सोमवार, अक्टूबर 03, 2022

रचना :- मधुबाला "शांडिल्य"

ये कन्या पूजन का आडंबर क्यों...?
नवरात्र का दिन चल रहा है। मां अंबिके आसमान से धरातल पर अपने घर आई हुई हैं। चारों ओर चहल पहल है। मां की पूजा धूमधाम से की जा रही है। भोग, नवैद, फूलों की माला, हर पुजा अर्चना मंत्रोच्चारण के साथ बहुत ही खुशी से की जा रही है। मां की पूजा में हर छोटी सी छोटी बातों का ध्यान बहुत ही ध्यान से रखा जा रहा है। ताकि मां भवानी नाराज ना हो। उन्हें प्रसन्न करने की हर संभव कोशिश की जा रही है। पुरी पुजा में एक बात है जिसका ध्यान सभी लोग पुरे मनोभाव से रख रहे हैं ---" वो है कन्या पूजन " 
                 हमारी संस्कृति में ऐसी मान्यता है कि मां भगवती के पुजन में कन्या पूजन का होना अनिवार्य है। कन्या पूजन के बिना मां भगवती की पुजा अधुरी मानी जाती है। नौ दिनों में नौ कन्या का पुजन मां भगवती के नौ रूपों को प्रदर्शित करती है और मां भवानी के सभी रुप अपने आप में बेमिसाल हैं। इसलिए मां भगवती की पुजा कन्या पूजन के बाद ही समपूर्ण मानी जाती है।
            अब सवाल यह उठता है कि आखिर "कन्या पूजन का आडंबर नौ दिन ही क्यों?" ये सवाल अपने आप में अनगिनत सवाल खड़ी करती नजर आती है। आज भी कहानी जस की तस बनी हुई है। लेकिन अब कहानियां नये रंग, रुप, आकार में अपनी प्रस्तुति दे रही है। 
            कहने का तात्पर्य यह है कि आज भी बेटा की चाहत में बेटी की भ्रुणहत्या की जा रही है।आज जमाना सिर्फ दो बच्चों का रह गया या फिर कुछ लोग तो अब बस एक पर ही ठहर जाते हैं। हमारे देश में लोगों की मान्यता है कि अगर बेटा मरन्नोउपरांत मुखाग्नि दे तो मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी चाहत में भ्रुण में बेटियों की हत्या बेझिझक कर दी जाती है।                     दुसरा सवाल यह उठता है कि अगर धरातल पर बेटियां ही नहीं होंगी तो फिर संसार को चलाएगा कौन? बच्चों को नौ महिने अपने गर्भ में रखकर हजारों तक़लिफों को सहकर खुद को मौत के मूंह में ढकेल कर बच्चे को जन्म देगा कौन? जब जगत में जननी ही नहीं होगी तो फिर संसार का निर्माण असंभव सा प्रतीत होता है। 
               आज भी हमारे समाज में एक औरत के बांझ होने पर उन्हें घर से बेघर कर दिया जाता है। आज भी समाज में लड़कियों को दहेज रूपी श्राप के लिए अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने पड़ते हैं। हमारे देश की कानूनी व्यवस्था आज भी उदासीन है। पुरी उम्र गुजर जाने के बाद भी न्याय नहीं मिलता। बेटियों का बलात्कार आय दिन कहीं ना कहीं सुनने को मिल ही जा रहा है। हां कुछ हद तक इन मुद्दों में सुधार जरुर हुआ है।  घर से लेकर बाहर तक आज भी हमारे समाज में बेटियां सुरक्षित नहीं हैं। कभी किसी को तेजाब से जलाया जा रहा है तो किसी की निर्मम हत्या की जा रही है।
       ‌     तो फिर इस नौ दिन के आडंबर से बेटियों का कितना भला हो सकता है? कितनी बेटियां बचाई जा सकती हैं? उन्हें समाज में कितना मान सम्मान मिल सकता है? अगर चाहत बेटे की है तो फिर कन्या पूजन का आडंबर छोड़ दें। ये समस्या किसी एक की नहीं अपितु हम सब की है और हम सबों को एकजुट होकर ही इस समस्या का समाधान  करना होगा। लेकिन शुरुआत पहले अपने घर से करनी होगी।जब हम सुधरेंगे तो हमारा समाज खुद-ब-खुद सुधर जाएगा। चंद लाइनें बेटियों के सम्मान में.......
"बेटियों से ही रौशन ये सारा जहां है।
कभी वो मां भगवती तो कभी दुर्गा है
कभी चंडिका तो कभी काली है
कभी सरस्वती तो कभी लक्ष्मी है
हर रुप है तेरा हर रूप है रौशन
इसलिए तो तूं जगत की जननी है "

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जगत जननी मां जगदम्बे..!
जगत जननी मां जगदम्बे
तेरे शरणों में आए हैं
है उज्जवल चंद्र रुप तेरा
तूं नौ रूपों की है महिमा
असुरों की करती तूं वध मैया
जगत तेरे ही आसरे हैं
जगत जननी मां जगदम्बे
तेरे शरणों में आए हैं.......

तूं भक्तों का सहारा है
तूं पापों से करती किनारा है
तूं मुक्ति देती है मैया
तूं जनमानस को तरती है 
जगत जननी मां जगदम्बे
तेरे शरणों में आए हैं......

पखारु चरण मां मैं तेरे
पुष्पों से तुझको सजाऊं मैं
नव कन्या नव रुप है तेरा
उसको भोग लगाऊं मैं
हूं भक्ति भाव से समर्पित 
तेरे हर गुण को गाऊं मैं 
जगत जननी मां जगदम्बे
तेरे शरणों में आए हैं......

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नैहेरा तूं अइला है मैया..!

 नैहेरा तूं अइला है मैया,
आजु के दिनमा,
रौशन भैय छै मोर अंगनमा,
गोरे गोरे मुख पे हे मैया,
चांद चकोरवा
गले में शोभे फुल के हरवा,
हे मैया रौशन भैय छै मोर अंगनमा.....

भोला भी संग संग मैया हे आइल,
आवे छै संग अंहके बलकवा,
सबे देवी आजु घर में पधारै,
हे मैया रौशन भैय छै मोर अंगनमा....

बेटी छै खाड़ी है मैया लेकर अहं के कलशी,
भोग नवैद फुल डलिया,
भोग लगाऊं मैया दीप जलाऊं,
हे मैया रौशन भैय छै मोर अंगनमा......

नौ दिन नौ रुप धरल है माता,
नौ कन्या पुजैए छै अंगनमा,
मांगे छी आशिष कर दोनों जोड़ी,
सुख समृद्धि दिए मोर अंगनमा,
नैहेरा तूं अइला है माता,
आजु के दिनमा,
रौशन भैय छै मोर अंगनमा........


