रक्षा..!
पर मान लो तुम भी मेरा कहना
मर्यादा की वह दहलीज कभी न करना पार
कुछ भी करना जीवन में पर ना भूलना संस्कार
मैं ना कहता बंदीश में रहो तुम
उन्मुक्त गगन तेरा भी है
जितनी आजादी हमें मिली
उतने का हक तेरा भी है
जितना उड़ना चाहो तुम पंख तुझे मैं दुंगा
अम्बर की उंचाई तक साथ तेरे मैं रहुंगा
मार्ग बनाओं खुद का तुम साथ मेरा पाओगी
कुमार्ग पर जो रखा कदम तो दुर मुझे पाओगी
भर हिम्मत सुमार्ग बना औरों को भी राह दिखा
मार्ग में जो रोड़े आए सबला बनकर मज़ा चखा
फिर देख जमाना तेरे पीछे भागा चला आएगा
तेरे ही सुमार्ग को अपना आदर्श बनाएगा
मैं ना कहता तुम अबला हो
तुम चंडी हो तुम सबला हो
कल्पना तुम, दीपिका तुम, उषा भी तुम और विशाली तुम
कड़ी ना ये टुटने पाए इतना ही बस ध्यान रहें
भारत के गौरवशाली गाथा का अभिमान रहे
रहे पहचान संस्कृति की इसका भी ध्यान तुम धर लेना
तेरी रक्षा का वचन निभाऊंगा बहना
पर मान लो तुम भी मेरा कहना
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आज हमको नाज़ है..!
मिली आजादी हमें है जब हुए सैकड़ों कुर्बान
जिनकी कुर्बानी के दम पे मां के सर का ताज़ हैं
उन वीर सपूतों पर तो आज हमको नाज़ है
है वतन अब उनसे ही जिसने खुन से सींचा इसे
इस वतन की आबरू पे ये तन मेरा कुर्बान है
जिनकी कुर्बानी के दम पे मां के सर का ताज़ हैं
गर हिमाकत भी करे कोई गद्दारे वतन
उस हिमाकत को कुचलने में हमारी शान है
इस वतन की आबरू में ही हमारी जान है
मां बहन बेटी की इज्जत में हमारी शान है
जिसको सींचा है भगत,असफ,तिलक, सुभाष ने
उस बगिया के फूल पर तो आज सभी की आस है
जिनकी कुर्बानी के दम पे मां के सर का ताज़ हैं
सात रंगों सी हंसी दुनिया है हमारे देश की
भेष,भाषा,भाव,रंग ही हमारी पहचान है
आओ वंदन करले उनका जिनकी लहू है रज़ कण में
वीर सपूतों के बल पर ही तो हमारा ये हिन्दुस्तान है
नमन है ऐ वीर तुमको तुमने दिया है ये अवसर
तेरी ये कुर्बानी तो आज मेरे सर का भाल है
जिनकी कुर्बानी के दम पे मां के सर का ताज़ हैं
उन वीर सपूतों पर तो आज हमको नाज़ है
आजादी अभी अधुरी है..!
सपने सच होना बांकी है
कलियां खिलने से पहले
जहाँ तोड़ दी जाती है
कैसे कह दू मैं
हम आजाद देश के बासी है
लाखो सर को छत नहीं
ज़िन्दगी उन्हे ऊबाती है
आजादी अभी अधुरी है
सपने सच होना बांकी है
माँ की ममता पिता का प्यार
एक उम्र तक ही भाति है
बस एक पडाव के बाद
वृद्धाश्राम पहुच जाती है
तडपती ममता ठीठकता प्यार
ओर फैशन हुई दिवानी है
आजादी अभी अधुरी है
सपने सच होना बांकी है
दहेज के दानव देखो कैसे
अपनत्व नोच कर खाते है
महज चन्द रूपयो के खातिर
अपने जलाये जाते है
बेटी प्यारी बहु से बैर
ये कैसी नादानी है
आजादी अभी अधुरी है
सपने सच होना बांकी है
क्या ऐसी आजादी के
ताने - बाने बोये थे
सैकडो मांगे ऊजड गयी
लाखो ने जीवन खोये थे
सोचा तुमने क्या बितेगी उनपे
ज़िसने जीवन कुर्बान किया
हमारी-तुम्हारी आजादी को
ज़िसने तन मन दान किया
उसकी आत्मा कल्पित होगी
जिसने दी कुर्बानी है
आजादी अभी अधुरी है
सपने सच होना बांकी है
आओ इस हीरक वर्ष मे
खुद से ही संकल्प करे
कलियां ना फीर कोई तोड़ सके
वृद्धाश्राम ना किसी को छोड़ सके
बहु को बेटी का सम्मान मिले
निज जीवन से ज्यादा
औरो का जीवन आशान बने
फीर गर्व से कहेंगे हम
हा हमने पायी आजादी है
ना आजादी अभी अधुरी है
ना सपने सच होना बांकी है
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रानी लक्ष्मी बाई की पुण्यतिथि पर विशेष रचना..!
