लव जिहाद..!
आज बोल रहा हैं तेरा भाई!
घूम रहा हैं गली गली,
अब खंजर लेकर कसाई!
प्रेम का जाल बिछाकर,
पहलें जाओगी फसाई!
फिर आबरू लूटकर जब जी भर जाएँ,
कर देंगे ये तेरी कटाई!
होते गए अपराधों पर अपराध,
फिर भी तू समझ न पाई!
बस एक ही शब्द दोहराती रही,
की नहीं हैं ऐसा मेरा वाला चुप रहों मेरे भाई!
देश धर्म और समाज कें खिलाफ,
जिसनें हैं मेहँदी रचाई!
फिर टुकड़ें टुकड़ें में कटकर सूटकेस बोरियों में पैक होनें की,
दर्दनाक गति हैं पाई!
दूसरों की गलती पर भी कुछ सिख लिया करों,
ए मेरी प्यारी बहन!
वर्ना याद करोगी तुम उस दिन सनातनी कों,
जब संकट में होंगें तेरे प्राण!
अब मैं अपनें सनातनी भाइयों से भी कुछ कहना चाहूँगा...
उठो जागो और चलो सनातनियों,
एक अभियान चलातें हैं!
हर सनातनी बहन कों सच्चाई बताकर,
उसे लव जिहाद से बचाते हैं!
द्वापर में द्रोपदी कें चिर-हरण पर,
पूरा महाभारत हों गया!
और कलियुग में द्रोपदी कें टुकड़े-टुकड़े हो गए,
पर देश का दुर्भाग्य लोग एक दूसरें कों ताकते रह गया!
क्या नहीं बचा अब एक भी,
माँ भारती कें लाल!
जो दुशाशन कें रक्त से धो सकें,
द्रोपदी कें बाल!
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मैं बेरोजगार हूँ..!
ना कोई कवि हमें सुनाता हैं न मीडिया हमें बताता हैं!
क्या मैं इतना बेकार हूँ?
मैं बेरोजगार हूँ!
ये नेता ये मंत्री सभी कों बिजली पानी और सड़क में उलझाएँ हैं,
पूछता हैं सनातनी की अबतक देश कें कितनें समस्याएँ सुलझाएँ हैं!
क्या मैं पढ़कर फेक दिया जानें वाला अखबार हूँ?
मैं बेरोजगार हूँ!
गाँव में पापा मौसम की मार सहकर हमें शहर की छाँव में रखता हैं,
करियर की चिंता से शहर कें इन चारदीवारियों में कभी कभी दम मेरा घुटनें लगता हैं!
सामनें मेरे अँधेरा ही अँधेरा हैं और मैं लाचार हूँ,
मैं बेरोजगार हूँ!
माताजी की जेवर, पिताजी की जमीन और न जानें क्या क्या हमनें खोएँ हैं,
माता-पिता और करियर की चिंता में हम हर दिन फुट फुट कर रोएँ हैं!
फिर भी मैं अपनें दृढ़ संकल्प से पीछें नहीं हटूँगा हरदम मैं तैयार हूँ,
मैं बेरोजगार हूँ!
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जय बाबा बैधनाथ..!
