मंगलवार, नवंबर 15, 2022

आलेख :- पंकज पलक्ष..!

बिरसा मुंडा :- संक्षिप्त परिचय..!

छोटा नागपुर की पहाड़ियां जो वर्तमान झारखंड के अन्तर्गत आता है इसके खूंटी जिले में 15 नवम्बर 1875 ईo को एक गरीब किसान परिवार में बिरसा मुंडा का जन्म हुआ । आदिवासी समाज के लिए और इन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजा दिया । 1897 से लेकर 1900 तक बिरसा मुंडा के साथियों और अंग्रेज़ो के बीच कई युद्ध हुए। 
खुंटकुटी व्यवस्था पर जागीरदारों और पुरोहितों का कब्जा बन गया। पहले सामुदायिक भू स्वामित्व आदिवासियों के पास था ,जिसे अंग्रेज़ो ने निजी स्वामित्व के तौर लागू कर दिया और लगान के तौर पर काफी रकम वसूलने लगे । जिसे चुकाने में आदिवासी समुदाय सक्षम नहीं थें, क्योंकि फसलों की पैदावार उतनी नहीं हो पा रही थी। जिसके लिए 1899 से 1900 के बीच बिरसा मुंडा के नेतृत्व में विद्रोह शुरू हुआ जो कि मुंडा ‌विद्रोह या उलगुलान के नाम से जाना जाता है। इस विद्रोह में बिरसा मुंडा को लोग बहुत ही सम्मान करते उन्होंने जनजातियों के हक और सुरक्षा के लिए अपना जीवन दांव में लगा दिया । 
अंग्रेज़ो और इनके साथियों के बीच हुए युद्ध में इनके कई साथी मारे गए।
बिरसा मुंडा गिरफ्तार कर लिए गए, 9 जनवरी 1900 को इनका निधन हो गया।जेल अधिकारियों ने इनकी मृत्यु का कारण हैजा बताया।
आज भी भारत के कई आदिवासी क्षेत्रों में इन्हें भगवान बिरसा मुंडा कह कर संबोधित किया जाता।
भारतीय इतिहास में इनका बलिदान हमेशा याद रखा जाएगा। 

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नज़्म..!

रात के आगोश में जग रहा दिल
कोई अपना सा लग रहा दिल,

सुकून लुट कर गया कोई मुसलसल
मुझे मुझसे कोई अलग कर रहा दिल,

आवारा बन कर फिरू हर लम्हा
अक्सर बन कर मुझे कोई ठग रहा दिल,

इश्क की चिंगारी जली है जब से
आहिस्ता-आहिस्ता सुलग रहा दिल।


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लघु कथा :-  रिश्ता..!
बाजा़र के चौराहे पर स्थित ए टी एम की सीढियों के नीचे एक बुढा व्यक्ति ठंड से कपकपा रहा था। भागमभाग भीड़ के बीच वह अपनी पुरानी चादर में खुद को समेटे बैठा वह मानो ठंड से लड़ने की जद्दोजहद कर रहा हो.....
तभी ए टी एम गार्ड अपनी दोनों हथेलियों को रगड़ते हुए उस बुढे व्यक्ति से पूछता है "का बाबा काहे ठंड में काँप रहे है घर जाईए"!
बुढे ने कहा -"मेरा बेटा मुझे रखना नहीं चाहता और पतोहू को मैं एक आँख से भी नहीं भाता"!
इतना कहते ही वह सुबकने लगा।
"चुप हो जाओ बाबा" गार्ड ने उसे संतावना देते हुए कहा और अपनी बात जारी रखते हुए पूछा -"और घर में कौन -कौन हैं?
बुढे ने कहा-"एक ही लड़का है हमारा मेरी पत्नी उसे जन्म देते ही गुजर गई ,बाबू !शहद चटा कर और गैया का दूध पिला कर किसी तरह मैंने उसको पाला और उचित समय आने पर उसका विवाह भी करवा दिया।
लेकिन अब उस घर में न तो अब मेरे लिए छत का एक कोना है ना ही रोटी का एक टुकडा"। 
गाल पर पसरे आँसू को उस बुढे ने हाथों से पोछते हुए कहने लगा "मेरे हिस्से की जो जमीन हैं उसमे से कुछ जमीन बेचने तक नहीं देता जिससे मैं अपना खर्चा चला सकूँ।"
गार्ड ने पुछा "कितनी जमीन है?
"पन्द्रह कट्ठा" बुढे ने कहा।
रात भी काफी हो चुकी थी ,कोहरे की धुंध ने चौराहे को अपने आगोश में ले लिया था ।वह वही सिर को पैर में दुबकाए बैठा रहा।
गार्ड भी ए टी एम के भीतर जाकर कुर्सी पर बैठ गया सुबह के वक्त उसकी आँख लग गई ,और जब उसकी नींद टूटी तो बाहर  बहुत ही भीड़ लगी थी। उसने बाहर निकल कर देखा उस बुढे का शरीर ठंडा पड़ चुका था। स्थानीय प्रशासन और नगरपालिका को बुलाया गया।
जब उस बुढे व्यक्ति के कुर्ते के जेब को टटोला गया तो उसमें उसके आधार कार्ड और एक पुरानी सी पाॅकेट डायरी निकली जिसमें से कुछ नम्बर को मिलाया गया, कुछ तो लगे ही नहीं। उसमें से एक नम्बर लगते ही दरोगा जी ने पुछा "राम लाल प्रसाद , पिता- मनुलाल प्रसाद उम्र-65 वर्ष ,आप इन्हें पहचानते है?"। मैं मदनपुर का दरोगा बोल रहा हूँ! 
उधर से आवाज आई-"जी है !वो तो हमारे मामा जी है ।जो तीन साल पहले कहीं लापता हो गए थे ,क्यों क्या हुआ दरोगा जी?
दरोगा ने कहा - "बीते रात अत्यधिक ठंड की वजह से शहर के चौराहे पे उनकी मौत हो गई है अगर इसकी कोई संतान हो तो खबर दे दिजिए"
उधर से फिर आवाज आई- "उनके लड़के समेत पुरा परिवार पिछले साल आई बाढ में बह गए ।और हम उतनी दूर नहीं जा सकेंगे ,आप उधर ही लाश को ठिकाने लगा दीजिए"यह कहते हुए उस व्यक्ति ने काॅल कट कर दिया।
दरोगा ने और कई नम्बर को लगा कर खबर देने की कोशिश की  लेकिन किसी रिश्तेदार ने उसके अंतिम संस्कार का जिम्मा नहीं लिया।
अन्तत: उस ए टी एम गार्ड ने ही उसका संस्कार अंतिम किया ।उस बुढे की चिता से उठते धुएँ ने कई प्रश्न उठा डाले थे उसके अवचेतन मन में।