-----रानी लक्ष्मीबाई-----
झांसी की रानी याद रहा
भारत के अमर वीरों में इनका
अलग ही एक इतिहास रहा
भागीरथी और मोरोपंत ने
भारत को ऐसा संतान दिया
मोरोपंत को भूल गए पर
मणीकर्णीका याद रहा
एक बाला थी बेहद सुंदर
विलक्षण प्रतिभा थी जिसके अन्दर
वात्सल्य प्रेम से दूर रही पर
देश प्रेम की ज्वाला में तपकर
तलवार, बन्दूक, घुड़सवारी
बचपन से ही शौक है पाले
उस बाला की कौशल देखकर
गंगाधर भी हुए दिवाने
व्याह हुआ फिर झांसी गई
अंग्रेजो से करी लड़ाई
अपनों ने जब साथ है छोड़ा
नाना,टोपे को फिर साथ है लाई
सन् ५७ का बर्ष था यह
पुरे देश में मची लड़ाई
रानी ने मर्दीनी बनकर
झांसी की थी लाज बचाई
पीठ पे लाडला लगाम मुॅह में
दोनों हाथ तलवार चलाई
साथ ना मिला जीवाजी का
फिर भी अंग्रेजों को चने चबवाई
फिर खाकर सर पे तलवार
मुर्छीत होकर गिर पड़ी
और देश की रक्षा राह में
एक और वीर की बलि पड़ी
जीवन भले ही अल्प था इनका
इतिहास इक लम्बा रच डाली
सैकड़ों अंग्रेजी सेना पर
एक मर्दानी थी भारी..!
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देश को संवारने में,
योगदान जिसका मिला।
भारत की एकता को,
स्वप्न दान जिसका मिला।
ऐसे महापुरुष को
कितने है पहचानते,
नाम कुछ को याद है पर,
काम सब नही जानते।
कहते है जिगर था लोहे का,
थी फौलादी इच्छा शक्ति।
पर देश प्रेम से बढ़कर वो,
न कर पाया एक की भक्ति।
रहे गुमनामी में खोए कुछ दिन,
अब उनको है नाम मिला।
बारडोली सत्याग्रह से,
हमको एक सरदार मिला।
562 रियासतों को मिलाकर,
भारत को है एक किया।
हैदराबाद, जूनागढ़ ने जब,
कर डाला बगावत था।
न हो ये भारत में शामिल,
उनका ये खिलाफत था।
तब दम भरा उसने शासन का,
दोनो को भारत में मिला दिया।
जूनादढ़ और हैदराबाद के,
नवाबों को भी हिला दिया।
J&k भी न होता प्रबल,
होता वह भी पूरा सबल,
गर सरदार की नीति चल जाती।
पर खेल हुआ उसमे भारी,
गांधी, नेहरू ने अड़ा दिया।
सरदार की इस फौलादी नीति को,
कश्मीर में आकर गिरा दिया।
हश्र हुआ क्या फिर सबने देखा,
लोग चुन-चुन मारे जाते थे।
निरपक्षता की चादर ओढ़कर,
कहां बचा हम पाते थे।
आई बारी जब सोमनाथ की,
पटेल ने ही अंजाम दिया।
अपने दम पर इस मंदिर को,
एक नया मुकाम दिया।
विरोध हुआ शासन में भारी,
सब को खुद पर झेल लिया।
सोमनाथ नवनिर्माण कराकर,
संस्कृति बेमिसाल दिया।
इस महामानव के बल पर ही,
है हिंदुस्तान।
वरना होता खंड - खंड,
न रहता अपना कोई निशान।
यूं ही नहीं होता कोई लौहपुरुष,
कीमत चुकानी पड़ती है।
भारत माता की सेवा में,
जीवन बितानी पड़ती है।
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मानवता क्यूं बिक रही है,
पैसों के बाज़ार में।
नैतिकता का मूल्य नहीं है,
आज के व्यापार में।
आपदा में हैं अवसर ढूंढो,
ऐसी सोच है जबसे आई।
लोगों ने तो भाव बदल ली,
करने लगे कमाई।
जैसे ही लाचार दिखे,
की बस उनको ही लूट लिया।
आफत में हैं जान जिसकी,
कहां उनको है छूट दिया।
खबर ऐसी ही हर जगह से,
बयां होती अखबार में।
मानवता क्यूं बिक रही है,
पैसों के बाज़ार में।
नैतिकता का मूल्य नहीं है,
आज के व्यापार में।
पानी से लेकर सांसों तक,
सबकी कीमत है तय हुई।
पर वो कहां सुनने वाले,
है जिसकी आत्मा मरी हुई।
उनको तो बस पैसा प्यारा,
बांकी जाए भाड़ में,
मानवता क्यूं बिक रही है,
पैसों के बाज़ार में।
नैतिकता का मूल्य नहीं है,
आज के व्यापार में।
हमने जिसको देव है माना,
अपने रब से बढ़कर जाना
उसने ही क्या सिला दिया,
अस्पताल में आते ही।
परिजनों को रुला दिया।
बेड भी बेचा दवा भी बेची,
है पेशे को ही बेच दिया।
और कुछ न मिला जब तो,
लाशों को भी बेच दिया।
हमने जलाए थे दिये और,
बजाई थी थाली जिसके सम्मान में।
मानवता क्यूं बिक रही है,
पैसों के बाज़ार में।
नैतिकता का मूल्य नहीं है,
आज के व्यापार में।

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