिर सगुण और यात्रा शुभ -शुभ हो जाएगा.
अब तो सिक्का चल निकला..बाहर की दुनिया देखे वर्ष बीत गए थे.

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अंगुलियाँ छुटती नहीं थी चलते हुए
पीढ़ी बता रही है समझदार हो गए। 

आदमी थे कभी काम के बेकार हो गए
लगा जैसे हम सबके तलबगार हो गए। 

और क्या चाहिए तू बता और जिंदगी
अपनी बर्बादी के जिम्मेवार हो गए। 

अपनी खता का जबसे पता पूछते है
दोस्ती में सबके गुनहगार हो गए। 

होता रहा जिक्र दुनिया की जुबान पर
जाने कब कागजी अखबार हो गए। 

*********************

तुम्हें पढ़- पढ़ हम देख लेते है
हम लिखेंगे तो कायदा हो जाएगा। 
यूँ गर  तुम  होते  रहे  रूबरु
हमसे यकीनन राब्ता हो जाएगा। 

तुम्हारी नजरों की ही जुस्तजू है
देखना एकदिन खता हो जाएगा। 

अक्स जिसका आँखों में मेरे कैद है
ऐसे तो नहीं कभी रिहा हो पाएगा।

वक्त ही तो है ठहरेगा ही नही
रूह जिस्म से  रिहा हो जाएगा। 

याद करते है,अकेले ही होते हैं
साथ जो चलो काफिला हो जाएगा। 

******************

लघुकथा :- आउटडेटेड..!

"मिसेस सिंह ,आप भी क्यूँ नही हमारी संस्था को ज्वाईन करती हैं।"
"सभी बड़े ऑफिसर्स की पत्नियाँ इसकी मेंबर है,आपकी नयी नयी पोस्टिंग हुई है इसलिए हम सब आपसे मिलने के बहाने ही सही ,सोचा आपको बता भी देंगें।"
आप सभी का शुक्रिया......
"आप लोग बैठे ,मै कुछ चाय नाश्ते का प्रबंध करती हूँ।"
सभी महिलाएँ जो पाँच छ: की संख्या में थी,आपस में कानाफ़ूसी करती हुई मिसेज सिंह के फैशन सेंश पर ही सवालिया निशान लगा रही थी।
"अरे देखा तुमने कैसे अपने बालों को लपेट रखी थी जुड़े में ,जैसे मि० सिंह इनकी मुठ्ठी में ही रहते है....हीइइऽऽऽ...हीइइऽऽऽऽ....
"और हाँ वो नही देखा कितने साधारण से आउटफिट में थी।"
"हमें तो लगता है हम बेकार में ही इसे अपनी संस्था से जुड़ने के लिए बोल रहे है,हमारे तौर-तरीके के लायक नही लगती।"
उनमें से एक महिला ने किसी और का उदाहरण भी दे मिसेज सिंह की शल्यक्रिया करने को उतारु थी...
"अरे वो याद है न मिसेज वर्मा ,वो भी तो  साधारण सी ही रहती थी इसकी तरह...लगता है ज्यादा पढ़ी लिखी नही है।
तभी उनमें से ही एक ने चुटकी ली..अरे ये भी अच्छी बात है न,हमसब का मनोरंजन होता रहेगा... ह ह हऽऽऽऽ
मिसेज सिंह उनकी बातों को आते आते सुन चूकी थीं।अपने होठों पर मंद मुस्कान लिए ड्राइंग रुम में दाखिल होती हुई अपने नौकर के साथ चाय नाश्ते लेकर पहूँची।
नौकर को इशारे से टेबल पर ट्रे रख जाने को कहा...
"और बताईए, आप सब अपने बारे में ,थोड़ी आपसी परिचय हो जाएगी हमसब की।"
चलिए पहले मै ही बता देती हूँ,मै एक गोल्ड मेडलिस्ट हूँ।मेरा विषय हिंदी और साहित्य का रहा है और मै अपनी मातृभाषा में ही बात करना पसंद करती हूँ।
"मुझे मेरे कंफर्टजोन मे रहना ज्यादा पसंद है ,लटके झटके और बिना दिखावे के।"
सारी महिलाओं को जैसे साँप सूँघ गया था,उन सभी के आशा के विपरीत मिसेज सिंह अपनी प्रतिभा की आभा से उन्हें मात दे चूकीं थीं।
सभी झूकी नजरों से एक दूसरे को देख रहीं थीं।
तभी मिसेज सिंह मनोस्थिति को भाँपते हुए... अरे लिजिए न आप लोग कुछ।
जी फिर कभी ....
हमलोग चलते है अब .नमस्ते।
नमस्ते...नमस्ते...