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तू है अंबे भवानी..!

नौ रूपों में आई दुर्गा,
करके सिंह सवारी.....
धरा से गगन‌ तक गुंज रही है,
जय जय मां भवानी.....
दसों दिशाएं जगमग करती,
तेरे ही रोशन से ......
मैया भवानी आई है घर,
अंबर से उतर के.....
थाल सजी है फूलों से मां,
फल, मिश्री मैं चढ़ाऊं.....
लाल चुनरिया ओढाऊं तुझे मां,
तुझको खुब सजाऊं......
जगमग जगमग रौशन करता,
तेरा आज भवन है......
मंत्रौउच्चारण से तेरा मंदिर गूंजता,
चारों वेद यहां है.....
तेरे शरण में आज खड़ी है,
तेरी बिटिया रानी.....
खुशियां से मां झोली भर दे,
तूं है अंबे भवानी,
मैया तूं है अंबे भवानी.......

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मां का मर्म..!
यूं तो रोज ही छत पर सुबह शाम हनुमान का आना जाना लगा रहता है। झुंड के झुंड आकर घरों में भी ये बहुत उत्पात मचाते हैं । एक झुंड में कम से कम पंद्रह से बीस हनुमान जरुर होते हैं। 
रोज की तरह आज सुबह भी हनुमानों का एक झुंड आया और चला गया। लेकिन आज सभी हनुमान शाम को लौटने के बजाय दोपहर को ही छत पर कुदने लगे। मैं दौड़ी दौड़ी छत पर हनुमान भगाने भागी। लेकिन ये क्या ---- आज का दृश्य तो बहुत ही करुणामय था। सभी हनुमान छत पर इधर उधर कुदे जा रहे थे।उसी झुंड में एक मादा हनुमान अपने मरे हुए बच्चे को अपने सीने से लगा कर इधर उधर उछल रही थी । कभी वो उसे उठा कर देखती और फिर सीने से लगा लेती।  ये देख कर मेरा हृदय विदिर्ण हो गया। दुसरे सभी हनुमान उसे चारों तरफ से घेरे हुए थे।
              कभी मादा हनुमान अपने बच्चे को जमीन पर रखती तो कभी उसे अपने गोद में उठाकर सुंघती  और फिर उसे अपने सीने से लगा लेती। मादा हनुमान के द्वारा अपने बच्चे को जमीन पर रखने के बाद बारी बारी हर हनुमान उसके पास आ कर उस बच्चे को सुंघते। शायद वो बच्चे के जिंदा होने की उम्मीद कर रहे हों। शायद उस बच्चे की सांसों को महसूस करने की कोशिश कर रहे हों।   ये नजारा अपने आप में कलेजे को विदिर्ण कर देने वाला था। हद तो तब हो गई जब हर इंसान इन्हें अपने अपने छत से भगाने को आतुर थे।शायद इनकी भी अपनी मजबूरी थी। 
              लेकिन बंदरों का ये झुंड आज काफी मायूस था। मायूसी और उदासी उनके चेहरे पर आज साफ झलक रही थी। ये इंसान नहीं है शायद इसीलिए वो रो नहीं पा रहे। किसी को अपनी आंसू दिखा नहीं पा रहे। आम इंसानों को इनकी चित्कार सुनाई नहीं दे पा रही। हर इंसान आज एक मां के मर्म से अनभिज्ञ है। शायद इसलिए आज भी इंसान उसकी भावनाओं को समझने के बजाय लाठ्ठियां और पत्थर का डर दिखाकर कर उन्हें भगाने को आतुर है। आज मां के मर्म से एहसासों से भरा स्वार्थी इंसान भी इन जानवरों से बत्तर है। लानत है इंसान के  इस इंसानियत पर जो एक मां के मर्म को ना समझ पाए।
              कहते हैं ना "मां सिर्फ एक मां होती है" फिर वो किसी भी योनि से संबंधित हो। उनके एहसास उनकी भावनाएं अपने बच्चे के लिए बिल्कुल अलग होती है। पुरी दुनिया से परे अपने बच्चे को कलेजे से लगाने का सुख शायद स्वर्ग से भी ज्यादा सुखमय हो। इस एहसास को शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। इसलिए मां के चरणों में पुरी दुनिया नतमस्तक है......

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वो शख्स..!

रूला गया वो शख्स
जो हमें हंसाने के 
वादे किया करता था
दे गया हर वो दर्द
जिसे दूर रहने के
हिदायतें दिया करता था
खुद की कहीं बातों को
खुद ही गुमनाम कर गया
हंसी के वादे कर के
आंसूओं की बौछार कर गया
देखते रह गए बन के मसीहा
ऐ मेरे मालिक
तू भी ना कुछ कर सका
इन जमीनी सितारों को
काश की तू रोक लेता
बढ़ते इन कदमों को
राह को तू मोड़ देता
और किसी मंजिल को
हंसते खिलखिलाते बीतते ये पल
खुशियों से भरी होती जिंदगी के कल
दे गया आंखों में आंसू
ज़िन्दगी में एक शख्स....

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टूटे ख्वाब..!

ख्वाबों की गठरी बांध कर
चले थे तेरे संग
सात फेरे के बंधन बांध कर
चल दिए तेरे संग....

हवा भी थी कुछ बहकी बहकी
मौसम भी अंगड़ाई लिए
चारों दिशाएं खिली खिली थी
हाथों में तेरे हाथ लिए .....

चहक रही थी उम्मीदें सारी
रिश्ते नातों के बंधन में
संग संग तेरे कदम बढ़े थे
रंग बदलते जीवन में.....

मंजर भी कुछ ऐसा बदला
देखते रह गए जग वाले
सोचा ना था जो भी कभी
ऐसा जख्म दिया तुने उपर वाले......

आग लगी जब जीवन में तो
उजड़ गयी सारी बस्ती
धरे रह गए रिश्ते नाते
मिट गयी मेरी सारी हस्ती.......

खुब रुलाया उसी शख्स ने
जिस पर जीवन वार दिया
कन कन से तोड़ा उसने मुझको
जिसको मैंने प्यार दिया
जिसको मैंने प्यार दिया.......

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एहसास..!

आज तेरा मेरे सपने में आना,
देख कर मुझे यूं तेरा मुस्कुराना,
याद बहुत आता है,
गुजरा हुआ वो अपना जमाना......

धीरे से तेरा मेरे गालों को सहलाना,
मेरे हाथों पर यूं तेरा हाथ रखना,
हौंसला रख ये तेरा संकेत देना,
याद बहुत आता है,
गुजरा हुआ वो अपना जमाना......