और एक एक करकें नौ सिर अपना शिवलिंग में चढ़ा दिया।
दसवाँ सिर काटने के लिए जब तलवार रावण नें उठा लिया,
तब महादेव प्रसन्न होकर रावण कों हैं दर्शन दिया।
फिर भोलेनाथ रावण कों हैं वरदान मांगने कों कहा,
तब कामना लिंग कों लंका ले जाने का वरदान रावण ने मांग लिया।
फिर महादेव ने पूर्ण की इच्छा और बदले में एक शर्त रखा,
की ले जाते वक्त यदि रखोगें धरती पर मैं वही ही रह जाऊँगा।
लाख यत्न करोगे फिर भी मैं न लड़खड़ाऊँगा,
रावण शर्त मान गए और फिर खूब हैं प्रसन्न हुआ।
सुनते ही बात शिव कें कैलाश छोड़ने की सब देवतागण चिंतित हुए,
और इस समस्या कें समाधान हेतु सब भगवान विष्णु कें पास गए।
तब भगवान विष्णु ने लीला रची एवं सारा खेल पलट दिया,
और आचमन कें समय रावण कें उदर में वरुण कों घुसनें कों कहा।
आचमन करकें शिवलिंग कों जब रावण श्रीलंका के लिए निकल पड़े,
फिर झारखंड राज्य कें देवघर कें पास उसे जोर से लघुशंका लगें।
तब बैजू नाम के अहीर कों शिवलिंग देकर वह लघुशंका करनें चला गया,
फिर शिवलिंग कें भार से तंग आकर बैजू ने धरती पर हैं स्थापित कर दिया।
लौट कें आकर लाख यत्न किया पर वह शिवलिंग को उठा न सका,
फिर लात मारकर अँगूठा से गढ़ाकर रावण वहाँ से चला गया।
फिर वैजू कों लगा कि भोले भक्ति का यही एक तरीका हैं,
और चार डंडा लगाकर अँगूठा से गढ़ाकर फिर बैजू भी भक्ति रोज करनें लगा।
एकदिन बैजू कों भूख लगी जोर से और जैसे ही निवाला उठाने लगा,
फिर याद आया बैजू कों कि आज हमनें भक्ति भोले का नहीं किया।
तब शिवलिंग पर लाठी से फिर जैसे ही वैजू ने प्रहार किया,
फिर भोलेनाथ प्रसन्न होकर वैजू कों हैं दर्शन दिया।
तब वैजू महादेव के चरणों में गिर क्षमा याचना किया,
और महादेव वैजू कों फिर एक अमोघ फल दिया।
इस पवित्र स्थल का नाम शंभू नें वैजनाथ धाम किया,
फिर स्वर्ग से भी देवतागण आकर शिवजी की स्तुति किया।
पहले भक्त फिर भगवान,
यही हैं हमारें सनातन धर्म की पहचान।
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भाई हो तो कुम्भकर्ण जैसा..!
भाई हेतु अपना सर्वस्व
महाबली और पराक्रमी वो तो
वीरवर कुम्भकर्ण था।
भाई का साथ उसने कभी न छोड़ा जबकि उनको सब ज्ञान था,
भाई की गलती पर भी साथ देने वाला
वो दानवों में महान था।
लंका पर आई विपत्ति का
जब उसको हुआ ज्ञान था,
फिर समझाने लगे भाई को
हथेली पर रख कर प्राण था।
ना समझे भाई तो चल पड़े रणभूमि में
और कर रहा भाई का जयगान था,
फिर लड़ते लड़ते रणक्षेत्र में कटा दिया था सर
और पाया मोक्ष का दान था।
वीरता को इसकी स्वर्गलोक से देवतागण भी किया प्रणाम था,
भाई भाई के प्रेम को अमर कर गया वो योद्धा बड़ा बलवान था।
देश कुल की रक्षा के लिए उसने दे दिया प्राण था,
इसका मुख्य कारण भाई रावण का अभिमान था।
ऐसे तो वह अधर्मी थे पर ह्रदय में धर्म का ज्ञान था,
धर्मयुद्ध में भी पीछे न हटा जबकि सम्मुख भगवान था।
यही धर्म यही कर्त्तव्य और यही समुचित ज्ञान हैं,
जरूरत पड़े तो भाई पर भाई को हो जाना कुर्बान हैं।
धन के लालच में भाई ही भाई का ले लेता अब प्राण हैं,
खून का रिश्ता भी नीर हो जाता समय का ये वाण हैं।
मेले में भाई अकेला हैं न्यायलय में भाइयों का मेला हैं,
आज हर गली मुहल्लों में हे साहब ऐसा ही झमेला हैं।
आज राष्ट्र को कुम्भकर्ण जैसे भाई की आवश्यकता हैं।
मैं भी बेरोजगार..!
जीवन भर संघर्ष का, क्या यही नतीजा पायेगा..??
केवल वादा ही वादा मिला और मिला ठोकर अपार..!