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चलता हुआ ताजमहल..!
उनके रौशन से चेहरे पे,
खुद के प्रश्नों का हल देखा।
मैंने दरिया में खिलता हुआ,
एक कमल देखा।
यूं तो नदी देखी मैंने रास्ते में,लेकिन
उनके गाँव के किनारे ही पवित्र गंगाजल देखा।
आसमानी,सफ़ेद पोशाक में उनका आहिस्ते से आना,
मैंने उस रोज एक चलता हुआ ताजमहल देखा।
हिरनी सी आँखों में कुछ सपनें देखें,
और उन्हीं आँखों में मैंने अपना कल देखा।
नजरें उनकी कविताएँ कह रही थी,
उनकी बातों में मैंने इक गज़ल़ देखा।

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मज़दूर दिवस पर विशेष..!

ईंट पर ईंट जोड़ता मज़दूर
पत्थरों को तोड़ता मज़दूर
है खुद पर यकीं तभी तो
नदियों की धारा मोड़ता मज़दूर

तेज धूप, कड़ाके की ठंडी, बरसात में
एक पैर पर दौड़ता मज़दूर
लेकर हौसलों का फावड़ा हाथों में
मिट्टी में दफ़न अपनी किस्मत कोड़ता  
मज़दूर..!

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कर्म का फल....!
किसी गाँव में  हरिया नाम का एक किसान अपने छोटे से परिवार के साथ रहता था। अपने कच्चे मकान के पास छोटे से पोखर में मछलियाँ पालता और उसे बेच कर अपना जीवन निर्वाह किया करता था । उसके इस काम को देख गाँव के कुछ लोगों में जलन की भावना व्याप्त हो गई थी।
                         "बुधीया अरी ओ बुधीया"  हरिया अपनी आठ साल की बेटी को आवाज दे कर बुला रहा था बुधवार के दिन उसकी बेटी के जन्म होने के कारण उसने उसका नाम  बुधीया रखा था। "आई पिता जी" बुधीया ने कहा ।
"मैं हाट जा रहा हूँ कुछ मछलियाँ ले कर, अपनी अम्मा से कहना पोखर का ध्यान रखें और तुम मन लगा कर पढ़ना"।
यह कहते हुए हरिया हाट की ओर निकल जाता है।
संध्या का समय हो चुका था, हरिया की पत्नी कमली कभी घर का काम देखती फिर पोखर के ओर भी ध्यान देती । पिछले साल बहुत सी मछलियाँ  पोखर से चोरी हो चुकी थी।
"रात के नौ बज गए बुधीया के पापा अभी तक नहीं आए ,हो सकता है सौदा अबतक बिका ही न हो"बुदबूदाते हुए कमली ने कहा। दिन भर घर का काम करते-करते वह इतना थक गई है थी कि उसकी आँख लग गई।
हरिया हाट से आते ही पोखर की ओर जाता है अचानक जोर से चिल्लाते हुए सिर पे हाथ रख कर रोने लगता है.......
उसकी आवाज सून कर उसकी पत्नी दौड़ती हुई आती है।
                     " किसी ने पोखर में जहर डाल दिए बुधीया की माँ "ये कहता हुआ वो अपनी पत्नी के आगे फफक कर रोने लगता है। पोखर के बगल में लगे सौलर लाईट में मरी हुई मछलियाँ पानी के सतह पर साफ दिखाई दे रही थीं । उसकी पत्नी उसे ढाँढस बाँधते हुए चुप कराती है।
रात में ही हरिया जाल फेंक कर मरी मछलियाँ को बाहर कर, वहीं पोखर के पास जाल सहित रख देता है। आज पोखर के पास ना सोकर घर के अंदर ही सोने चला जाता है।
पोखर के पास किसी को ना पाकर दो चोर उन मरी हुई मछलियों की चोरी कर लेतें हैं।और सुबह उसे मंडी ले जाकर बेचने लगते है। मुश्किल से उन्होंने एक ग्राहक को मछली बेची थी ।उसके बाद मंडी मालिक को भनक लग गई ये जहरीली हैं उसने सारी मछलियों को जब्त कर लिया और उन दोनों चोरों से पुछताछ करने लगा।
उस दिन रात में एंम्बूलेंस की आवज सुनकर हरिया और उसकी पत्नी दोनों चौक पडे़ । तीन एम्बूलेंस उनके पडो़सी मदन लाल के यहाँ रूकी ,और घर के सभी सदस्य बारी- बारी कर के अस्पताल ले जाने लगी। तब तक गाँव के लोग जग गए थे हरिया उनके साथ मदन लाल के घर पहुचाँ तो पता चला कि मदन लाल का साला जब इनसे मिलने आ रहा था तो रास्ते आते समय साथ मछली लेते आया, जिसके खाने से पूरा परिवार बीमार हो गया । मदनलाल की स्थिति तो कुछ ज्यादा ही खराब हो चली थी।  
कुछ देर बाद गाँव वाले अपने-अपने घर को लौटने लगे, हरिया भी वापस आने लगा अचानक उसके पाँव के नीचे एक बोतल का ढक्कन दब जाता है खाली पाँव होने के कारण उसे  तलुए में दवाब ज्यादा महसूस होती है,वह उसे हाथ में उठाए घर की ओर चल देता है। आने पर उस दिन उसने उस जहर के खाली बोतल जो पोखर के पास मिली थी उसे उसने वहीं बगल में फेंक रखा था। उसे तो शक था ही लेकिन अब वो शक यकीन में बदल चुका था, वह समझ चुका था जिन मछलियों को खाकर पूरा परिवार बीमार पड़ गया था, चोरों ने जिसे बेचा था वह और कोई नहीं मदनलाल का साला ही था। आईने की तरह साफ सब कुछ उसके सामने था ,अपराधी को उसके कर्म का फल मिल चुका था।

