रविवार, जनवरी 09, 2022

रचना :- एंजल भारद्वाज..!

सूरज जरा सा ढलने दो..!

लगाओ ना पाबंदियां हम पर,
हमें आजाद हवा में जीने दो। 
बचपन है अभी हमारा,
थोड़ी गलतियां भी करने दो। 
शाम अभी हुआ नहीं है, 
सूरज जरा सा ढलने दो।

अभी स्कूल से भैया आए नहीं,
 उन्हें भी तो आने दो। 
बच्चे खेल कर घर नहीं लौटे,
 उन्हें जरा सा लौटने दो। 
शाम अभी हुआ नहीं है,
 सूरज जरा सा ढलने दो।

पापा दफ्तर से घर नहीं लौटे,
उन्हें घर तो वापिस आने दो।
दादी को बाजार से मेरे लिए,
खिलौना भी तो लाने दो। 
शाम अभी हुआ नहीं है,
सूरज जरा सा ढलने दो।

अभी टीवी पर क्रिकेट नहीं आया,
उसे भी तो आ जाने दो। 
छक्के और चौकों पर हमें,
थोड़ा ताली तो बजाने दो। 
शाम अभी हुआ नहीं है,
सूरज जरा सा ढलने दो।

अभी मां के रसोई से, 
खुशबू जरा भी उठी नहीं।
स्वादिष्ट भोजन और पकवानों का,
सुगंध जरा तो आने दो। 
मां के हाथों से मेरे लिए,
थोड़ा मैगी तो बनाने दो।

पूजा आरती अभी हुई नहीं है,
दादी को भजन तो थोड़ा गाने दो।
लगाओ ना पाबंदियां हम पर,
हमें आजाद हवा में जीने दो। 
शाम अभी हुआ नहीं है,
सूरज जरा सा ढलने दो..!

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