मैं भी बेरोजगार साहब मैं भी बेरोजगार..!!
कई छात्र चिंता में दम तोड़ दिया,और कई जुलूसों में घायल भी हुए..!
फिर वही आश्वासन और वादा का, खेल वो खेलतें रहें..!!
कई प्रदर्शन में छात्रों पर किया, लाठी से भीषण प्रहार..!
मैं भी बेरोजगार साहब, मैं भी बेरोजगार..!!
जीवन पर्यन्त पसीने से नहाकर, पिता ने हैं सहयोग किया..!
अमीर और गरीबों में हमें, अंतर ना ही जानने दिया..!!
सुखी रोटी स्वयं खाएँ और हमें खिलाया पौष्टिक आहार।
मैं भी बेरोजगार साहब, मैं भी बेरोजगार।।
हमारें सारे विद्यार्थी अब क्या, दर-दर ठोकरें खायेगा..?
माता-पिता का सपना भी क्या, मिट्टी में मिल जायेगा..??
सनातनी अपने शब्दों से यहाँ, करें करारा प्रहार..!
मैं भी बेरोजगार साहब, मैं भी बेरोजगार..!!
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अपना झारखण्ड..!
स्वर्ग से भी सुंदर हैं ये अपना झारखंड।
निरंतर गीत गाती जहाँ कल कल झरने होकर के मस्त मलंग।
स्वर्ग से भी सुंदर हैं ये अपना झारखंड।
मोती के जैसा पानी की बुँदे यहाँ हरदम गिरे झरना से अनंत।
स्वर्ग से भी सुंदर हैं ये अपना झारखंड।
खजूर के चटाई पर सोते ही लोग जहाँ भूल जाते गद्देदार पलंग।
स्वर्ग से भी सुन्दर हैं ये अपना झारखंड।
शाल पत्ते में भोजन के पश्चात जहाँ फीका लगें सोने के बर्तन।
स्वर्ग से भी सुंदर हैं ये अपना झारखंड।
महुआ,ताड़ी में मिल जाता यहाँ रम और विस्की का आनंद।😀
स्वर्ग से भी सुन्दर हैं ये अपना झारखंड।
शरीर का रोम रोम भी झूम उठे जब बाजे नगाड़े संग मृदंग।
स्वर्ग से भी सुंदर हैं ये अपना झारखंड।
सर्दी गर्मी और वर्षा जहाँ सभी ऋतुओं का मिलता आनंद।
स्वर्ग से भी सुंदर हैं ये अपना झारखंड।
आदिकाल से प्रकृति पूजा यहाँ श्रद्धा भाव से करें होकर मगन।
स्वर्ग से भी सुन्दर हैं ये अपना झारखंड।
प्रकृति के खूबसूरती के कारण ही यहाँ अपार मिलता हैं आनंद।
स्वर्ग से भी सुंदर हैं ये अपना झारखंड।
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माँ..!
कष्ट चाहें जितनी भी दे दो फिर भी बेटें के लिए सदैव माँ का प्यार हैं।
ताना देकर भोजन देने वालें बेटें का भी ये माँ चाहती उपकार हैं।
हे ह्रदय प्रिय महाशक्ति महामाया सचमुच तेरी लीला अपरंपार हैं।
माता से ही हमलोग हैं और फिर हमसे ही ये सारा संसार हैं।
ममतामयी माता कें ऊपर ही दुनिया कें सृष्टि और रक्षा का भार हैं।
एक माँ कहती हैं की...
जब तक बेटें की शादी न हुई तब तक मिलता बेटें का प्यार हैं।
फिर उसकें बाद हैं काटना दुःखों का पहाड़ हैं दुःखों का पहाड़ हैं।
जिस माँ ने तुझे जन्म दिया उसे तू वृद्धा आश्रम में छोड़ फरार हैं।
और मंदिर में जाकर तू चढ़ा रहा अब महंगे महंगे उपहार हैं।
माँ कें चरणों में तो स्वर्ग हैं साहब! और फिर तीरथ हजार हैं।
माँ तुम बिन कुछ अच्छा न लागे लगता ये जीवन बेकार हैं।
पवन जैसी निर्मल हैं माँ छाया जैसी शीतल हैं माँ! माँ ही तो दया का भंडार हैं।
माँ कें बिना तीरथ और पूजा सबकुछ ये बेकार हैं, सबकुछ ये बेकार हैं, सब कुछ ये बेकार हैं।
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खून खौलता इतिहास..!
