कविता:- जन-जन की भाषा हिंदी भाषा....!
हिंदी भाषा अपनी प्यारी भाषा,
जीवन की परिभाषा..हिंदी भाषा,
हिंदी भाषा की और क्या करूँ प्रशंसा।।1।।
संस्कृति से जुड़कर रहना सिखाती..हिंदी भाषा,
भेदभाव को दूर भगाती..हिंदी भाषा।
सबको साथ लेकर चलती..हिंदी भाषा,
हिंदी भाषा की और क्या करूँ प्रशंसा।।2।।
हिंदी को अपनाना है राष्ट्रभक्ति को जगाना है,
हिंदी का प्रयोग करना है..हिंदी का अलख जगाना है।
हिंदी है हृदय की भाषा हिंदी से है सबकी आशा,
हिंदी भाषा की और क्या करूँ प्रशंसा।।3।।
हिंदी भाषा मधुर-मधुर तुकबंदी की भाषा,
काव्य,कला ज्ञान की है भाषा..हिंदी भाषा।
हिंदी भाषा भाव भरा उल्लास की भाषा,
हिंदी भाषा की और क्या करूँ प्रशंसा।।4।।
हिंदी का अस्तित्व बचाना है..हिंदी का मान बढ़ाना है,
भाषा है बहुत सारी..पर हिंदी जैसी नहीं है प्यारी।
हिंदी से जुड़ी है सबकी भावना....
हिंदी को बनाना है राष्टभाषा अपना।।5।।
संसार आज हिंदी के पथ पर है चल पड़ा,
विदेशों में भी शामिल हो रहा हिंदी पाठशाला।
आओ हिंदी का उत्थान करें..करके पावन कर्म,
हिंदी ही राष्ट्रभाषा बने करें कोई ऐसा कर्म।।6।।
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कविता :- मन की बात....!
क्या पता समय रहते बोल ही न पाओ।
मन में कुछ भरकर रखोगे..
तो मन भरकर नहीं जी पाओगे।
मन में रखकर क्या पाओगे..
मन ही मन पछताओगे।
मन की बेचैनी को मन ही मन रखोगे..
तो मन की शांति कैसे ढूंढ पाओगे।
मन को मना लो..
मन भर कर जी पाओगे।
मन में जितने सवाल रखोगे..
उतनी ही बेचैनी को पाओगे।
जब मन के सवालों को किसी से बोलोगे..
तभी जवाबों से मन को तृप्त कर पाओगे।
मन से मन तभी जोड़ पाओगे..
जब मन की विकार को दूर कर पाओगे।
मन की शांति कभी नहीं खरीद पाओगे..
जब तक मन को मन से नही जोड़ पाओगे।
मन की बात मन में रखकर फासले को पाओगे..
मन की बात कहकर फैसले को पाओगे।
दुख से छुटकारा तभी पाओगे..
जब मन को शांत कर पाओगे।
जब भी हो थोड़ी फुर्सत..
मन की बात बताया करो,
क्या पता खामोश रिश्ते कब टूट जाए,
मन की बात बताया करो।
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कविता :- गुरु की महिमा..!
शिक्षक दिवस पर यही आस रखता हूँ,
कोरे मस्तिष्क में शिक्षा का ज्ञान भरता हूँ,
खुद तप कर मिट्टी को सोना बनाता हूँ।
कभी कड़क कभी नरम बनकर एक किताब बनाता हूँ,
वो कोई और नहीं,विद्यार्थी है जिसे मैं किताब बनाता हूँ।
एक जगह ठहर कर उसे मंजिल तक पहुँचाता हूँ,
एक दिन बुलंदियों को छुए यही आस रखता हूँ।
मेहनत करके मेहनत करना सिखाता हूँ,
उदाहरण देकर,एक अच्छा उदाहरण योग्य बनाता हूँ।
डूबती कश्ती को पार लगाना सिखाता हूँ,
बनाये चाहे कोई संगमरमर की ताजमहल,
मैं तो कच्ची ईंटो से ताज बनाता हूँ।
जीवन मे लक्ष्य की प्राप्ति हो ऐसा ज्ञान देना चाहता हूँ,
उसके वर्तमान,भविष्य का ख्वाब सजाना चाहता हूँ।
ऊर्जा का संचार भरकर सपनों को हकीकत में बदलना सिखाता हूँ,
अ-अनपढ़,ज्ञ से ज्ञानि बनाकर उन्हें एक किताब बनाता हूँ।
बच्चों में शब्दों का भंडार भरता हूँ,
जीवन क्या है इसे समझाता हूँ,
शिक्षक दिवस पर यही आस रखता हूँ,
विद्या का धन देकर जीवन सुख से भरता रहूँ।
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