रविवार, दिसंबर 11, 2022

रचना :- आनंद "अमन"

खुशियाँ..! 

छूटती जाती है, कलाई 
टूटते जाते है,   ख्वाब ।
सोचता हूँ हक़ीक़त 
क्यों होती है, इतनी हाजिर जबाब।।
वो आती है, बसंती झोकों की तरह
झकझोर जाती है मदमस्त शाकी की तरह
नहा जाता हूँ, उनकी भीनी खुशबुओं में,
सराबोर हो जाता हूँ, रंग-रेलियों में।
दूसरे ही पल, सब कुछ वीरान 
जिंदगी के पास, फटकती श्मशान।
नयनों में नींद नहीं, चित्त में चैन नहीं
अपने भी लगते हैं , बिल्कुल अंजान।।
न किसी के आने की दस्तक 
न किसी के जाने का आहट।
बदला क्या? क्या परिवर्तन?
चुभने लगी, अब फगुनाहट।
शायद, खुशियों में ठहराव नहीं, 
या मैं, इसका पड़ाव नहीं।
कहीं--फ़ितरत तो नहीं,                 
बेवफाई इसकी.........
एक आवाज आती है!
क्युं टूटते हो, क्यों छूटते हो
कंकरीला राह है तो, खूब चीखते हो।
बिछ जाती हूँ, जब जिंदगी में तेरी
तब तो मजा, खूब लूटते हो।।


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बाग में खिलते-मुस्कुराते पुष्पों के राग में तुम।
इठलाती-बलखाती, रंग-बिरंगी तितलियों सौंदर्य में तुम।
कृष्ण की बाँसुरी से निकला, सुर-तान में भी तुम।
मीरा-सी दीवानी हो, मेरी राधा रानी हो।
चकोरी तुम-चांदनी तुम, मेरे अनुराग की रागिनी तुम।

प्रणय-दाह है ऐसा, कि ऊष्मा नहीं होती।
दिया जलता निरंतर,बाती उफ नहीं करती
रजनी रोती है रात भर, धरा धधकती रहती
चाँदनी देती शीतलता,सूरज जलता रहता

प्रेमालिंगन में बेसुध भ्रमर, कमल-क्रोढ़ में रह जाता है।
सूरत-गृह में कैद रातभर, रति-आनन्द उठाता है।
कोमल कमल-पंखुड़ी को, प्रेमवश काट नहीं पाता है।
सुबह काली सूरत लेकर, वह अन्यत्र उड़ जाता है।

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कदम-दर-कदम कोई लड़खड़ाता है,
बात उसकी करो जो चीर कर निकल जाता है।
चीरकर निकल जाता है--- एक सन्नाटा,
और कुचल जाती है, कितनी जिंदगियाँ।
इन जिंदगियों की दिनचर्या से अंजान
कफ़न का दाम कोई और भुनाता है।
कदम-दर-कदम कोई लड़खड़ाता है,
बात उसकी करो जो चीर कर निकल जाता है।
गरीब-निरीह बगैर जुर्म के जेल जाता है।
मुजरिम शासक बन उसको चिढ़ाता है।।
कदम-दर-कदम कोई लड़खड़ाता है,
बात उसकी करो जो चीर कर निकल जाता है।
हमारी गंदी बस्तियां,
सभ्रांत समाज को, मुँह चिढ़ाती है।
बात उस मक्खी की करो,
जो नाक पर रुमाल रख, दनदनाकर निकल जाती है।
कदम-दर-कदम कोई लड़खड़ाता है,
बात उसकी करो जो चीर कर निकल जाता है।
गुल को अनवरत टकता रहे माली,
धूम-धड़ाका उसका है, जो बुलबुल ले उड़ जाता है।
कदम-दर-कदम कोई लड़खड़ाता है,
बात उसकी करो जो चीर कर निकल जाता है।
माँ की प्रसव-पीड़ा, कोई कहाँ सुन पाता है।
खुशियाँ मनती है उसकी, जो चीर कर निकल आता है।।
कदम-दर-कदम कोई लड़खड़ाता है,
बात उसकी करो जो चीर कर निकल जाता है।