सीने में धधकती आग सी जलेगी, और रोम खड़ा हो जाएगा।
अंग्रेजों कें काले कारनामों कों, आज सनातनी बताएगा।
इस भयानक दास्तान कों पढ़ते, आज पाठक भी थर्रायेगा।
पृथ्वीराज चौहान कें पहले, दोनों आँखों कों फोड़ा गया।
तड़पा तड़पाकर उसकें बाद हैं, मृत्युदंड उसे दिया गया।
फिर पत्नी संयोगिता से भी, जघन्य अपराध हैं किया गया।
न जानें कितनें बहन बेटियों की आबरू, गद्दारों द्वारा लुटा गया।
गर्म तवे पर खौलती रेत में, अर्जुनदेव को डालकर मारा गया,
लकड़ी कें दो पाटों में बाँध, मतिदास जी कों आरी से चीरा गया।
कड़ाह कें खौलतें तेल में डुबा, सतीदास जी कों भी हैं मारा गया।
लहू के कतरे कों बहाकर वह, माँ भारती कें आँचल लाल कर गया।
दयाला जी कों रुई में लपेट, जिन्दा ही उसे जला दिया गया।
गुरुगोविंद कें 2 मासूम बच्चों कों, दिवार में ही चुनवा दिया गया।
खाल नोच बंदा बहादुर कें, तड़पा तड़पाकर उसे मारा गया।
छत्रपति संभा कें चमड़ी छिल, 65 दिनों बाद उनका बध किया गया।
भारत माता कें लिए वीरों ने, खून की होली हैं खेल गया
पहली बार आज मेरा कलम हैं, लिखतें लिखतें रो गया।
इतिहास पढ़ने के बाद हैं हमनें, एक बात ही ठानी हैं।
ऐसे दर्दनाक घटना कों अब, लोगों तक पहुँचानी हैं।
पढ़ने के बाद यदि खून न खौलें, खून नहीं वो पानी हैं।
जानकारी तो आपकों नई मिली, पर घटना ये पुरानी हैं।
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यह आलेख माँ भारती कें श्रीचरणों में समर्पित हैं हमारें देश कें शहीद हुए जवानों कें परिवार कें बारे में जब मैंने सोचकर देखा तो मुझे लगा की इस विषय में कुछ लिखना चाहिए और मैंने लिख दिया आइए जानते हैं:-
आजादी से लेकर अब तक 75 वर्ष व्यतीत हों चुँके हैं इन पचहत्तर वर्षों में हमारें देश के लगभग 35000 पुलिसकर्मी शहीद हुए हैं अर्थात एक वर्ष में लगभग 467 परिवार में से किसी से उनका बेटा, तो किसी से उनका पति, तो किसी से उनका भाई और भी ना जानें कितने लोग अपने परिवार से बिछड़ चुँके हैं एक घटना ऐसा भी सामने आया हैं कि हमारे देश कें एक जवान का प्रथम सप्ताह में उसकी शादी होती हैं दूसरें सप्ताह में उसकों सीमा पे बुलाया जाता हैं और तीसरे सप्ताह में वह शहीद हो जातें हैं, ऐसे परिवार की क्या दशा हुई होगी कभी आपने सोचा हैं और भी कई प्रकार की ऐसी घटनाओं से मैं आपकों अवगत करा सकता हूँ परंतु इस आलेख को मैं लंबा नहीं करना चाहता मित्रों इस दुनिया में हर चीज पैसे से खरीदा नहीं जा सकता जैसे प्यार, आशीर्वाद, स्नेह, खुशी आदि। परिवार के मुखिया के चले जाने कें बाद परिवार में जो पहाड़ टूटता हैं इसका