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महामानव  "डॉ.  भीमराव अम्बेडकर"...!!

बाबा साहब डॉ.  भीमराव अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 ई.  में मध्यप्रदेश के छोटे से गाँव मऊ में हुआ | इनकी माता का नाम भीमाबाई मुरबादकर और  पिता का नाम राम जी मालो जी सकपाल था जो कि ब्रिटिश सरकार में सूबेदार के पद पर थें | 
  बाबा साहब बचपन से ही प्रतिभाशाली थें | पढ़ाई में बेहद रूचि के साथ वे कुशल दूरदर्शी भी थें | प्रतिभावान होने के बावजूद भी इन्हें बचपन से छूआ -छूत, जातीय भेदभाव का सामना करना पड़ा | विद्यालय का चपरासी इन्हें और इनके दोस्तों को पीने का पानी ऊपर से डालकर पिलाया करता था | चपरासी की अनुपस्थिति विद्यालय में जिस दिन रहती इन्हें और इनके दोस्तों को सारा दिन प्यासा ही रहना पड़ता था | 
   बाबा साहब के जीवन में घटना का जिक्र आता है , जब एक बार विद्यालय से लौटते समय मूसलाधार बारिश होने लगी तो बारिश से बचने के लिए वो एक घर की दिवाल पर सटकर किसी तरह खुद को बचा रहे थें और संयोग से वह घर किसी ब्रह्मण परिवार का था | उन्हें दिवाल से सटा हुआ देख पीट कर भगा दिया जाता है और उसके पश्चात दिवाल को अच्छी तरह धोया जाता है |
   इसका मूल कारण था - समाज में फैली जातिगत छूआ-छूत की दूरभावना और जातीय वर्गीकरण |
 बाबा साहब ने महार जाति में जन्म लिया था और जातियों के अलावा इस जाति के लोगों के द्वारा छुआ हुआ पदार्थ द्रव या यूँ कहें कि पदार्थ की तीनों अवस्थाएँ दूषित मानी जाती थी |
  अछूत समझी जाने वाली जातिगत दूरभावना की वजह से बाबा साहब को अपने विद्यार्थी जीवन में कई बार अपमानजनक स्थितियों का सामना करना पड़ा |
विषम परिस्थितियों को झेलते हुए अपने धैर्य और लगन के बल पर अपनी स्कूली शिक्षा प्राप्त की | इनके पिता की आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी नहीं थी, ताकि वे उन्हें और आगे पढ़ा सकें |
  गायकवाड स्कॉलरशिप के सहारे इन्होंने 1915 ई.  में अमेरिका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एम. ए. किया | इस दौरान वे अमेरिका के एक अर्थशास्त्री सेलिगमैन के मार्गदर्शन में इसी विश्वविद्यालय से इन्होंने 1917 ई.  में पी. एच. डी.  की उपाधि प्राप्त कर ली | 
   इसके बाद इन्होनें लंदन जाकर और शिक्षा प्राप्त करने का फैसला किया | किंतु उसे अधूरा छोड़ कर भारत वापस आ गयें और मुंबई के सिडेनहैम कॉलेज में राजनीति अर्थशास्त्र के पद पर कार्य किया |
 कुछ दिनों बाद बाबा साहब ने लंदन जाकर अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी की | कई डिग्रियाँ प्राप्त करने के बाद वे उस युग के सबसे ज्यादा पढ़े राजनेता और विचारक थें | 
   डॉ. भीमराव अम्बेडकर के पास कुल 32 डिग्रियाँ थीं |
 1946 में संविधान सभा का गठन किया गया | जिसमें डॉ. भीमराव अम्बेडकर इस प्रारूप समिति के अध्यक्ष थें |
बाबा साहब जीवन के अंतिम साँस तक छुआ -छूत भेदभाव के खिलाफ लड़ते रहें | हिंदू धर्म में व्याप्त अस्पृश्यता और कुप्रथा के कारण इन्होंने अपने लाखों अनुयायियों के साथ 14 अक्टूबर 1956 को हिंदू धर्म त्यागकर बौद्धधर्म अपनाया था |मरणोपरांत इन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार "भारत रत्न " से 1990 में सम्मानित किया गया |