मेरे माथे पर यूं चूंबन देना,
आंखों से तेरा यूं प्रेम रस बरसाना,
साथ देने की उम्मीद बढ़ाना,
याद बहुत आता है,
गुजरा हुआ वो अपना जमाना.......

हर शख्स में मुझको तलाशना,
हर आहट पर यूं मुझको ढूंढ़ना,
हर धड़कन पर बस मुझको चाहना,
याद बहुत आता है,
गुजरा हुआ वो अपना जमाना......

फिर साथ होने की एक उम्मीद को बांधना,
बिछड़ कर यूं तन्हा आंसू बहाना,
छुप छुप कर बस आहें भरना,
याद बहुत आता है,
गुजरा हुआ वो अपना जमाना......

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जन्मदिवस पर शुभकामनाएं..!

रो ना तूं मेरी नन्ही सी कली,
हर रात के बाद सवेरा है....
रब ने जो लिखी मुसीबत है,
उसे आज नहीं कल जाना है.....
रख हौंसला तूं चट्टान तो बन,
हर नदी को किनारा पाना है....
जो हवा के झौकों से उजड़ जाए,
उसे फिर एक बार बसाना है....
पुजा है नित दिन जिसको तुने,
आज उस खुदा को भी आजमाना है....
रख हौंसला तूं निराश ना हो,
हर वक्त की खबर वो रखता है....
एक बूंद के जल की कीमत,
अपने भक्त की खुब समझता है....
ये हार नहीं होगी तेरी,
पल भर की बदरी छाई है.....
सूर्य उदित होगा निले नभ पर,
दुख की बदरी छट जाएगी.....
हैं पवन पुत्र की बहना तूं,
हर जीत तेरे हिस्से आएगी.....
हर जीत तेरे हिस्से आएगी .......

( जन्मदिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं मेरी बहना।हर जीत,हर खुशी तेरे हिस्से में हो। सफलता तेरे कदम चूमे।खुशियां तेरे दामन में हो। पवनपुत्र का साथ मिले )

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इतना इंतजार क्यों..?
कुछ लोग कहते हैं
इतना इंतजार क्यों?
मैंने भी हंसकर कहा
तो और क्या करूं?
कुछ ने नसीहतें दी
तो कुछ ने अपनी राय
कुछ बेबाक बोले
तो कुछ चुप रहे
वहीं कुछ ने खामोशियां समझी
तो कुछ निगाहें चुरा कर चुप रहे
कुछ साथ खड़े हुए
फिर चुपके से निकल पड़े
कुछ साथ चल पड़े
जो अभी भी साथ हैं.....

फर्क हर अंदाज में
हर सख्श का झलकता है
कुछ मुरझा गए हैं बाग में
कुछ रेत पर भी खिल गये
आंसूओं के संग खेलती
चंद आंख मिचौली है
कुछ रूफसार पर है खिलती
बरसती अश्रु की टोली है
कुछ परकटे से रह गये
जो ढह गए चंद चोट से
कुछ हौसलों के पर लिए
चल दिए गगन की ओर
मिल गये वो मिट्टी
जो मंसुबे कभी गलत थे
खिल गये वो फुल बनकर
जो अभी सहज थे....

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समाज में तीसरे लिंग की व्यवस्था..!
कुछ दिन पहले मैं गया से अपने घर के लिए ट्रेन पकड़ी। मेरी सीट स्लीपर कोच में साइड वाली बर्थ पर था। ट्रेन के आगमन के साथ ही मैं अपने बर्थ पर चढ़ कर बैठ गई। ट्रेन में काफ़ी भीड़ थी। यात्रियों का आना जाना लगा रहा। ट्रेन अपने स्टेशन पर रुकती और चंद मिनटों बाद वो फिर आगे बढ़ जाती। तभी एक स्टेशन पर कुछ किन्नर चढ़े और हर लड़के से पैसे मांगने लगे। मैं अपने बर्थ पर लेटी लेटी चुपचाप यह नजारा देख रही थी। इस वाक्ये को देखना मेरे लिए कोई नई बात तो नहीं थी। लेकिन मैं मन ही मन परेशान थी कि कहीं ये बुजूर्गो को भी परेशान ना करें।खैर इन लोगों ने बुजूर्गों को परेशान नहीं किया। कुछ लड़कों से पैसे लेकर ये चुपचाप निकल गई। मैं राहत की सांस ली कि चलो बला टली.....।
                 लेकिन ये क्या? दो चार स्टेशन पार करने के बाद जब ट्रेन एक स्टेशन पर रूकी तो आम जनता की भीड़ के साथ ही किन्नरों की एक पुरी टोली ही चढ़ गई।जिसमें तकरीबन दस से बारह सदस्य होंगे। सभी पुरे टीप टाप में सजधज कर थी। इन्हें देखते ही ट्रेन में मानों हड़कंप सी मच गई हो। सभी पुरुष वर्ग के चेहरे पर एक टेंशन की लकीरें साफ नजर आने लगी वहीं कुछ बदमाश लड़के उन्हें कमेंट पास कर मजे लेते नजर आये। 
          हद तो तब हो गई जब कुछ किन्नर लड़कों के सामने अपना कपड़ा उठा उठा कर अपने इंटरनल पार्ट को दिखाने लगती तो कभी किसी लड़के के द्वारा पैसे ना देने पर वो लड़कों के इंटरनल पार्ट को पकड़ने लगती। जिससे विवश होकर लड़के दस का एक नोट निकाल देते। ऐसा एक बार नहीं अपितु कई बार हुआ।हर स्टेशन पर इनकी अपनी एक टोली चढ़ती और दुसरे स्टेशनों पर फिर एक नया चेहरा। हर एक को पैसे चाहिए होते हैं। ये सब देखकर मैं काफी अचंभित और दुखी थी। कितने ही लड़के शर्मशार होते नजर आये।तो कितनों को ही परेशानियों का सामना करना पड़ा । 
             विचारणीय मुद्दा ये है कि जब सरकार इन्हें समाज में सामाजिकता प्रदान कर चुकी है तो फिर इनके लिए रोजगार का कोई पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं कर रही? हर काम सिर्फ कागजी स्तर तक ही सिमट कर क्यों रह जाती है? धरातल पर आने पर इन्हें बर्षो क्यों लग जाते हैं? समाज के तीसरे लिंग को भी मान सम्मान के साथ जिंदगी जीने का पुरा अधिकार है। इनके लिए भी उचित व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए। ताकि ये मजबुरन अपने इज्जत से खिलवाड़ ना करें। और इनके इस वाहियात हरकतों से जनता को छुटकारा मिल सके।

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बेबस ख्वाहिशें..!