अंदाजा आप और हम नहीं लगा सकतें वो तो एक बेबस और लाचार माँ बहन और बेटियाँ ही लगा सकती हैं यहाँ किसको क्या फर्क पड़ता हैं कौन मरें और कौन बचें सब अपनें अपने में मस्त हैं आखिर कब तक ये जिंदगी और मौत का खेल चलता रहेगा,क्या यह एक प्रकार का परंपरा बन गया हैं की हमारे देश कें अनुमानित 500 परिवार प्रतिवर्ष अनाथ होते ही रहेंगे, आपकों पता हैं आध्यात्मिकयुग में सुरक्षाकवच हुआ करता था जब कोई देवी-देवताओं या कोई स्थान असुरक्षित रहता तो उसे तत्काल सुरक्षाकवच से उसकी रक्षा की जाती थी आज भारत को भी एक सुरक्षाकवच की आवश्यकता हैं हम सदियों से सुनते आ रहें हैं कि मनुष्य अब चन्द्रमा, सूर्य, मंगल आदि ग्रहों पर जा रहें हैं, अंतरिक्ष पर जा रहें हैं हमारी पृथ्वी पर सीमा में सैनिक सुरक्षित हैं ही नहीं और हम अंतरिक्ष ग्रह आदि जगहों पर जानें पर गर्व महसूस कर रहें हैं कहाँ हैं वो ए सी में रहनें वालें बुद्धिजीवी लोग,कहाँ हैं वो वैज्ञानिक उनसे मेरी चुनौती हैं कि यदि हैं उसमें ताकत तो वह एक ऐसे सुरक्षाकवच का निर्माण करें जिससे हमारें देश कें एक भी जवान कों अपनें प्राणों की आहुति नहीं देनी पड़ें विशेष और क्या लिखूँ हमारें देश में दिग्गज दिग्गज लोगों कें रहते भी जब इस प्रकार की घटना सामने आती हैं तो बहुत दर्द होता हैं लिखनें का उद्देश्य 75 वर्षों तक हमारें देश कें जवान अपनें प्राणों की आहुति देते रहें और कितने वर्षों तक यह जिंदगी और मौत का खेल चलता रहेगा क्या जब तक यह पृथ्वी रहेगी तब तक हमारें देश के जवान शहीद होते रहेंगे मैंने आजतक कभी किसी को इस विषय पर चर्चा करते नहीं देखा हैं इसीलिए आज अपनें बातों कों आप सभी कें समक्ष रख दिया हैं अविलंब इस पर कोई उपाय ढूँढना चाहिए कोई भी समस्या बड़ा नहीं हारा वही जो लड़ा नहीं क्या महापुरुषों की दी हुई ये वाणियाँ भी झूठी हो जाएँगी, जैसे ही समस्या उत्पन्न होती हैं ठीक उसी समय उसका समाधान भी उत्पन्न हो जाता हैं बस जरूरत हैं हमकों खोंजने की ढूँढने की। उपर्युक्त दिए हुए बातों में अगर किसी भी प्रकार की भूल-त्रुटि हो तो मुझे क्षमा करें, मुझे उतना ज्ञान तो नहीं हैं लेकिन मुझे लिखनें का बहुत शौक हैं और मैं कोशिश करतें रहता हूँ बाकि आपका प्यार और आशीर्वाद सदैव मुझे मिलता रहें।साभार।🙏😊
जय हिंद जय माँ भारती।
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शिक्षा के क्षेत्र में उमाअमृता फाउंडेशन की अनूठी पहल..!
अमृता विद्यापीठ निशुल्क कोचिंग सेंटर के द्वारा कक्षा 1 से 10 के बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा..!
