अधूरा रहे तो अच्छा होगा
नाम तुम्हारा
गुमनाम रहे तो अच्छा होगा
दिल तो रुसवाई करेगा ही
मगर इसका
अब क्या ही कहना
बस तुमसे
अब ना मिले तो अच्छा होगा
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खुशनुमा तो रातें होती हैं मगर हमारा तो दिन था।
याद है वो वार आज भी वो सुबह रविवार का था।
लबों पर हिचक थी इसीलिए तो आंखो से मुस्कुराना था।
धड़कने तो तेज थीं मगर नजरें भी मिलना था।
और उनका अब क्या कहे जनाब वो तो कातिल- ए - दिल हैं।
सफेद कमीज के साथ आखों पर रोज का चश्मा था।
मुलाक़ात तो पहली थीं इसीलिए वक़्त भी थामना था।
फ़िक्र भी थी उन्हें हमारी मगर प्यार दिल में बेहिसाब था
लोगों के लिए हम दो लोग थे मगर हमारा तो वो एक ख़्वाब था।
बेशक मुलाकात चंद लम्हों का था मगर
हमारे लिए तो हमारा बरसों का पूरा होता अरमान था।
याद है वो वार आज भी वो सुबह रविवार का था।।
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