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"महात्मा ज्योतिबा फूले" की जयंती पर विशेष..!
ब्रिटिश भारत में एक ऐसे समाज सुधारक का जन्म हुआ, जिन्होंने भारत की दिशा और दशा बदल कर रख दी | उनका नाम ज्योतिराव गोविंदराव  फूले था , जिन्हें ज्योतिबा फूले के नाम से जाना जाता है | इनका जन्म 11 अप्रैल 1827 ई.  में ब्रिटिश भारत के खानवाडी पूणे में हुआ था | इनकी माता का नाम चिमना बाई और पिता का नाम गोविंदराव था  |
जब ज्योतिबा फूले 1 वर्ष के थें तभी उनकी माता का निधन हो गया | सगुणा बाई नामक दाई ने ही बचपन में इनका लालन पालन किया  |
उस समय हिंदू समाज में जातिगत भेदभाव काफी ज्यादा था जिसका असर ज्योतिबा फूले पर भी पड़ा |
क्योंकि ये माली समाज से आते थें और यह समाज उस समय काफी पिछड़ा था |
7 वर्ष की अवस्था में जब इन्हें प्रारंभिक शिक्षा के लिए स्कूल भेजा गया तो इन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ा | पढ़ाई में इनकी बहुत ही रूचि थी | जिस कारण वह दिन भर खेतों में काम करते और रात्रि में पढ़ाई किया करतें |
इनके पड़ोसी उर्दू -फारसी के शिक्षक गफ्फार बेग और ईसाई पादरी लेजिट ने 1841 में इनका दाखिला फिर से एक अंग्रेजी स्कूल में करवा दिया |
जहाँ इन्होंने अपने मेधा का परिचय देते हुए सर्वाधिक अंक प्राप्त कर सबको आश्चर्यचकित कर दिया |
चूँकि ज्योतिबा फूले ने बचपन से सामाजिक भेदभाव झेला था तो उनकी यह प्रबल इच्छा थी कि किस तरह इस भेदभाव को खत्म किया जाए |
उस समय तथाकथित उच्च वर्ग ने दलित,  पिछड़ा  समुदाय और धर्म के बीच एक ऐसी खाई बना डाली थी जिसे पाटना मानवता और समाज के लिए बेहद ही जरूरी था |
गौतम बुद्ध, कबीर, रामानुज, दादू,  संत तुकाराम के विचार ने ज्योतिबा फूले को बहुत ही प्रेरित किया |
उन्होंने अंग्रेजी भाषा में अनुवादित वेद -पुराणों आदि का अध्ययन किया |
अंतत: उन्होंने यह महसूस किया कि समाज में फैली विसंगतियों को शिक्षा से ही दूर किया जा सकता है |
ज्योतिबा ने अपने अथक प्रयासों से सन् 1851 में पहला बालिका विद्यालय खोला | लेकिन समस्याओं ने वहाँ भी उनका पीछा नहीं छोड़ा | जो शिक्षक वहाँ पढ़ाने जाते थें, वे उच्च वर्ग और सामाजिक दबाव के कारण जल्द ही विद्यालय छोड़ देते थें |
इसके समाधान के लिए ज्योतिबा फूले ने अपनी पत्नी सावित्री बाई फूले को ही और शिक्षित किया एवं एक मिशनरीज विद्यालय में पढ़ाने का प्रशिक्षण दिलाया |
इस प्रकार सावित्री बाई फूले भारत की पहली प्रशिक्षित महिला शिक्षिका  के रूप में उभर कर सामने आईं |
शिक्षा का दिया जलाते हुए उन्होंने लोगों को शिक्षित करना जारी रखा | दलित वर्ग के लिए समाज में बहुत ही कठोर नियम बने थें | इस वर्ग के लोगों को अपने कमर के पिछले भाग में झाड़ू बाँधकर चलना पड़ता था और गले में एक हाँडी लटकानी पड़ती थी ताकि झाड़ू से इनके कदमों के निशान मिट जाए और मुँह से निकलने वाले थूँक को वह इधर -उधर न फेंक कर उसी हाँडी में फेंके |
24 सितंबर 1873 ई. को ज्योतिबा फूले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की , ताकि समाज में व्याप्त भेदभाव, विधवाओं पर हो रहे अत्याचार व स्त्रियों की स्थिति एवं कई अन्य सुधार किया जा सके |
उसी समय उनकी एक किताब "गुलामगिरी" प्रकाशित हुई , जिसने भेदभाव और आडंबरों पर करारा प्रहार किया |
उसी दौर के एक और समाज सुधारक राव बहादुर विट्ठल राव कृष्णजी वंदेकर 1888 ई. में ज्योतिबा फूले को महात्मा की उपाधि से सम्मानित किया |
27 नवंबर 1890 ई.  को लकवा की वजह से महात्मा ज्योतिबा फूले का निधन हो गया | जीवन का चिराग बुझ चुका था किंतु इनके विचार की रौशनी आज भी अंधियारे को दूर कर रही है |

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एकता की पहचान..!