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मिटने वाला मैं नाम नहीं,
तू जिसे मिटाना चाहता हैं।
बार-बार कुचला जाता हैं।
फूलों सा कोमल वह पौधा,
जमीन फाड़ बाहर आता हैं।
मिटने वाला मैं नाम नहीं,
तू जिसे मिटाना चाहता हैं।
चट्टानों से समुंद्री लहरें,
युगों युगों से टकराता हैं।
फिर भी वह चट्टान का,
कुछ भी बिगाड़ नहीं पाता हैं।
मिटने वाला मैं नाम नहीं,
तू जिसे मिटाना चाहता हैं।
तनिक ठोकर से शीशे भी तो,
चूर-चूर हो जाता हैं।
शीशे कें टुकड़ो में भी हमें,
चेहरा अपना नजर आता हैं।
मिटने वाला मैं नाम नहीं,
तू जिसे मिटाना चाहता हैं।
गंगा जी से लाखों लीटर जल,
प्रतिदिन लोग उठाता हैं।
फिर भी गंगा जी का पानी,
ज्यों का त्यों नजर आता हैं।
मिटने वाला मैं नाम नहीं,
तू जिसे मिटाना चाहता हैं।
मिटने वाला मैं नाम नहीं,
तू जिसे मिटाना चाहता हैं।
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अन्नदाता का दर्द..!
दीजियेगा इसमें ध्यान।
नहीं बनना चाह रहा क्यों,
किसान का पुत्र किसान।
नहीं बदले हालात तो,
मिट जाएगा किसान का नाम।
जिस पर निर्भर हैं ये दुनिया
और सारा जहान।
सरकार यदि मदद स्वरुप,
कुछ दे रहा प्रोत्साहन।
तो उसी रुपिए से बिचौलिए,
अपना बना रहा मकान।
गर्मी वर्षा जाड़े का सामना,
करते ये वृक्ष समान।
शरीर तो इनके कठोर हैं,
पर स्वभाव से सरल इंसान।
लोकल लोगों से न हमनें,
लिया कभी कोई समान।
कथनी और करनी का अंतर,
हमनें लिया यहाँ जान।
हिंदुस्तान कें दो अनमोल रतन,
किसान हैं और जवान।
इनदोनों से हमलोग हैं,
और फिर हमसे हिन्दुतान।
वर्षा में तो इनके छत टपकते,
कच्चे हैं इनके मकान।
फिर भी बारिश कें लिए प्रार्थना,
करतें हैं ये किसान।
मर रहा जवान सीमा पर,
और खेतों में किसान।
कैसे सुनाऊँ इस दुखी मन से,
इनलोगों के दास्तान।
जिंदगी में अपनी कभी ये,
लेता नहीं विश्राम।
आँधी तूफान और वर्षा में भी,
करते निरंतर काम।
ईश्वर प्रकृति कें करीब,
भारत की आत्मा हैं किसान।
सनातनी को भी गर्व हैं वह,
किसान कें हैं संतान।
घिसक जाएँगे पैरों तलें जमीन आपकें
फट जाएँगे आसमान।
अगर आप सुनेंगे संपूर्ण हमारे,
किसान भाइयों की दास्तान।
सनातनी का एक निवेदन हैं सरकार से,
लाएँ कोई ऐसा प्लान।
किसान कें प्रति लोग जागरूक हों,
और करें इनका सम्मान।
बोलिए जय जवान जय किसान,
बोलिए जय जवान जय किसान।
शिव..!
देवताओं कें स्वामी दानव कें भी स्वामी।
देवों के देव महादेव ही मेरे शिव हैं,
कालों कें काल महाकाल भी शिव हैं।
सृष्टि भी शिव हैं और प्रलय भी शिव हैं,
आदि भी शिव हैं और अंत भी शिव हैं।
मंदिर में शिव हैं श्मशान में भी शिव हैं,
जीवन में शिव हैं मरण में भी शिव हैं।
गुरुओं कें गुरु महागुरु भी मेरे शिव हैं,
दानियों कें दानी भोलेदानी भी शिव हैं।
कर्ता भी शिव हैं और धर्ता भी शिव हैं,
पुरे विश्व ब्रह्मांड कें रचयता भी शिव हैं।
परम् तपस्वी मेरे शिव ही सिद्ध संत हैं,
मेरे महाकाल प्रभु की लीला अनन्त हैं।
ना किसी से वैर हैं और ना ही घमंड हैं,
सनातनी को भक्ति का नशा अभी प्रचंड हैं।
भोलेनाथ की कृपा हम सभी पर अनंत हैं,
आस्था और भक्ति का ये मधुर तरंग हैं।
रचना :- जमाना..!