रात के अंधेरे में अक्सर ,
आंसुओं को छुपा लेते हैं....
क्या करें आखिर,
दिल जो उनसे लगा बैठे हैं......
लाख दर्द मिले या आंसू,
तमन्ना तो तेरी ही रहेगी......
उम्र के हर मोड़ पर,
ख्वाहिशें भी तेरी रहेंगी......
माना बेबसी भी तेरी ,
कुछ कम नहीं.......
तेरे चाहतों का समंदर,
भी हम नहीं......
बेगैरत की पनाहों में,
गुजरती है तेरी रातें......
लेकिन तेरी यादों के साये में,
हम भी कुछ कम नहीं......
बरसती तेरी आंखें,
हर पल मेरी याद दिलाती है.....
मेरी यादों के साये  में,
तेरी उम्र गुजरती जाती है...........

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बहकते कदम..!
 
कदमों का बहकना किसी उम्र पर निर्भर नहीं करता।   इसके ज़िम्मेदार स्वयं कहीं ना कहीं अपने घर वाले ही होते हैं। काम की व्यस्तता में मां बाप इतने मसरुफ़ है कि आज वो अपने बच्चे को भरपूर मात्रा में समय देना तो बहुत दूर की बात है मिल बैठ कर कुछ पल ही साथ बीता ले, बच्चे के मन की बात समझ लें यही बहुत है। मध्यम वर्गीय परिवार में तो मां बाप के पास अगर समय मिल भी जाए तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वो बच्चों के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल सकते या फिर यूं कहें कि वो खुद चलना नहीं चाहते। वो बच्चों को समझना ही नहीं चाहते। बस हर वक्त अपनी मनमर्जी थोपते रहते हैं।बच्चा क्या सोचता है क्या चाहता है, मां बाप को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। इन्हें तो बस इनकी मर्जी चाहिए। और समझदार परिवारों के पास शायद वक्त नहीं है .......
              पती पत्नी के रिश्ते में भी आज कल बस नाम मात्र के ही रिश्ते की कद्र रह गई है। काम की व्यस्तता कहीं ना कहीं इनके निजी जीवन पर भरपूर मात्रा में अपना असर दिखा रही है। घर के अंदर पती और  पत्नी ज़्यादातर मुद्दों पर आपस में सुलझने के बजाय उलझते नजर आते हैं। जो कि अपने आप में एक बेहद दुखद स्थिति है। छोटी सी छोटी बातों पर बड़े से बड़े झगड़े बड़े ही आसानी से हो जाते हैं। और प्यार और शांति घर से बाहर की औरतों के साथ बांटते हैं। ठीक इसी तरह पत्नियां भी अपना शुकून घर से बाहर ढूंढती हैं। इन दोनों के रिश्ते में दुरियां कब घर कर जाती है इन्हें पता ही नहीं चलता।और जब तक कुछ समझ पाये तब तक पुरी दुनिया उजड़ चुकी होती है। यही हाल परिवार के हर सदस्य के साथ होता है। वो कब एक दूसरे से दूर हो जाते हैं उन्हें कुछ पता ही नहीं चलता।  इतनी देर में समय अपना खेल खत्म कर आगे निकल चुकी होती है।और हर रिश्ते बिखर कर चकनाचूर हो जाते हैं और रिश्तों की तलाश हम दुसरों के आगोश में ढूंढ़ते हैं।
                 घर के अंदर अपने हर रिस्ते को बेपनाह प्यार, मुहब्बत और समय दीजिए। उन्हें एहसास दिलाइए की आप उनके लिए कितने खास हैं वो आपके लिए कितने खास हैं। एक दुसरे का साथ ही सर्वोपरि है। जिन्हें घर के अंदर प्यार  मिलता है उनके कदम बाहर कभी नहीं लड़खड़ाते। रिस्ता कोई भी हो , बस खास होना चाहिए। एक दूसरे के दिलों पर राज होना चाहिए।
              अगर ऐसा होता है तो यकिन मानिए कोई भी गलत कदम उठाने से पहले आप हजार बार पहले अपनों के लिए सोचेंगे ना की पहले अपने लिए।प्यार भरा एहसास ही हर रिश्ते की डोर है। एहसास जितना गहरा होगा रिस्ते की डोर उतनी ही मजबूत होगी।ये आप पर निर्भर करता है की आप रिस्ते की डोर को मजबुती से थामें रखते हैं या फिर उसे बिखरने को छोड़ देते हैं। कौशिश करें हर एहसास मजबुती से जुड़ा हो। ताकि रिश्ते सिद्दत से निभाए जा सकें।

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पैसों की कमी..!

पैसे की कमी मे अक्सर
रिस्ते को टूटते देखा है..
मजबूरी के आगे,
सच को झुकते देखा है..
जो कभी जान से भी अजीज थे,
आज उनको आपस मे लड़ते देखा है..
वक्त के करवट को,
अक्सर रंग बदलते देखा है..
बुरे अच्छे बने और अच्छे बुरे,
दोस्तों को भी खूब बदलते देखा है..
किस किस से इस जमीं पे शिकायत करें,
वक्त पर तो रब को भी बदलते देखा है...
पैसे की कमी मे अक्सर,
रिस्तों को टुटते देखा है...

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एक धब्बा..!

सोचा ना था कभी,
कि ऐसा भी मंजर आऐगा...
गिरगिट की तरह,
तु रंग बदलता जाएगा....
रिस्तों के नाम पर , 
तु एक धब्बा कहलाएगा...
दिल मे जगह दी थी तूझको,
पर दिमाग मे तुने जगह बनाई है...
तेरे इस झुठे रिस्ते पे...
अब तो शामत आई है...
पकड़ में आ गये तेरे
सारे झुठे रिश्ते नाते
चेहरे पर मुस्कान लिए
रिश्तों पर चुभोते कांटे
गद्दारों की अक्ल लिए तू
मारा-मारा फिरता
रिश्ते नाते बेच कर खाएं
हरकत ऐसी करता
हरकत ऐसी करता........

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जिंदगी के इरादे..!

ऐ जिन्दगी तु बता,
तेरा इरादा क्या है.....
क्यूं घूरती है तू ऐसे,
तेरा लिया क्या है.....
खुद की जिंदगी में उलझी,
खुद की समस्याएं हैं..........
पहले लड़ूं इससे,
या फिर तेरी सुनूं......
ये क्या कम हैं,
जो तेरे नखरे बड़े हैं.....
सुलझती गुथ्थी की,
उलझती जिंदगी है.....
फिर भी दौड़ती,
रोज नई जिंदगी है...
हार को जीत में बदल कर,
हौसलों की ऊंची उड़ान भर कर....
नित नई कहानियां गढ़ कर,
ऐ जिन्दगी बस तुझे है पाना.....!!