राम और रहीम साथ चले,
         बन कर एकता की पहचान

एक तरफ चौपाई बजे,
             दूजे ओर अजा़न।

भारत की अखंडता है इस पे निर्भर,
               मिले सभी धर्मो को सम्मान।

 फिर चाहे वो गीता हो,
                या फिर हो कुरान।

बात समझ कर बने न फिर कोई अंजान,
             धर्मनिरपेक्ष भारत पर हम सबको है अभिमान..!

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ग़जल..!

दिया आँधियों में जलाने की ज़िद है
ज़माने को सच बताने की ज़िद है

उन्हें जन की बोटियाँ चबाने की ज़िद है
मुझे सबको रोटी दिलाने की ज़िद है

मुझे मौत से तुम डराने चले हो
मुझे मौत को डराने की ज़िद है

नदी तैर कर पार कब तक करोगे
नदी पर मुझे पुल बनाने की ज़िद है

दुआएँ जो फुटपाथ से निकली आ रही है
उन्हें अब खुदा को सुनाने की ज़िद है

सुने-न-सुने कोई बहरे समय में
"हयात" एक ग़जल गुनगुनाने की ज़िद है

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लघुकथा :- छडी़..!

रमेश ऑफिस के लिए तैयार होकर निकल रहा था, तभी उसकी पत्नी रेनू उसे टिफिन थमाते हुए कहती है "अजी लौटते समय अम्मा जी के लिए बाजा़र से एक छडी़ लेते आईएगा,घुटने के दर्द से उनको चलने में तकलीफ़ होती है"। रमेश जल्दी में था बिना कुछ कहे वह चल देता है।

केसू रमेश के दस का साल का बेटा दौड़ता हुआ आता है, और अपनी दादी से लिपट कर उन्हें बगीचे में जाने की जिद्द करता है।  "नहीं बेटा मैं तो न चल सकूंगी मुआ ये घुटने का दर्द मुझे चलने न देगा" हेमन्ती देवी अपने पोते को समझाते हुए कहतीं है। साठ वर्ष की बसंत पार कर चुकी हेमन्ती देवी अपने पति के गुजरने के बाद अपने इकलौते बेटे रमेश के साये में जीवन गुजार रहीं थी।

दवा भी बेअसर साबित हो रही थी दर्द कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था। शाम को रमेश घर जैसे आता है तो उसकी माँ ने कहा "बहू ने तुझे कुछ लाने को कहा था लाया है , क्या?"
नहीं!.....रमेश झल्लाते हुए कहता है। काम से फुर्सत नहीं मिलती मुझको जो मैं ला सकूँ।
उसकी माँ बिस्तर पे लेटी दिवाल की ओर मुँह कर के सो जाती है।

केसू अपनी माँ से पूछता है "पिता जी क्या लाना भूल गए माँ?"
"दादी की छडी़ बेटा" रेनू ने उसे समझाते हुए कहा....
इसी तरह कई दिन बीत जाते हैं, रमेश हर रोज कोई न कोई बहाना बनाता रहता है कल ला दूँगा लेकिन उसका कल नहीं आता है।

एक रोज शाम को जब रमेश ऑफिस से घर आता है तो चिल्लाते हुए कहता है "मेरी जेब से किसने रूपए निकाले?"
सभी लोग खामोश़ हो जाते है। फिर यकायक उसकी नजर अपनी माँ के बिस्तर के पास रखी हुई छडी़ पे जाती है।मुझसे बिना पूछे पर्स से पैसे निकाल कर अपने मन का काम किया जा रहा है।" वह अपनी पत्नी और माँ दोनों को खरी-खोटी सुना कर कमरे में चला जाता है।

सुबह जब रमेश जब टूथब्रश करता हुआ बरामदे की ओर जाता है तो देखता है गुल्लक के बहुत से टुकडे़ बिखरे पडे़ हैं।
जिसमें केसू सिक्के जमा करता था।
तब तक रेनू वहाँ आती है, और उसे बताती कि कैसे केसू ने अपने गुल्लक को तोड़ कर अपनी दादी के लिए छडी़ लाया।
बाजार जाने के लिए उसने पडो़स वाले एक बडे़ लड़के को बुलाया और अपनी माँ की सहमति पा कर उसने छडी़ लाई।

आचानक रमेश को याद आया कि पैसे किसी ने निकाले नहीं थे बल्कि परसो रात दोस्तों के साथ हुई पार्टी में खर्च हो गए थे।
उसके आँखों में शर्म के पानी थे।उसने अपनी माँ और पत्नी से माफी़ माँगी ।उसे एहसास हुआ की वह कितना..... गैरजिम्मेदार है,लेकिन उसे इस बात की खुशी थी कि केसू ने कितनी मासूमियत से उसकी जिम्मेदारी निभाई।

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उस शहर से चला तो

उस शहर से चला तो
कुछ सामान छोड़ आया
मेरी सांसों का हिसाब
जहाँ, रखा जाता था
मैं भाड़े का
वो मकान छोड़ आया
खुद को लेकर आने की
जल्दी में
लोगों में अपनी 
पहचान छोड़ आया
गम का ये बोझ लेकर
मैं अपनी
मुस्कान छोड़ आया
जब उनकी याद आयी
महसूस ये हुआ
मिट्टी का देह लाया
पर जान छोड़ आया। 

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कहानी :- वो अख़बार वाला लड़का..!