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लड़खड़ाते नहीं कदम कभी
मयखाने के रास्ते
तवायफखाने के रास्ते।
पर घबराता है मन,
थाने के रास्ते
अदालतखाने के रास्ते।
पर घबराता है मन,
थाने के रास्ते
अदालतखाने के रास्ते।
मयखाने में गम बंट जाता है
तवायफखाने में प्रेम मिल जाता है
थाने में, नित मानवता बेची जाती है
अदालतखाने में न्याय कुचली जाती है।
लड़खड़ाते नहीं कदम कभी
मयखाने के रास्ते
तवायफखाने के रास्ते;
पर घबराता है मन,
थाने के रास्ते
अदालतखाने के रास्ते।
गुजरते हैं कभी अंधेरी रातों में 
छुपते-छुपाते, 
दिल बहलाने के वास्ते।
पर, घबराता है मन
दिन के उजाले में
न्याय पाने के वास्ते।
लड़खड़ाते नहीं कदम कभी
मयखाने के रास्ते
तवायफखाने के रास्ते;
पर घबराता है मन,
थाने के रास्ते
अदालतखाने के रास्ते।
मयखाने में खुद को सुकून मिल जाता है।
तवायफखाने में दिल पर रहम बरपा जाता है।
ओहदे और कुर्सियों से, ये मन इतना घबराता है।
घूंट-घूंटकर जीता है।
कुछ कह नहीं पाता है।।
लड़खड़ाते नहीं कदम कभी
मयखाने के रास्ते
तवायफखाने के रास्ते;
पर घबराता है मन,
थाने के रास्ते
अदालतखाने के रास्ते।

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मरहम तू है बेशक, मेरे ज़ख्मों का
          पर अपने ज़ख्म दिखाता कैसे?
यह सच है ज़ख्म, वर्षों पुराना है
          पूछती हो ये ज़ख्म, ताजा कैसे?
बड़ी देर तक मैं, टकता रहा रास्ता
          रास्तों से पता तेरा,पूछता कैसे?
फ़ासलों में है रिश्ते, रिश्तों में दूरियां
          मैं ये दूरियां, मिटाता कैसे?
भले आँखें गीली हुई थी तुम्हारी
        महफ़िल में गिरे मोती,उठाता कैसे?
तुम सामने आ गयी थी, यकायक
        नज़रें मिल चुकी थी, चुराता कैसे?
ठिठके कदम थे, अटकी थी साँसे
        जुबां खामोश, कुछ कहता कैसे?
दिलों में भले न हो, दूरियां
         दरम्यां जमाने का,घटाता भी कैसे?
भले वो कसक आज भी पल रही है
         बेबसी कि-आंहे भरता भी कैसे?
उम्र ढलती गई, इश्क बढ़ता गया
         केश की तरह,सफेद हो गया मैं। 
अब भी जिंदा हूँ, तेरे इंतज़ार में
         साँसे थक चुकी है,कहता भी कैसे?
मरहम तू है बेशक, मेरे ज़ख्मों का
          पर अपने ज़ख्म दिखाता कैसे?
यह सच है ज़ख्म, वर्षों पुराना है
          पूछती हो ये ज़ख्म, ताजा कैसे?  

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आरोप-प्रत्यारोप..!
आप लिखने वाले हैं, जो चाहते हैं लिख लेते है। 
बेवजह आरोप-प्रत्यारोप, मुझपर क्यों लगाते हैं।।
मैं जो करती हूँ लिखते हैं, जो न करती हूँ लिखते हैं।
मेरे अंदर के भावों को, खुद के हिसाब से लिखते हैं।। 
न तरकश लेकर चलती हूँ, न निगाहें तीर चलाती है।
खुद ठोकर खाकर गिरते हैं, मुझपर इल्जाम लगाते हैं।।
मुझमें भी दिल है, मैं भी सपने बुनती हूँ।
मुझमें भी स्पंदन है, मैं भी अरमां सजाती हूँ।।
लिखने वाले आप, शब्दों में रो लेते हैं।
पीते-पीते आप, मयखानों में सो लेते हैं।।
मैं न सोती हूँ - न रोती हूँ, अंदर-अंदर घुटती हूँ।।
आप भले मुहब्बत करते होंगे, मैं भी ताजमहल बनाती हूँ।।
नारी हूँ , कोमल हृदय हूँ , मुझपर कलम चलाते हैं।
गर दिलेर कवि हैं, तो क्यों नहीं हिटलर को विषय बनाते हैं।।
आप लिखने वाले हैं, जो चाहते हैं --- लिख लेते हैं।
बेवजह आरोप-प्रत्यारोप, मुझपर क्यों लगाते हैं।।
न तरकश लेकर चलती हूँ, न निगाहें तीर चलाती है।
खुद ठोकर खाकर गिरते हैं, मुझपर इल्जाम लगाते हैं।। 