*************

मुहब्बत की डोर..!

सहमे हुए से खड़े थे
तेरी राहों मे...
डर किसी आँधी की नहीं
तुझ से बिछड़ने का था....
लेकिन तेरी मुहब्बत की डोर से
बंधे कुछ इस कदर  थे कि....
ना तेरे जाने का गम रहा
और ना ही बिछड़ने का...
खुश थे,मस्त हैं
तेरी यादों के सहारे...
खुद तेरी मुहब्बत भी
तुझसे मुझे जुदा ना कर पाई....


*************

तेरे एहसास..!
माना तुझ से दुर हूं
मतलब ये नहीं कि
तुझे भूल गई......
तेरी बातें, तेरी यादें, तेरे एहसास
आज भी जिंदा है मेरे अंदर
तेरा प्यार बन कर.....
तेरे दर्द तेरे आंसुओं में
छुपी हूं मैं
छलक जाती हूं तेरे आंखों से
तेरा एहसास बनकर....
दुनिया की भीड़ में जिंदगी की विरानी में
आज भी जब  ढूंढता है तु मुझे
एक अनकहे लफ्जों की तरह..... 
साथ तेरे कोई भी हो
राज तो आज भी तेरे दिल पे मेरा है
तेरे हर  एहसास में खास बनकर.....
तभी तो  ढूंढता है तु आज भी मुझे
हर वक्त अपने आस पास हो कर......

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बेरंग जिंदगी..!

चुड़ी टुटा, कंगन टुटा, धुला मांग से सिंदूर,
अश्रु संग रिश्ता कुछ ऐसा बना,
ये हुआ ना कभी मुझसे दुर.....

काजल छुटी, बिंदिया छुटी, छुटी लव की लाली,
वक्त ने करवट कुछ ऐसा बदला,
जिंदगी हो गई खाली खाली......

लाल पटोरी, लाल चुनरिया, वो लाल रंग की साड़ी
जिंदगी रंगविहीन हुई अब,
खड़ी रह गई बस एक नारी....

पांव की बिछिया, रुनझुन पायल, पैरों ने आज श्रृंगार है खोई, 
अश्रु संग कुछ ऐसी घिरी वो,
आज हुई वो जग से पराई,.......

घर भी छुटा, ससुराल भी छुटा, छुटा है जग सारा,
जिंदगी अब बोझ बनी है,
मिला ना कोई किनारा ........

आंसू सुखे, भावना सुखे, सुखी चित् की नदियां,
मान सम्मान सब खो गये,
लुटी जब मेरी दुनिया.......

अपने छुटे, दोस्त छुटे, छुटी सारी दुनिया,
तन्हा अकेली खड़ी रही मैं,
गिन गिन सबकी कमिया.......

**********************

भाई के नाम बहन की पाती..!
माना मैं आपकी अपनी बहन तो नहीं
लेकिन शब्दों का
एक एहसास ही काफी है
कहा जो आपने मुझे अपनी बहन
मेरे लिए बस ये नाम  ही का काफी है 
भाई बहन का ये रिश्ता खुद में बड़ा प्यारा है 
दिलों की दुरियां मिटा देता है हर ग़म छुपा लेता है
बहनों के आंखों के आंसू को खुशियों में बदल देता है
बहना की एक मुस्कुराहट भाई को हर दुख से उबार देती है
ये राखी नहीं रक्षाधागा है जो हर मुसिबत से
अपने भाई को निकाल देती है
माना हम साथ नहीं पर रिश्तों का एहसास काफी है
एक बहना के लिए उसके भाई का प्यार काफी है......
रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं भैया। भगवान शिव आपको निरंतर तरक्की के साथ ही लंबी आयु,धन धान्य से परिपूर्ण रखे।

**********************

जिसके संरक्षण में पल रहे थे
पता चला वहीं से मर रहे थे हम
बेखोफ थे जिसके साये  में
आज वहीं से लूट रहे थें हम
ऐ खुदा ये कैसा कहर है तेरा
आसमां दे कर सर पर
पैरों तले जमीन को खिंच लिया
 जो गुनाह किया ही ना हो हमने
उसकी सजा क्यों भुगत रहे थे हम

शिद्दत से पुजा तुझको
शिद्दत से तुझू अपना माने थे हम
कदम कदम पर तेरा सहारा ले कर
मंजिल की तरफ कदम बढ़ा रहे थे हम
सुनी राहों में तेरे नाम की
एक नई जोत जला रहे थे हम
जो गुनाह किया ही ना हो हमने
उसकी सजा क्यों भुगत रहे थे हम

तेरे ही बनाए बंदे ने तो आज
तुझको भी ना कहीं का छोड़ा
आजमा लिया तुझे 
अपनी खुदगर्जी के लिए
आसमां से उतारकर तुझे
गर्त में धकेल दिया
अब तो तू भी डरा डरा फिरता है
खुद के बनाए बंदे से
बेचारे और बेबश दिखने लगा है
सामने तु इस जमीं के परिंदे से
जो गुनाह किया ही ना हो हमने
उसकी सजा क्यों भुगत रहे हैं हम

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टुटते रिश्ते..!
जब भी किसी लड़के या लड़की की शादी टूटती है तो दोनों पक्षों के परिवार के साथ साथ दुनिया समाज के जुबानी जंग बहुत ही तेज़ी से रफ्तार पकड़ते नजर आते हैैं। किसी को पता नहीं होता कि हकीकत क्या है सिवाय लड़के लड़की के । लेकिन हमारा समाज और परिवार इतना महान होता है कि बिना कुछ जाने बिना कुछ समझे कई कहानियां गढ़ देते हैं, दोषारोपण की कड़ाके की लूं चलने लगती है। पति पत्नी अपने रिश्ते को तोड़ना चाहे या ना चाहे लेकिन परिवार वाद और रिस्तेवाद की समाज इस प्यार भरे रिस्ते में कैंसर रूपी जहर को फ़ैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ती।
                कोई ये नहीं सोचता की आखिरकार पती पत्नी क्या चाहते हैं, उनकी खुशी और रजामंदी  किसमें है, इससे किसी को फर्क नहीं पड़ता।  हर एक को बस अपनी ढुकियानूकी बातों की पड़ी होती है। अपनी जिद्द की पड़ी होती है। रिस्ता टूट जाए तो टूट जाए लेकिन परिवार अपनी बेहूदगी सोच से कभी समझौता नहीं कर सकता। 
               99 पर्सेंट रिश्ते में देखा गया है कि पती पत्नी के आपसी रिश्ते अपनी गलती से कहीं ज्यादा परिवार और रिश्तेदारों की वजह से टूटते हैं। इनकी बेवकूफी के शिकार पति पत्नी को अपने रिश्ते की कद्र उस वक्त होती है जब सब कुछ खत्म हो जाता है। अंततोगत्वा उनके पास सिवाय पछताने और रोने के कुछ नहीं बचता। अगर कुछ बचता है तो वो है उनका दर्द, अकेलापन, आंसू और बीती यादें।