सुबह छः बजे का समय कमलेश्वर बाबू के दरवाजे पर एक दस्तक 
    "साहेब वो साहेब मैं छोटू अख़बार ले लीजिए " कल दोपहर से लगातार हो रही मुसलाधार बारिश की वजह से साठ वर्षीय कमलेश्वर बाबू ने घर से कुछ दूरी पर स्थित अपनी किताब की दुकान बंद रखी थी । छोटू अख़बार को किसी तरह प्लास्टिक से ढके हुए था पर खुद पूरा गीला हो चुका था। कमलेश बाबू छतरी लिए आते हैं और छोटू से कहते है "तुम इस बारिश में बगैर छतरी, बरसाती के क्यों काम करते हो?
लड़के ने कहा- घर के खर्च से उतने पैसे नहीं बचते कि मैं ले सकूँ साहेब"  "अंदर आओ " कमलेश बाबू ने कहा, दोनों घर के अंदर आते है।
कमलेश्वर बाबू ने लड़के को तौलिया बढ़ाते हुए कहा- "बेटा सिर को अच्छी तरह पोछ लो और कपडे़ बदल लो,मेरा पोता
बिल्कुल तुम्हारे जैसा ही है,  ये तुम पे आ जाएगा "।
घर के सभी सदस्य गहरी नींद में थे,वो अपने पोते गोलू का कपडा़ उसे ला कर देते हैं।
छोटू संकोच भरी निगाहों से कमलेश्वर बाबू की ओर देखता है।
उनके बार-बार समझाने पर छोटू सिर पोछ कर कपडे़ बदलता है।  लड़का अख़बार कमलेश्वर बाबू को थमाते हुए वहाँ से जाने लगता है , बारिश अब थम चुकी थी ।
"ठहरो ये छतरी अपने साथ लेते जाओ और जब तुम्हारा काम पूरा हो जाए ,तो मेरे दुकान पर आना "कमलेश बाबू उसके सिर पे हाथ फेरते हुए कहते है। 
वह लड़का अगले दिन दुकान पर पहुँचता है ।
और बताओ कौन -कौन है तुम्हारे घर पर ?लड़के ने कहा-"मैं, मेरी माँ और दो बहनें" और पिता जी ? लड़का सिर झुकाते हुए कहता है वो तो इस दुनियाँ में नहीं हैं ,उसकी आँखें आँसू से डबडबा जाती है । पढ़ते हो ?कमलेश्वर बाबू ने उससे पूछा "नहीं साहेब पिता जी के गुजरने के बाद घर के खर्च मुझे उठाने पड़ते है, अख़बार बेचने के बाद में एक होटल में काम करता हूँ मुझे वक्त नहीं मिल पाता किंतु मुझे अक्षर का ज्ञान है मैं सरकारी विद्यालय से पाँचवी तक पढ़ा हूँ। और पढ़ना चाहते हो? कमलेश्वर बाबू ने उसकी ओर एक टक देखते हुए पूछा । जी हाँ! मुझे पढ़ना अच्छा लगता है मैं बचे हुए अख़बारों में से एक प्रति प्रेस को  लौटाने से पहले पढ़ लेता हूँ। 
कमलेश्वर बाबू उसकी बातों को सुन कर गहरी सोच में डूब जाते है। और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहते है- कल से तुम होटल में काम नहीं करोगें और विद्यालय जाओगे छुट्टी के बाद तुम मेरे दुकान में मेरा हाथ बटा देना जो पैसे तुम्हें होटल में मिलते है मैं दे दूँगा। कमलेश्वर बाबू की दयालुता देख कर उस लड़के की बाछे खिल उठती है उसे लगता है कि जीवन के अंधियारे पथ पे एक नई रौशनी मिल गई हो।
समय तेज रफ़्तार से बढ़ता है ,जब उसने बारहवीं पास किया तो कमलेश्वर बाबू के खुशी का ठिकाना न था......
एक दिन कि बात है किताबों को सहजते हुए कुछ बड़बडाते हुए कहते एक सप्ताह बीत गए छोटू दुकान क्यों नही आ रहा कहीं उसकी तबियत खराब तो नहीं हो गई पहले होती तो तीन चार दिन बाद आ जाया करता था। लड़के के पास फोन भी नहीं थे की वो उनसे बातें कर के पुछ सकें ।घर भी उसका बहुत दूर था.........
लड़का  कमलेश्वर बाबू को बिना बताए कहीं  जाता भी नहीं था। एक दिन जब उसके घर पहुँचे तो वहाँ ताला लगा था।
आस पडो़स को भी खबर नहीं थी की वह कहाँ गया है? 
दिन महीनें साल बीत गए उसका कुछ पता नहीं चला । कमलेश्वर बाबू को उसकी याद आती लेकिन वो कर भी क्या सकते थे? 
उसको गए लगभग पन्द्रह साल बीत गए लेकिन उसका कोई अता पता न था। अब उनकी उम्र भी ज्याद हो चुकी थी लेकिन उस लड़के की याद उन्हें अब भी आती थी कभी वो भावुक भी हो जाते।  
एक दिन कमलेश्वर बाबू किताब  को सेल्फ पे सजा रहें थे  अचानक उनके दुकान के सामने एक कर आकर लगी सायरन की आवाज़ सुनकर आस- पास के लोग इकट्ठा हो गए। कार से एक लम्बा - तगडा़ व्यक्ति बाहर आता है और उसके साथ कुछ लोग बंदूक लिए अन्य गाडि़यों से निकले ।वह लम्बा - तगडा़ व्यक्ति कमलेश्वर बाबू की ओर बढ़ते हुए उनके पैरों को स्पर्श करते हुए कहता है -"हमको पहचाने साहेब" हम छोटू , साहेब !कमलेश्वर बाबू के आँखों में पानी भर जाता और उसे वह सीने से लगा लेते है। उनसे मिल कर छोटू अपनी आप बीती बताता है किस परिस्थिति में उसे अपने गाँव रातों रात निकलना पडा़, उस दौरान उसने कितनी परेशानियाँ झेलनी पडी़ ,लेकिन उसने पढ़ाई नहीं छोडी़, कमलेश्वर बाबू जब तक कुछ सवाल उससे पूछते 
वहाँ इकट्ठा लोग आपस में बात करते हुए कहते है ये सूरज कुमार हैं इस शहर के नए जिला पदाधिकारी।
यह सुनते ही उनकी खुशी दोगुनी हो गई।
यह शिक्षा का ही महत्व था कि एक अख़बार बेचने वाला  लड़का इतने बडे़ पद को संभाल रहा था।