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उमड़ते ऊर के क्षीर की भांति, 
कविता आती है प्रसव काल के बाद।
घुमड़ता है मेघ तीन ऋतुओं तक, 
बरसता है असह्य अवस्था के बाद।।
हृदय को जलाती है वेदना यों
जैसे जलती है जेठ में बरसते ओले।
सिकुड़ाये रखती है, घुटनों को कांधे में,
जैसे पूस की ठिठुराती सर्द चोले।
दर्द जम जाता है, भारी हो जाता है
बरसना भी चाहता है, परन्तु नहीं
बरसात का इंतजार करना होता है।
पुनः ग्रीष्म आती है, जलाती है
पिघलाती है, बरसने को आतुर करती है।
ढोती, सहती, समेटे रखती है
उदर को, एक आशा---जीवन आशा।
दर्द असह्य होता है, रोटा है-चिल्लाता है
दिव्य प्रकाश, चौंधियाता है जग को।।
बरस पड़ता है मेघ, शीतल करता है जग को।
उमड़ते ऊर के क्षीर की भांति, 
कविता आती है प्रसवकाल के बाद।।

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मेरे मन का भोला पक्षी, मेरे मन में रहता है।
फुदक-फुदक कर इस छत से, 
उस छत तक चला जाता है।।
मेरे मन का भोला पक्षी, मेरे मन में रहता है।
कभी शहर की ऊंची मुंडेर पर, 
कभी दिल्ली की अट्टालिकाओं पर।
कभी कराँची की सड़कों पर, 
चक्कर खूब लगाता है।।
मेरे मन का भोला पक्षी, मेरे मन में रहता है।
फुदक-फुदक कर इस छत से, उस छत तक चला जाता है।।
दिन एक मेरा भोला पक्षी, मुझसे रूठा-मुझसे टूटा।
बात मेरी समझ न आई, उसका नाता सरहद से टूटा।।
दूर कराँची में जा उसने, आशियाना अपना नया बसाया।
जब-जब उसकी यादें आई, आँखे रोई-दिल भी रोया।।
एक नहीं कई दशक बीत गए, हमने दिल को खूब बहलाया।
वह भी चैन से रह न पाया, जब वह बंदा होश में आया।
भूल न पाया मोहक खुशबू, गंगा-जमुना के तट की।
लखनऊ की रंगीन रातें, और दिल्ली की दिल्लगी की।।
मस्जिद के अजां से घुलमिल, बजते मंदिर के घंटों की।
सेवईयों की खुशबू की, होली और दीवाली की।।
मेरे मन का भोला पक्षी, तड़प गया हिन्दुस्तां आने को।
जी उसका कुछ यूँ घबराया,
मानो काट रहा कराँची उसको।।
मैंने कहा-- ऐ भोला पक्षी, तू पाक है--पाक मन से आजा।
रांची व कराँची दो है, मन से यह विद्वेष भूला जा।।

मेरे मन का भोला पक्षी, मेरे मन में रहता है।
फुदक-फुदक कर इस छत से, उस छत तक चला जाता है।।
घर नया पाकर, पहले तो खूब इतराया
खुली हवा खाने की लत थी, खूब मौज उड़ाया।।
था उसे पता नहीं, शहरों में विकास की आँधी चली है।
कट रहे हैं पेड़ सारे, सड़क चौड़ी हो चाहे पतली गली है।
कुल्हाड़ी की चोटों ने, घोंसला उसका काट गिराया।
देख मानव की उच्छृंखलता,बहुत ज्यादा वह घबराया।।
मेरे मन का भोला पक्षी, अब सदा मन में ही रहता है।
बाहर आने से है चिढ़ता, हर आहट से भी डरता है।।
जब कभी मन उबता उसका,आसपास ही फुदकता है।
सुबह निकलता-शाम से पहले, वह दिल में आ जाता है।।
मेरे मन का भोला पक्षी, मेरे मन में रहता है।
बाहर निकलने से पहले, मैं उसे खूब समझाता हूँ।
जाति-धर्म की पाठ पढ़ाता, हर मुंडेर-छत दिखाता हूँ।
इतनी सी बात मगर, वह समझ नहीं पाता है।
हिन्दू और मुसलमां हो चाहे, हर छत पर चढ़ जाता है।
मेरे मन का भोला पक्षी, मेरे मन में रहता है।
फुदक-फुदक कर इस छत से, उस छत तक चला जाता है।।
मेरे मन का भोला पक्षी, मेरे मन में रहता है।