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उज्ज्वला योजना के तहत अंधेरा क्यों..?
माननीय मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही  ग्रामीण इलाकों में मानों जैसे रौशनी की बाढ़ सी आ गई हो। ये रौशनी किसी आसमानी दिनचर्या की कल्पना नहीं अपितु उज्ज्वला योजना के तहत हर घर में गरीब महिलाओं के जिंदगी में उजाले की एक नींव थी। महज चार सौ रुपए से शुरू होने वाली उज्ज्वला योजना कहीं ना कहीं आज अपनी अंतिम सांसें गिन रही है।हर गरीब वर्ग की महिलाओं के लिए यह योजना उनकी जिंदगी में एक उजाला लेकर आया। उन्हें लगा अब तो मौसम बदल गया, हरियाली भी अब छा गई।ये मासूम सी औरतें भला कुर्सी की खेल को क्या जाने। कुर्सी की खेल से अनभिज्ञ यह महिला मोदी जी के नाम का जश्न मनाती रही और इधर उज्ज्वला योजना पर राजनीति की मार जोर पकड़ने लगी।
               जिस सिलिंडर की कीमत शुरूआती दौर में महज चार सौ रुपए थे ।आज उसी सिलिंडर की कीमत तकरीबन ग्यारह सौ रुपए के आस पास हो गई है।जिसे गरीब परिवार के लिए गैस भरवा पाना मुश्किल ही नहीं अपितु नामुमकिन है।आज गरीब औरतें उज्ज्वला योजना के नाम पर एक बार फिर से धुंए की आग में खुद को झोंकती नजर आ रही है। फिर वही रोजमर्रा की जिंदगी,वही आग,वहीं धुएं। उज्ज्वला योजना के तहत फ्री में मिलने वाला सिलेंडर घर के किसी कोने में दुबका सा सहमा सा छुपते नजर आ रहा है।उस सिलेंडर को भला कहां पता कि शानोशौकत से धरातल पर उतरने वाला यह सिलेंडर जल्द ही कचरे की तरह किसी कोने में फेंका हुआ नजर आएगा। दिन-ब-दिन बढ़ते गैसों के दामों ने जब आम जनता के नाक में दम कर रखा है तो भला गरीब वर्ग के लोगों के लिए तो दिल्ली दूर वाली बात हो जाती है। 
           अब यह सवाल ये उठता है कि आखिर उज्ज्वला योजना के तहत अंधेरा क्यों? जब सरकार ने इस योजना की रुप रेखा तैयार की तो क्या उस पर लगने वाला लागत उन्हें मालूम नहीं था या फिर योजना के नाम पर वोट बैंक की राजनीति थी। उज्ज्वला योजना के पिछे कुर्सी की राजनीति कहीं ना कहीं गरीबों को अपने आगोश में ले रही है। चंद दिनों के उजाले से तो अंधेरा ही भला था। एक बार फ्री का चुल्हा और सिलिंडर दे कर उसके दाम आसमान में चढ़ा देना ये राजनीति नहीं तो और क्या है? सरकार की हर योजना के पीछे कहीं ना कहीं राजनीति चाल छीपी होती है। बेहतर है चाल चलने के बजाय काम को धरातल पर उतारा जाए। तभी देश प्रगति कर सकता है अन्यथा......
            सरकार के द्वारा चंद सिलेंडर और चूल्हे फ्री दे देने से ना ही गरीबों के घर में उजाला आने वाला नहीं  है और ना ही उनके फ्री के सामान से उनके रोजमर्रा की जिंदगियों में कोई खुशियां आने वाली हैं। ये सभी क्षणिक मात्र की खुशियां हैं। फ्री का समान देने से अच्छा है कि सरकार इन्हें सबल बनाने का काम करें। कागजी कार्रवाई को धरातल पर पुरी तरह सफल बनाने की कोशिश करें। तभी देश का विकास संभव है। अन्यथा विकास के मार्ग में राजनीति आज भी अपने जालें बिछाए खड़ी है।

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उसकी जीत है अभी बाकी..!
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बने किस पत्थर से हो तुम प्रभु,
कि तुझे मेरी पीड़ा समझ नहीं आती,
या फिर मेरी भक्ति में ही कोई कमी है,
जिसे मैं समझ नहीं पाती......

राहों में कांटे ही कांटे खिले हैं,
रोड़ों से पैरों में मेरे छाले पड़े हैं,
बस तेरे भक्ति का ही एक मार्ग है प्रभु,
जिस पर हम चले जा रहे हैं.......

तेरे इस दुनिया में बनाई,
मेरे दुश्मनों की भीड़ है भारी,
देते हैं सभी मुझे ताने कि,
तेरे दर पर हूं मै हारी.......

अब तो रहम कर प्रभु,
कोई चमत्कार दिखा दे,
मत ले तूं मेरी परिक्षा,
मुझे किनारा लगा दे.......

दिखा दे तूं इस दुनिया को,
भक्तों की प्रीत है तुझे प्यारी,
जिसके सर पर हो तेरा सहारा,
उसकी जीत है अभी बांकी,
उसकी जीत से अभी बांकी........

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गांवों का वो भोलापन..!
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गांव का वो भोलापन,
जाने कहां अब खो गया,
मिलकर बैठक सखियों की,
किसी नदिया के तीरे खो गया,
घर में जमघट परिवारों की,
बीच दिवारों में चुन गया,
कुएं पर झुंड औरत की,
जाने कहां अब खो गया ........

नदियां भी अब प्रेम की प्यासी,
सावन के झुले सुने हैं,
खेतों की हरियाली सुखी,
हर घर के आंगन सुने हैं,
बच्चों की किलकारी ना गुंजे,
गांवों की गली भी सुनी है,
दादी नानी की कहानी भुली
अब प्रेम प्रसंग भी सुने हैं.......

मंदिर में घंटे की घंटी,
जोर नहीं अब उसके स्वर में,
सुनी पड़ी पुजा की थाली,
फुलों के उपवन सुने हैं,
मेलों पर अब पकड़ नहीं,
गलियों की रंगत सुनी है,
भोली भाली गांव की जनता,
अपना वर्चस्व अब खो दी है,
अपना वर्चस्व अब खो दी है.........