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लघु कथा :- अँधेरा चीरती चीख..!

बारात जैसे ही स्टेशन से शादी के जनवासे की तरफ बढ़ी , तभी अचानक डी जे की धुन पे थिरकते बारातियों के बीच एक लड़की नाचती हुई आ पहुँची ,उसकी उम्र तकरीबन बारह से पन्द्रह वर्ष के बीच की होगी कद -काठी लंम्बी पतली दुबली सी उस लड़की ने सफेद रंग की कमीज़ और नीले रंग की जीन्स पहन रखे थे ।
                     उसे देख कर सभी लोग भौच्चके रह गए,उनमें से एक व्यक्ति जाकर डी जे बंद करवाता है और लोग आपस में बाते करने लगते है कौन है ये लड़की? बाराती तो दूसरे शहर के थे ,लेकिन कुछ लड़की पक्ष के लोग जो बारात को लाने स्टेशन गए थे , उनमें किसी एक ने उसे पहचानते हुए कहा-"अरे ये तो गुलगुलिया (खानाबदोश) है जो यही स्टेशन की समीप तम्बू टागें जो लोग तीन महीनें से यहाँ रह रहें है,ये वही है और ये थोडी़ दिमाग से कम है"।.....यह बोलते हुए उसने डी जे वाले को गाना बजाने का इशारा दिया , कुछ लोग उस लड़की को लौटने को कहते............ लेकिन वह कुछ दूर अपने तम्बू की ओर जाती थोडी़ देर बाद फिर वापस आ जाती। लगभग एक घंटे के उपरान्त बारात जनवासे तक पहुँची ।सभी ने नाश्ता किया,उस लड़की ने नाश्ते के लिए जब हाथ बढाया तो इक सराती उसे जोर से डांटते हुए भगा देता है,वो रूधासें गले से माँगती रहती और उसकी आँखें में आँसू तैरने लगते हैं। वह बोलना चाहती है लेकिन उसके गले में मानो शब्द फँस जाते हो ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह लड़की गूंगी थी । वहीं पास ही दूल्हा-दुल्हन के लिए वरमाला की व्यवस्था थी ।शादी का कार्यक्रम शुरू हुआ, कुछ बाराती खाना खाने के बाद आराम करने चले गए, लड़की अब भी वहीं थी। उसने चुपके से प्लेट उठाया और ढेर सारा खाना खुद ही ले लिया और पंडाल के पीछे जाकर खाने लगी, वह इस तरह खा रही थी मानो उसे बहुत दिनों के बाद भोजन मिला हो।
रात के तकरीबन 12.30 बज रहे थे,शादी में हो रहा शोर कुछ कम हो गया था । विवाह स्थल से कुछ दूरी पर एक रेलवे पूल था। उस पूल की ओर आचानक वो विक्षुप्त लड़की दौड़ने लगी और घने अंधेरे में कहीं गुम हो गई, लड़की को अंधेरे की ओर जाता देख कुछ लोग उसके पीछे भागने लगे.........
लगभग आधा घंटा बीता गया ना लड़की वापस आई ना आए वो लोग, कुछ देर बाद उस घनघोर अँधेरे को चीरती हुई आई एक चीख़! जिसमें बेतहाशा दर्द था चिल्लाने और रोने की आवाज़ बार-बार आ रही चीख़ ने मानो दिल दहला दिया हो।
          रेलवे पूल की दूसरी ओर रेलगेट का गेटमेन टॉर्च जलाते हुए आ रही उस चीख़ की ओर दौडा़, विवाह स्थल से भी कुछ लोग उस ओर बढ़े लेकिन अब चीख शांत हो चुकी थी कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। सब ने बहुत ढूंढा वहाँ कोई नहीं मिला सिवाय रात की खा़मोशी के।
सुबह प्रशासन को खबर की गई, उन्होनें छान-बीन शुरू किया। लड़की अर्धनग्न अवस्था में पत्थरों के नीचे दबी मिली, बालात्कार के बाद उसकी निर्मम हत्या कर दी गई थी।
प्रशासन ने अपना काम किया अज्ञात लोगों पर एफ आई आर दर्ज हुई ,लाश को ठिकाने लगाया गया।लेकिन
उसकी चीख़ के दबने के साथ दब गए कई गुनाहगार चेहरे
रह गए कुछ अधूरे से सवाल समाज के सामने।

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टूटता कोमल मन..!