ये जमाना बदल गया।
बदलते जमाने के साथ,
दिन वो पुराना बदल गया।
वेशभूषा ने अमीर और गरीबों में,
अब अंतर ही बदल दिया।
फटें तो शौक से अमीर भी पहनने लगें,
दिन वो पुराना बदल गया।
लड़की बनकर नाचने वालें,
लड़कों का वो जमाना बदल गया।
महिलाएँ भी अब शौक से नाचने लगी,
दिन वो पुराना बदल गया।
क्रिकेट, फुटबॉल आदि खेलों का,
वो जमाना बदल गया।
मोबाइल गेम लोग खेलने लगें,
दिन वो पुराना बदल गया।
फुर्सत से आपस में बातचीत करनें का,
वो जमाना बदल गया।
ऑनलाइन सब व्यस्त हो गए,
दिन वो पुराना बदल गया।
दुनिया तो आज भी वही हैं,
ये जमाना बदल गया।
बदलते जमाने के साथ,
दिन वो पुराना बदल गया।
***********
प्रेम विवाह..!
अभिनय कें माध्यम से यह कुप्रथा पूरी दुनिया में छाई।
भाग कर शादी करनें में जो तनिक भी न सकुचाई,
कुछ ही वर्षों बाद इनलोगों कें पैर हैं डगमगाई।
पिता कें कमाएँ इज्जत को ये तार-तार कर लुटाई,
जीते जी परिवार वालों को यह जिन्दा लाश बनाई।
परिवार और समाज कें बातों को ये बिना विचारे ठुकराई,
फिर सफल हो गई करनें में अपनी परिवार की जगहँसाई।
धिक्कार हैं ऐसी बेटीयों पर जो जानें न पीर पराई,
माँ-बाप कें उठाएँ कष्टों कों यह क्षण भर में हैं भुलाई।
हे पाठक पढ़ने के बाद यदि कुछ भी समझ हैं आई,
तो करना न कभी ऐसे जघन्य कार्य इसमें हैं तेरी भलाई।
प्रेम करों पर निश्चल करों सनातनी कहे मेरे भाई,
फिर सदैव ईश्वर तेरे साथ रहेंगे बन करके परछाईं।
राधे रानी ने प्रेम करके एक बात हैं हमें बताई,
पूरी दुनिया कों सच्चे प्रेम का अर्थ हैं समझाई।
वास्तव में यह प्रेम हैं साहब भक्ति की परछाई,
आत्मा परमात्मा का मिलन ही हैं प्रेम की सच्चाई।
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सावन और प्रकृति..!
प्रकृति को सजाने, मनभावन सावन आया हैं।
वर्ष बाद प्रकृति फिर से, एक बार मुस्काया हैं।
प्रेमीवाण कामदेव ने, प्रेमी जोड़ों पर चलाया हैं।
सूरज की किरणें जैसे ही, पृथ्वी पर पड़ता हैं।
प्रकृति की सुंदरता में जैसे, चार चाँद लग जाता हैं।
आसमान में काले बादल, जब भी छाने लगता हैं।
खुश होकर कें मोर भी फिर, नृत्य करनें लगता हैं।
अम्बर कें मेघ गर्जन को, जब जब भी मैं सुनता हूँ।
दोनों कानों में हाथ देकर, छिपने की कोशिश करता हूँ।
रिमझिम रिमझिम वर्षा में जब, ग्वाला बंशी बजाता हैं।
गाय कें संग किसान भी, लौटने का उत्सव मनाता हैं।
नवयुवतियाँ फिर गाँव से, बगीचे की ओर निकलती हैं।
आम या पीपल की शाखा में, वह झूला डालकर झूलती हैं
फूलों की गंधों से मन मेरा, वशीभूत हो जाता हैं।
सोये हुए अरमान जागकर, मन हिलोरे मारता हैं।
चारों तरफ वातावरण ऐसे, खुशनुमा हो जाता हैं।
घर आँगन और प्रांगण सब,सुहावना लगने लगता हैं।
कई प्रकार कें पर्व त्योंहार, जो इस महीनें में आते हैं।
प्रकृति, रिश्तों और जीवों का, महत्व हमें बतातें हैं।
ऊष्म भरी गर्मी के बाद, सावन का मौसम आता हैं।
सावन की यह ठंडी बयार, सबकें मन को भाता हैं।
सावन का ये महीना भी, यादों में सिमटकर रह जायेगा।
सनातनी को भी हैं कुछ यादें, रह रह कर तड़पायेगा।
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पतितपावनी माँ गंगा का धरा पर आगमन..!