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ऊब रहा है आदमी, आज आदमी की शक्ल से।
मौलिकता भी संशय में है, अपनी ही नकल से।।
हर चेहरे पर यहाँ, आज कई नकाब है।
हिजाब के अंदर, न जाने कितने हिजाब है।
कोई धर्म का ठिकेदार है, कोई जाति-पंथ का।
किसी को दौलत का गुरुर, किसी को दंभ बल का।।
आम इंसान का जीवन, सचमुच में एक धोखा है।।       
इसके विकास की गंगा,किसी शहस्त्रबाहु ने रोका है।
ऊब रहा है आदमी, आज आदमी की शक्ल से।
मौलिकता भी संशय में है, अपनी ही नकल से।।

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मेरी जिंदगी..!
मेरी जिंदगी,
पुरानी डायरी के चार उखड़े हुए पन्ने की तरह ही है।
जिसका न कोई अतीत, न वर्तमान, न ही कोई भविष्य ही है।।
न जाने क्यों, बस जिये जा रहा हूँ। 
अपनी ही बोझ से दबे जा रहा हूँ।।
सेल्फ की किताबों के बीच दबा, धूल फांकता मैं।
जिसे कभी-कभार धूल झाड़ने के बहाने, खोलता हूँ मैं।।
इसमें रखे सूखे गुलाब की चंद कलियां।
ख़ुशबू के अहसास से भरी ये पंखुड़ियाँ।
इन पन्नों में नाक घुंसेड़ कर, याद करता हूँ, बीते पल।
मानो किसी ने अपना दिल रेहन रखा हो मेरे पास, कल।।
पुनः डायरी बंद, सेल्फ में कैद - बीते यादों की तरह।
मैं छुपा हूँ अपनी ही जिंदगी में, एक गुप्त रोग की तरह।।
मेरी जिंदगी,
पुरानी डायरी के चार उखड़े हुए पन्ने की तरह ही है।
जिसका न कोई अतीत, न वर्तमान, न ही कोई भविष्य ही है।।
न जाने क्यों, बस जिये जा रहा हूँ। 
अपनी ही बोझ से दबे जा रहा हूँ।।


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ऐ सर्दी! तुम इतनी ठंडी क्यूँ हो
क्यों कांप रही हो आपादमस्तक
बर्फ की चादर से, ढकी तुम 
ऋणात्मक ताप में दुबकी दुम
थरथराते बदन,कटकटाते दांत
हिलते पांव,घूँटनों में फंसी आंत
लेकिन है, राहत की एक बात
आज नहीं पूछेंगे, तुम्हारा धर्म व जात।
मैं तुम्हें दूंगा, एक कम्बल
एक सेल्फी की कीमत पर
हम हर सर्दी में यह रश्म दुहराते हैं 
इसी बहाने, हम हमदर्द बन जाते हैं
ऐ सर्दी! तुम आ जाओ मेरे पास
मैं अपनी हाथों की गरमी से 
अपने जिस्म के तापमान से 
तुम्हें, तुम्हारी सर्दी से मुक्त कर दूंगा
तुम्हारे आबोहवा में गरमी भर दूंगा।
तुम्हें दूंगा एक जिंदा अहसास
क्योंकि मैं हूँ बहुत,  ख़ास।