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भक्त की आश..!
कुछ दिन पहले मैं गया किसी काम से गयी थी। अपने काम को खत्म कर मैं वापस पटना के लिए बस से निकल पड़ी। पटना बस स्टैंड पर उतर कर मैं पटना स्टेशन की ओर टेम्पु से रवाना हो गई। जैसे ही मैं टेम्पु से उतरी मेरी पहली नजर रेलवे स्टेशन के समीप स्थित बजरंग बली के मंदिर पर पड़ी। यहां मैं पहले भी कई बार आ चुकी हूं। फिर भी कहते हैं ना कि......"भक्त की प्रीत भगवान तक खींच ही लाती है"। मैं मंदिर को देखकर मन ही मन मुस्कुराई और भगवान को प्रणाम कर मै आनन-फानन में स्टेशन की ओर बढ़ी। समय के आभाव में मन में भगवान का दर्शन ना करने की तकलीफ लिए मैं आनन-फानन में स्टेशन की ओर बढ़ चली।
            तभी मेरी नज़र मंदिर की गुंबद पर पड़ी। मैं मन ही मन भगवान से प्रार्थना की कि....."हे भगवन , भले ही मेरी ट्रेन छुट जाए , मगर एक बार मुझे अपनी दर्शन दे दे "। और फिर मैं अपनी ट्रेन पकड़ने के लिए स्टेशन की ओर बढ़ चली। स्टेशन पर पहूंचने के बाद मैं अपना टिकट कन्फर्म की। फिर वहां से खाना खाने के लिए मैं होटल चली गई। मेरी ट्रेन तकरीबन एक घंटे के बाद थी।खाना खाने के बाद अचानक से मेरी तबियत बहुत ही ज्यादा बिगड़ गई। मेरी स्थिति बहुत ही ज्यादा खराब हो गई। ट्रेन चंद मिनटों में स्टेशन पर आने वाली थी। चारों ओर उसके एनाउंसमेंट हो रहे थी। लेकिन मेरी हिम्मत अब जवाब दे रही थी। मेरी तबियत इतनी खराब हुई कि मैं सफर करने के लायक़ बिल्कुल भी नहीं थी। तभी ट्रेन आई और चंद मिनटों के बाद चली भी गई। 
           जब तक मैं कुछ सोच सकती,समझ सकती ,तब तक मेरी ट्रेन जा चुकी थी। थोड़ी देर रुकने के बाद मैं दुसरे ट्रेन की जानकारी हासिल की जो कि तकरीबन चार से पांच घंटे लेट थी। मैं पहले टिकट को केंसील करवा कर अपना दुसरा टिकट ली। उसके बाद मैं आराम करने के लिए स्टेशन पर ही जगह ढूंढने लगी। तभी अचानक मुझे बजरंगबली मंदिर का परिसर याद आया। जहां मैं अक्सर रुक कर आराम कर लिया करती थी।
                अब मैं स्टेशन से निकल कर मंदिर में प्रवेश की। लेकिन यहां तो भीड़ ही भीड़ है।दुर दुर तक भगवान के दर्शन के लिए लंबी लाइनें खड़ी थी।एक बार मैं फिर से बहुत उदास हो गई। मुझे लगा मैं तो इतनी भीड़ में दर्शन नहीं कर पाऊंगी। क्योंकि इतने लंबी लाइन में खड़े रहने की ताकत मेरे अंदर तो नहीं थी। मैं अपना उदास मन लिए उपर की ओर जाने लगी। तभी मुझे एक महिला पुलिस ने उपर जाने से रोक दिया और मुझसे पुछताछ करने लगी‌। मैं अपने खराब तबियत के बारे में जानकारी देते हुए उपर जा कर थोड़ी देर आराम करने की इच्छा जताई।
             वो महिला पुलिस मुझे भीड़ से निकाल कर किनारे के रास्ते से भगवन जी के दर्शन कराने ले गई। मैं अपने आप में बहुत ही अचंभित और आश्चर्यचकित थी। जैसे ही उस महिला पुलिस ने मुझे आगे लाकर खड़ा की...... मेरी पहली नजर बजरंगबली की उपर पड़ी। मैं मंद ही मंद बहुत खुश हुई और भगवन के भक्ति में भाव विभोर हो गई। मारुति नंदन के दर्शन कर बरबस ही आंखों से अश्रुधार गीरने लगे। कुछ पल के लिए मैं अपने हर दर्द को भुलाकर प्रभु के चरणों में नतमस्तक हो गई। मन ही मन मैं भगवन को अपने दर्शन देने के लिए कोटि कोटि धन्यवाद दी। और फिर मुस्कुराते हुए मैं मंदिर के उपर के परिसर में आराम करने के लिए चली गई। 
               आज मेरी ट्रेन छुटने  की तकलीफ होने के बजाय भगवान जी के दर्शन करने की ज्यादा खुशी थी। कहीं ना कहीं दिल में एक अजीब सा सुकून था। उपर चढकर मंदिर के फर्स पर मैं लेट गई और भगवान जी को दर्शन कराने के लिए दिल से धन्यवाद देती रही। मेरी आंख कब लगी मुझे पता भी नहीं चला। तकरीबन एक से डेढ़ घंटे बाद मेरी आंख खुली।अब मैं बिल्कुल स्वस्थ थी। मैं नीचे उतरी तो मंदिर में नाम मात्र के ही लोग थे। भीड़ पुरी तरह से खत्म हो चुकी थी। मैं बजरंगबली के पास जाकर उन्हें कोटि कोटि प्रणाम कर धन्यवाद दी।अब तक उनकी सारी लीला को मैं एसमझ चुकी थी। कहते हैं ना कि......जब सच्चे दिल से  भक्त पुकारे तो भगवान दौड़े चले आते हैं। मेरी इच्छा अपने प्रभु के दर्शन की थी, तो भगवान जी  मेरी तबियत खराब कर मुझे अपने शरण में ले गये और अपने दर्शन भी करा कर अपने भक्त की इच्छा पुर्ति कर दी। मैं मन ही मन भगवान जी को प्रणाम कर मुस्कुराते हुए मंदिर के परिसर से निकल कर अपना ट्रेन पकड़ने स्टेशन पर चली आई। अब मैं अपने घर जाने के लिए खुशी खुशी तैयार थी।