अपनी किस्मत में नहीँ किताबों के गुलदस्ते, 
जिम्मेदारियाँ कंधों पर फिर भी होंठ हैँ, हँसते..!
कूड़ा को उठाते बचपन बीतता,
गालियां मिलती चारों ओर से
बदनामियों से कोमल मन टूटता..!
उन्मुक्तता में रह सके न हम
उठे जो जज्बात उसे न कह सके हम..!
कचड़ा चुनते-चुनते जिंदगी बत्तर होती गई,
पेट भर भोजन भी नहीं अपनी परछाई रोती रही..!
इस कोमल मन में उठता दर्द,
कुचल देता है हमारी भावनाएं हमारे सपने  । 

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कश्मीर जल रहा है•••••
  
कहीं लाशें तो
कहीं तकदीर जल रहा है
ये कैसी आग है
जिसमे कश्मीर जल रहा है
शिकन- आलूद हो रहा
सोच का स्तर
कहीं रस्सी तो कहीं
जंजीर जल रहा है
ये तपीश नहीँ सिर्फ
माथे का
सच है कि पूरा 
शरीर जल रहा है। 

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नन्ही  गौरैया..!
हम इंसान अपने स्वार्थ को पूरा करने  की होड़ में प्रकृति का निरन्तर नुकसान करते आ रहे है जिससे आज हमें “गौरैया दिवस” मानाने की आवश्यकता पड़ी है |  अगर हम अपने  स्वार्थ  को थोड़ा कम  करके  प्रकृति का थोड़ा कम दोहन करेंगे  तो इससे बचा जा सकता है |
गौरैया जिसका वैज्ञानिक  नाम Passer Domesticus  है | जिसके संरक्षण के लिए Nature Forever  Society संस्था ने 20 मार्च 2010  में विश्व गौरैया दिवस मनाने  का निर्णय किया | जिसमें  इस संस्था  के संस्थापक मोहम्मद दिलावर का पूर्ण योगदान रहा | 
       ब्रिटेन की  संस्था ‘रॉयल सोसाइटी ऑफ बर्ड्स’ ने कई देशों में अनुसन्धान किया  और उन्होंने पाया कि भारत समेत कई बड़े  देशों में इस पक्षी की संख्या दिन-प्रतिदिन घटती  जा रही है | अपने अनुसन्धान के आधार पर इस संस्था ने भारत और अन्य कई  देशो में गौरैया को रेड लिस्ट में कर  दिया है, जिसका यह अर्थ है कि  यह पक्षी पूर्ण रूप से  होने विलुप्ति की कगार पर है |
          फसलों में प्रयोग होने वाले कीटनाशक, मोबाइल टावर से निकलने वाले रेडिएशन और ऊँची -ऊँची  इमारतों से  निकलने वाली तेज़ रोशनी के कारण  आज हमें अपने आँगन, छत और भेंडिलेटर पर गौरैया दिखाई नहीं देती | हम अपनी सुविधा के लिए भरी भरकम  मशीनें  बना रहे है और मात्र  40 ग्राम के आस-पास के वजन की चिड़िया की सुरक्षा नहीं कर पा  रहे है जो पूरे मानव जाति  के लिए शर्म की बात है | 
     अगर हम समय रहते इसके संरक्षण के लिए  कोई ठोस कदम नहीं उठाते हैं तो हम आने वाली पीढ़ियों को सिर्फ कहानी, कविता और  तस्वीरों से ही इसका परिचय करवा पाएंगे |

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"तलवार" सी थी..!

कविता तलवार सी
अब जैसे भोथर भुलाजी सी हुई 
सियासत के चक्कर में 
अब ये दलाली सी हुई 
कुछ समय पहले बोलती थी 
अब मानों
ये जुगाली सी हुई 
किसने बेचे? इसके प्राण !
अब ये कंगाली सी हुई 
खा कर फेंकने लगे लोग 
ईमानदारी, विश्वास,  क्रांति 
सृजन, वेदना 
ये जैसी कोई 
थरमाकोल की थाली सी हुई |

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"तलवार" सी थी..!

कविता तलवार सी
अब जैसे भोथर भुलाजी सी हुई 
सियासत के चक्कर में 
अब ये दलाली सी हुई 
कुछ समय पहले बोलती थी 
अब मानों
ये जुगाली सी हुई 
किसने बेचे? इसके प्राण !
अब ये कंगाली सी हुई 
खा कर फेंकने लगे लोग 
ईमानदारी, विश्वास,  क्रांति 
सृजन, वेदना 
ये जैसी कोई 
थरमाकोल की थाली सी हुई |

तुम बिन बेरंग होली..!

तेरे बिना जिंदगी में उमंग नहीं ,
होली तो है पर इस होली में कोई रंग नहीं ,
कि तन्हा - तन्हा सा फिरू मैं लेकर कोरा सा चेहरा ,
भीड़ से घिरे है हम लेकिन तेरा संग नहीं ....
कि अपने हाथों से लगा दे मेरे चेहरे पे थोड़ा -सा गुलाल ,
खुद के चेहरे पे लगाने का मुझको ढंग नहीं ,
आँखें बंद कर के तुम तक पहुँच जाऊँगा मैं ,
ना चाहिए कोई रास्ता ना ही कोई सुरंग नहीं ,
क्या कहूँ .....
तेरा रंग चढ़ा है जब से मुझ पर ,
कि भाता मुझको अब कोई भी रंग नहीं |

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आलेख :- रब नवाज़ आलम نامنگار :- ربنواز عالم

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