***************

मैं हूँ अकेला इस आलम में, ये अदा मेरे दिल की है।
कौन चाहे-किसको चाहे, ये अदा महफ़िल की है।
तूने बड़ी सफाई से, इश्क़ से इंकार किया
मैं बेवकूफ ठहरा, जो तेरा ऐतबार किया।
क्यों तुम्हें लगता है, मैंने गुनाह किया
हां यह कुसूर था , मैंने इकरार किया।
मैं हूँ अकेला इस आलम में, ये अदा मेरे दिल की है।
कौन चाहे-किसको चाहे, ये अदा महफ़िल की है।
जो होना था, वह तो अब हो गया
आप कहे, क्या सज़ा तय किया है।
चला जाऊंगा, इस महफ़िल से सदा के लिए।
सिर्फ इतना बता, यह खेल था किसलिए?
मैं हूँ अकेला इस आलम में, ये अदा मेरे दिल की है।
कौन चाहे-किसको चाहे, ये अदा महफ़िल की है।
मैंने क्या बिगाड़ा, जो ये दिल तोड़ा
इस मुकाम पर लाकर, मुझे छोड़ा।।
दे नहीं सकती अपना दिल, तो दे दे मेरा दिल।
लौटा दे तू मेरी मोहब्बत, दे दे मेरा दिल।।
मैं हूँ अकेला इस आलम में, ये अदा मेरे दिल की है।
कौन चाहे-किसको चाहे, ये अदा महफ़िल की है।

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मैं मय की चाह में,  मयख़ाना चला
मगर मेरे पांव ने, मंदिर पहुंचा दिया।
देखा सामने, निः शब्द-चुपचाप
स्तब्ध-सा, मुरली थामे खड़ा था कन्हैया

मैं तो बस एक बाला से था बिछड़ा
कन्हैया तो पूरी ब्रज से था बिछड़ा।
मैं तो थोड़ा-थोड़ा, अब भी डोल रहा था।
पर मेरा कन्हैया, न कुछ बोल रहा था।

देख इस हाल में , मेरे नैन भर आए
होकर रुआंसा-सा, मैंने समझाया।
धीरे-धीरे सर पे उनके हाथ फिराया
बोला इन बालाओं पर मत करना भरोसा
वरना टूटनी है, जिंदगी से आशा।

मैं मय की चाह में,  मयख़ाना चला
मगर मेरे पांव ने, मंदिर पहुंचा दिया।

मैंने कहा कान्हा, अब डिस्को का है जमाना
बाँसुरी छोड़ कर,पॉप म्यूजिक होगा बजाना।
नौकरी-चाकरी ढूंढो, बेच दो सब गइया
ऊपरी आमदनी से,कमाना होगा रुपैय्या।
फ़ैशन के इस दौर में बड़ा उलझन है भईया।
सारी सैलरी इसी में हो जाएगा झोकैय्या।
बात मेरी सुन, मुस्कुराने लगे कन्हैया।।
नशा जो उतरा, तो हक़ीक़त समझ आई
इश्क़ न करने की हमदोनों ने कसम खाई।
मैं मय की चाह में,  मयख़ाना चला
मगर मेरे पांव ने, मंदिर पहुंचा दिया।


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मरहम तू है बेशक, मेरे ज़ख्मों का
          पर अपने ज़ख्म दिखाता कैसे?
यह सच है ज़ख्म, वर्षों पुराना है
          पूछती हो ये ज़ख्म, ताजा कैसे?
बड़ी देर तक मैं, टकता रहा रास्ता
          रास्तों से पता तेरा,पूछता कैसे?
फ़ासलों में है रिश्ते, रिश्तों में दूरियां
          मैं ये दूरियां, मिटाता कैसे?
भले आँखें गीली हुई थी तुम्हारी
        महफ़िल में गिरे मोती,उठाता कैसे?
तुम सामने आ गयी थी, यकायक
        नज़रें मिल चुकी थी, चुराता कैसे?
ठिठके कदम थे, अटकी थी साँसे
        जुबां खामोश, कुछ कहता कैसे?
दिलों में भले न हो, दूरियां
         दरम्यां जमाने का,घटाता भी कैसे?
भले वो कसक आज भी पल रही है
         बेबसी कि-आंहे भरता भी कैसे?
उम्र ढलती गई, इश्क बढ़ता गया
         केश की तरह,सफेद हो गया मैं। 
अब भी जिंदा हूँ, तेरे इंतज़ार में
         साँसे थक चुकी है,कहता भी कैसे?
मरहम तू है बेशक, मेरे ज़ख्मों का
          पर अपने ज़ख्म दिखाता कैसे?
यह सच है ज़ख्म, वर्षों पुराना है
          पूछती हो ये ज़ख्म, ताजा कैसे?