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समाज से विलुप्त होती सामाजिकता.!
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"सामाजिकता"  शब्द की जब भी कोई बात उठती है तो सबसे पहले हमारे दिमाग में गांव की रुप रेखा नजर आती है। एक प्यारा सा समाज, जहां हम सभी एक दूसरे से मिलजुल कर रहते हैं,एक दूसरे की बेझिझक मदद करते हैं,एक दूसरे के दर्द को मिल कर बांटते हैं और समझते भी हैं, एक दूसरे के लिए खड़े रहते हैं। लेकिन वक्त के साथ ये हालात, परिवेश कब बदलते चले गए, कुछ पता ही नहीं चला।
           लोग संसाधन की आपुर्ति हेतु शहरों की ओर अपने रुख करते चले गए। नौकरी, बच्चों की उच्च कोटि की शिक्षा, अच्छे डाक्टर, नर्स की जरूरत, दैनिक दिनचर्या के तमाम संसाधनों ने कब गांव से जुदा कर शहरों से लगाव पैदा कर दिया ये किसी को पता भी ना चला। 
          और शहरों में कदम रखते ही होता है एक नये समाज में प्रवेश। जहां हर इंसान एक दूसरे से अनजान है।एक दूसरे के सभ्यता, संस्कृति, स्वभाव से अनजान है। फिर भी एकजुट होकर एक नये समाज का निर्माण करते हैं। जहां सभी एक-दूसरे से अनजान होते हुए भी अपनेपन का एहसास दिलाते हैं। हर सुख-दुख में एक दूसरे का साथ दे कर गांव की धुली मिट्टी को भुलाते हैं। लेकिन लाखों खुशियां, सुविधाओं के बीच भी गांव की याद कहीं ना कहीं हमारे अंदर टिस मारती है।
           लेकिन आज का आलम कुछ और है। गांवों से लेकर शहरों तक की सामाजिकता कहीं ना कहीं विलुप्त होती नजर आ रही है और खास कर गांवों की सामाजिकता कहीं ना कहीं पुरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है। वो वक्त और था जब लोग एक साथ मिलकर भोजन बनाते थे और एक साथ बैठ कर खाना खाते थे, बच्चे एक साथ घर के आंगन में खेला करते थे, एक साथ दरी बिछाकर साथ में सो जाया करते थे। हर दर्द में बिना मदद मांगे एक दूसरे के हर संभव सहयोग के लिए खड़े रहते थे।भाई, भाई का सलाहकार होता था। देवर भाभी का प्यार मां बेटे जैसा होता था।नन्द भाभी का प्यार एक अच्छे दोस्त सा था। ग्रामीण समाज में हर इंसान अपने से बड़े बुजुर्गों की बातों को तबज्जु दिया करते थे। छोटों से बेपनाह प्यार होता था। माना गांवों में संसाधनों की कमी थी लेकिन दिल में एक दूसरे के लिए बेपनाह मुहब्बत और मान सम्मान की श्रद्धा भरी  पड़ी थी।
              लेकिन आज ग्रामीण इलाकों को राजनीति ने कहीं ना कहीं अपने चपेट में ले रखा है। ग्रामीण समाज के राजनीति के आगे कुर्सी की राजनीति भी बोनी पड़ती नजर आ रही है। आज समाज में सभी अपने फायदे के लिए एक दूसरे का गला काटने तक को तैयार हैं। ना तो भाई, भाई का रहा,देवर भाभी का रिस्ता दागदार हो गया,नन्द भाभी के रिस्ते में छत्तीस का आंकड़ा आ गया और तो और आपके समाज, पड़ोसी, रिस्तेदार भी आपको नोचने के लिए कब से तैयार खड़े हैं।हर इंसान अब तो बस अपने मौके की तलाश में खड़ा है।मोका पर चौका मारने की प्रवृत्ति में पारंगत हैं। 
             हर इंसान एक दूसरे की सफलता देख जल-भुन रहा है। मोका मिला नहीं कि उसके पैर खिंच कर गिराने को कब से तैयार खड़े हैं।जान बुझ कर बेटी की शादी के लिए गलत रिस्ते को ला कर उसे हर संभव सही साबित कर बेटी की शादी शुदा जिंदगी को बर्बाद करना और फिर बाद में जश्न मनाना एक आम बात बन कर रह गई है। घरों में आग लगा कर उसका बंटवारा करवा देना, किसी की नीजी जिंदगी को सार्वजनिक स्थल पर उछाल कर उसे बेज्जत करना जैसे ना जाने कितने ही समस्याएं हैं जिसका निराकरण कर पाना शायद ही संभव है और इन तमाम मुद्दों के बीच सबसे ज्यादा आश्चर्य की बात तो तब हो जाती है जब इन तमाम घटिया चीजों में पंच पंचायत जैसे परमेश्वर की भी पूर्ण सहभागिता होती है। वार्ड सदस्य से लेकर पंच परमेश्वर पंचायत तक की मिलीभगत होती है। 
         धिक्कार है ऐसे गांव की राजनीति पर जो आज अपने वर्चस्व को धुल मिट्टी में मिला चुके हैं। वो गांवों की सौंधी मिट्टी अब बदबुदार हो गई है। खेतों की हरियाली शुद्ध पानी को तरसती है। उमड़ती नदियां अब सुखे का स्वरूप ले चुकी है। वो आंगन में पड़ती खिलखिलाती धुप अब जलन पैदा करने लगी है।नीम की पेड़ की छांव ना जाने कहां गुम हो गई। बच्चों की किलकारियां नौजवानों में सिसकारियां भरने लगी है। गांवों की शुद्ध हवाओं में अब राजनीति की जहर भरने लगी है। गांवों की शुद्धता ना जाने कब धुमिल हो गई।शायद अब वो गांव, गांव नहीं रहा जिसे देखने को कभी हमारी आंखें तरसती थी।अब तो बस........

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ये कैसा सावन आया है?
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 शिव का महिना आया है
ये कैसा सावन लाया है?
है धुप दिखाती आंख हमें
बादल भी मूंह चिढ़ाते हैं
नयनों में बरखा की आश लिए
सावन को आज तरसते हैं

बहती नदियां सुख रही है 
कुएं भी चित्कार रहे
वन उपवन की सुखी पत्ती
रंग रुप सब खो रहे
आसमान से पुछे नैना
ये कैसा सावन आया है?

खेतों की हरियाली सुखी
सौंधी मिट्टी सुख रही
नहरों ने वर्चस्व है खोए
किसानों के दम टूट रहे
बहते आंसू शिव से पुछे
ये कैसा सावन आया है?

शिव भक्त खड़े मंदिर में
अन्न धन का हाहाकार लिए
हाथ जोड़ गुहार लगाते
अपने क्षेत्र का उद्धार लिए
हर भक्त आज तुझसे पुछे
ये कैसा सावन लाया है?
ये कैसा सावन लाया है?


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आलेख :- रब नवाज़ आलम نامنگار :- ربنواز عالم

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