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दुआओं में हाथ उठ जाते है अक्सर
रंगे हो मज़हबी हथियार जरुरी तो नही।

🥀रिश्तों को ठुकराकर जाओ शौक से
हर बार बनें अखबार जरुरी तो नही।

🥀साहिल पर लहरें आती थी मुझे छुने
हर बार दिल में हो झंकार जरुरी तो नही।

🥀कभी नजरों को भी पढ़ लेते तो अच्छा
करें लफ्ज़ों से ही इक़रार जरूरी तो नही।

🥀चराग़ इश्क के कितने ही जलाते आए
निभाना भी आए सबको जरुरी तो नही।

🥀दरख़्त तरस रहा था किसी राहगीर को
छितनार शाखें छाया दे जरुरी तो नही।

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लघुकथा :- दोष..!

चुल्हे की धधकती आग पर तप रही बरतन में जैसे ही बंशीधर ने चबेने डाले, पास ही बरामदे की सीढ़ी से लगी दीवार पर टिककर बैठा मोती सीधा होकर बैठ गया.
सोंधी सी खुशबू उड़ती हुई नाथून के रास्ते पेट को खींचने लगी थी.
"ऐ थोड़ा देगा हमको क्या..?दे दो ना भूखा है मैं."
पेट पकड़कर सोया था पर तुमने मुझे जबरन जगा दिया.गलती किया कि नहीं तुमने बोलो.
तू पागल है क्या..?ये तो मेरा काम है.
"तेरा दिमाग सच में खराब है क्या..?"
"थोड़ी दे दोगे तो स्वाद बदल जाएगा मुँह का."
"हर चीज मुफ़्त में ही खाएगा क्या..?"
"जा भाग !बिना रोकड़ा कुछ नहीं मिलेगा."
"काम -वाम कर ,पैसे कमा और खरीद कर खा."
"पर काम क्या होता है...मुझे तो पता नहीं."
"काम वो होता है...!!!!,.अरे ये कहाँ फँस गया इसकी बातों में.सारे चने जल गए."
"तू एक ही बात जान ले...गाँधीजी के दर्शन हो जाए तो आ जाना."
"ठीक हैं....मैं जाता हूँ.पर वापस आऊँगा तो पक्का देना मुझे चबेना."
"हाँ!,हाँ!,.. जा जल्दी जा."
"लो मैं गाँधी की मुर्ति ही ले आया पास के मैदान में लगी थी...देखो कितना गंदा कर दिया सबने."
"अब रोज दर्शन करेंगे और चबेने भी खाएंगे."
तभी पुलिस की गाड़ी गाँधीजी की मुर्ति ढूँढती हुई पहुँच गई... "ये तुमने क्यों उखाड़ा वहाँ से...?"
"मैं तो इसलिए उखाड़ लाया कि ...इसने कहा था गाँधीजी के दर्शन से सब कुछ मिलता है."
"उल्टी -सीधी बात बताता है.चल बैठ गाड़ी में."
बेचारा चबेने वाला अपना दोष पुछता रहा...और वो मस्कुराकर चबेने चबाता रहा..!

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संथाल टाइम्स को प्रेषित आज की स्वलिखित व नवसृजित रचना रचनाकार सपना चंद्रा द्वारा रचित है, रचना का शीर्षक है  :-
बसंती खुमार..!



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संथाल टाइम्स को प्रेषित आज की स्वलिखित व नवसृजित रचना रचनाकार सपना चंद्रा द्वारा रचित है, रचना का शीर्षक है, 
आभास..!



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लघुकथा :- आत्मबल..!

सात महीने की गर्भवती नैना कुलियों को नदारद पाकर एक प्लेटफार्म से दूसरे प्लेटफार्म तक जाने के लिए अपना सामान खुद उठाए सीढ़ियों पर बहुत मुश्किल से चढ़ पा रही थी। 
दोनों हाथों में सामान थामे सीढ़ियों पर चढ़ना मुश्किल हो रहा था। आते-जाते लोग देख रहे थे मगर मदद को कोई आगे नहीं आया ....उसके कहने पर भी ...जैसे सब जल्दी में थे । ट्रेन के आने की घोषणा हो चुकी थी । वह जल्दी से प्लेटफॉर्म पर पहुंचना चाहती थी।  तभी  एक बुजुर्ग की नजर नैना और उसकी बेबस हालत पर पड़ी ....  उसने नैना को रुकने को कहा।
मैले कुचैले कपड़ों में बैठे वृद्ध के इशारे और आवाज से वह सहम गई  कि ....कहीं ये पागल तो नहीं है। 
तभी बुजुर्ग ने नैना का सामान अपने सिर पर रखा , पीछे आने का इशारा किया और बोला -"बेटी! मैं कब से तुम्हें परेशानी से जूझते देख रहा था , पर संकोचवश नहीं आ रहा था। अपनापन अब बचा नहीं है।" 
"नहीं,  बाबा! इसी दुनिया में आप जैसे लोग भी तो हैं , जो अजाने ही बेटी भी कहते हैं, और मदद भी करते हैं ।" 
"भले उन्हें बाप नहीं दिखा ..... सो यहाँ हूँ .... ताकत कम हो गई तो क्या ....बाप होने का आत्मबल तो बचा है।"

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