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     वर्तमान राजनीति..!
सिमटते-सिमटते सिमट गया
यह देश क्यूँ बदनसीबी से लिपट गया।
जब हम भूखों मर रहे थे 
ये नेतागण भूख को मिटाने के वादे से पलट गया।।
हमने वोट दिया अपने को दाने-दाने को तरसाने को। 
उसने सौगात समझ ले लिया दावतें उड़ाने को।।
देखा, इस सर्दी में मरी पड़ी 
कितनी जवां और बूढ़ी हड्डियों को।
चले आये सहानुभूति दिखाने वो 
तोंद पे हाथ फेरते, कफ़न बाँटने को।।
जो बचे है उन्हें ईश्वर का दया समझ के।
दर्द दिखाने आए वोट बैंक समझ के।।
हम बरसात में घुटने तक धँसकर चलते है
पर जहाँ फंसता था, उनके फॉर्च्यूनर का चक्का। 
हम तो आज भी अभ्यस्त है, अपनी बदहाली से। 
पर उनके घर तक का सड़क है जरूर पक्का।।
अरे! वे क्या हमारी भूख मिटाएंगे ?
बस जो चले तो देश की कड़ाही में जनता को भूनकर खा जायेंगे।।
तजुर्बे के अनुसार ओहदे बढ़ते जाते है।
आज जो हत्यारा-खूनी है, कल के नेता हो जाते है।।
पता नहीं ये हैं, किस वंश के।
रावण के रिश्तेदार हैं या वंशज है कंस के।।
पर जो भी हो जनता-जनार्दन के मामा कहलाते हैं।
मानो-न- मानो, खुद को भगवान बताते है।।

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21वीं सदी में कवि
ढूंढता है श्रोता
लिखता है कम कविता।
क्रांतियाँ अब फूटती नहीं
कविताओ से,
अपने अस्तित्व की रक्षा में
हर रोज कवि करते है--
क्रांतियाँ, श्रोताओं से।।
अब कविताएँ होती नहीं ग्राम्य-जीवन पर
हाड़-मांस के मानव पर
नित-प्रतिदिन
मानवता कुचली जाती है।
कविताओं का विषय घुमने
राजभवन जाती है।
घोटालों की चर्चा का,
विज्ञापन कविता होता है।
नेताओ के चरित्र का, गिरता ग्राफ़
कवियों का प्राण होता है।।
21वीं सदी में कवि, ढूंढ़ता है श्रोता
लिखता है कम कविता।।
अब मेहबूब की गाल
लगती है प्याज की छाल।
कवियों की कल्पना में
खिली कुमुदनी फूल नहीं होती।
कवियों को दिखता है
परमाणु विस्फोट।
दिखती नहीं, इसके पीछे छिपी ।
करोड़ों दिलों की चोट।।
हे कवि महोदय!
आप कविताओं के माध्यम से
अपनी पहचान बताते हैं
फिर क्यों नहीं,
आलोचना-प्रशंसा से हटकर
अपनी विषय बनाते हैं -
अपनी विषय बनाते हैं।
        
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         आतंकवाद..!

मैं चाहता हूँ हो एक विस्फोट
अध्यात्म के अणु का
या मैं ही बन जाऊँ
एक मानव-बम 
प्रेम और मानवता के बारूद का 
और जा टकराऊ 
किसी आतंकी दुनियां की 
ऊँची ईमारत से।
भरभराकर गिर पड़े 
नफरत की ईमारत 
ताश के पत्तों की तरह
मैं बन जाऊँ मोस्टवांटेड
उस आतंकी दुनियां के लिए
जो मौत का कारोबार करता है।
नफरत फैलाता है
नफ़रत बाँटता है, नफरत पाता है।
इसे धर्म भी बताता है।
बताता है, वह इसे 
मजहबी जिहाद।
यह जिहाद, कैसी जिहाद है?
को बच्चे को 
पुस्तकों की जगह 
असलह पकड़ाए
जीवन के मधुरतम क्षण में ही 
द्वेष की अँगुली थिमाएं
और अग्रसर करें 
मधुर-स्वप्निल समाज को
विनाश की ज्वाला की ओर।। 

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        बिखरते सपने..!
मखमली लिहाफ़ का गर्म अहसास
जिजीविषा को पुष्ट करती हर सांस
कि, जग में मेरा भी होगा, कोई एक-कोना
आनन्दित हो रही थी, देख जीवन का सपना।।
गर्म हो रही थी मैं, मां के ममत्व में
जीवंत हो रहे थे, मेरे अंदर के सपने।
पर मुझे क्या पता था, यह अर्धरात्रि के सपने
पौ फटते ही, जिसे थे----बिखरने।।
मैं नहीं दे सकती थी, पिता की तरह बांग
पितृसत्तात्मक समाज में , मेरी नहीं थी--- मांग
मैं थी इस सभ्य समाज की एक शालीन बोझ ।
इसलिये मेरी बहनें गर्भ में ही मार दी जाती है रोज।।
सुबह होने ही वाली थी, पौ फटने ही वाला था
मेरी जिंदगी की कहानी, समाप्त होने ही वाली थी।
पर, मैं अपनी जिजीविषा रोक नहीं पा रही थी
जबकि मेरी हत्या की साज़िश रची जा चुकी थी।।
भाई की तरह मैं नहीं देख पाई --- सुबह का सूरज
नेरे नसीब में नहीं था ---- कोई गोधूलि शाम।
मेरा फुदकना सपनों में ही कैद हो गया
मेरी आंखें सदा के लिये, चिरनिद्रा में सो गयी।।
मैं चीखती रही..….......माँ
कातर नज़रों से निर्निमेष निहारती रही,
टूटती सांसों के साथ --- सिसकती रही।
आर्त हृदय से चीत्कार करती रही।।
माँ, मुझे भी दो मौका अपने बुढ़ापे की लाठी बनने का
मुझपर भी करो भरोसा, एक इबारत लिखने का।
मेरे ही कन्धे पर तो था, खानदान की इज्ज़त का जुआ
आख़िर मुझ बेटी से ही , यह समाज इतना निष्ठुर क्यों हुआ।।
आख़िर मुझ बेटी से ही , यह समाज इतना निष्ठुर क्यों हुआ।। 
आख़िर मुझ बेटी से ही , यह समाज इतना निष्ठुर क्यों हुआ...!  

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" गठबंधन की राजनीति "

मैं कोई साहित्यकार नहीं, 
कथाकार नहीं, चित्रकार नहीं..।
पर इतना तो स्पष्ट है, 21वीं सदी की 
दहलीज पर पैदा हुआ,
अम्बेसडर कार की तरह बेकार नहीं..।।
कभी-कभी तेल ही नहीं, 
बिना बिजली-पानी  के भी झेल लेता हूँ..।
गुलाब की प्रत्याशा में,
गेहूँ की सुगंध से जिंदगी ठेल लेता हूँ..।।

अब सब्जियाँ जलती नहीं,
क्योंकि तेल में में तलती नहीं..।
हम शुद्ध शाकाहारी हो गए, 
लहसुन-प्याज तक मिलती नहीं..।।
जनता तो जनता सरकार तक रोती है..।
संसद में झगड़ा, पति-पत्नियों सी होती है..!
खुन्नशे दूर करने में लगे हैं,
हर मुखिया सरकार का..।
बिदक जाये ना महबूब कहीं,
नई-नवेली इकरार का।।
वो भी इल्जाम लगाने लगी है, 
क्यों रोज नए रिश्ते बनाते हो।
हमने ख़िजकर कहा--- 
सरकार गिर न जाये, तुम्ही तो धमकाती हो..।।
भाई औरत की बेवफाई पर शक नहीं करना..। 
चाहे तेल-डीजल हो या रेल दे देना..।।
पता नहीं, वो सबेरे किस मूड में आ जाये..।
श्रीमति जी ! किसी और के साथ 
सरकार बनाये..।।
टूटता तिलस्म भ्रष्टाचार का, 
ढहता लालकिला सदाचार का,
फिक्र है सबको पापड़-आचार का..।
क्यूँ कर खिचड़ी अब रोचक नहीं लगती...।
पके चावल की , चर्चा नहीं होती..।।
चर्चा होती नहीं,अब गरीबों के पेट का..।
शिक्षा-चिकित्सा या परीक्षा के डेट का..।।
चर्चा का विषय है, अगले एपिसोड में, 
कौन नेता करने वाले है, 
घोटाला इंडिया गेट का।
घोटाला इंडिया गेट का।।

( आनंद "अमन" द्वारा रचित पूर्व प्रकाशित रचनाओं के विस्तृत संग्रह पढ़ने के लिए निचे लिंक पर क्लिक करें..!👇)

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