गंगा को धरती पर लाकर, किया था कल्याण।
जब तप से सगर को पुत्र मिला, साठ हजार महान।
फिर राजा सगर को होने लगा, धीरे धीरे अभिमान।
अश्वमेध यज्ञ करनें का वह फिर, मन में लिया ठान।
और अश्वमेध यज्ञ में अश्व को, करना होता हैं दान।
देवलोक में विजय कें लिए, वह किये सारे अनुष्ठान।
ईर्ष्यालु इन्द्र को जब पता चला, सगर कर रहा अनुष्ठान।
फिर अश्व चुराकर कपिल मुनि के, आश्रम में दिया बाँध।
सगर के पुत्र अश्व ढूँढने निकले फिर, लिए तीर कमान।
आश्रम में अश्व देख कपिल मुनि का, किए खूब अपमान।
फिर मुनि कें क्रोध से भष्म हुए, साठ हजार पुत्र महान।
सगरपुत्र आत्माएँ फिर भटकने लगें, जंगल और श्मशान।
तब गंगा को धरती लाने का, भागीरथी मुनि लिए ठान।
कठोर तप करके भागीरथीजी ने, देवता को किए प्रसन्न।
ब्रह्मा और शिवजी की सहायता से, हुआ गंगा का आह्नान।
ब्रह्मा कें कमंडल और शिव कें जटा से गंगा, धरती पर किए पदार्पण।
देवताओं समेत सभी जीवों ने, किया गंगा का अभिनन्दन।
सगरपुत्र का उद्धार हुआ फिर, किए स्वर्गलोक गमन।
भागीरथी मुनिजी का हो गया यहाँ, पूरा उसका प्रण।
सनातनी कब क्या लिखें, वह स्वयं भी हैं अनजान।
भूल त्रुटि हो तो क्षमा कर, मेरा करें मार्गदर्शन..!
महामुनि भगीरथी हुए, सारे जग में महान।
गंगा को धरती पर लाकर, किया था कल्याण।
******************
भांग और गाँजा से जिसे,
कर दिया बदनाम हैं।
विष पीने वाले वो मेरे,
नीलकंठ भगवान हैं।।
समुंद्रमंथन के समय जब,
कालकूट विषय निकल गया।
तीनों लोकों और दशों दिशाओं में जैसे,
हाहाकार मच गया।।
देवता, दानव, और मानव सब,
विष के प्रकोप से जलने लगे।
विष पीने को लेकर तब सब,
महादेव से जाकर प्रार्थना किए।।
सबकी यह दुर्दशा देख फिर,
विषपान को वह तैयार हुए।
सृष्टि की रक्षा हेतु फिर वह,
कालकूट विष का पान किए।।
भांग और गाँजा से जिसे,
कर दिया बदनाम हैं।
विष पीने वाले वो मेरे,
नीलकंठ भगवान हैं।।
बोलिए प्रेम से नीलकंठ महादेव की जय..!
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अपना टाइम हम लाएँगे..!
बुरे हालात में साथ जो छोड़ा
उसको भी गले लगाएँगे
मिल जुलकर आपस में
हम सब खुशी के गीत गाएँगे
अपना टाइम हम लाएँगे..!
मार्ग में बाधाएँ आएँ तो
कुचलकर बढ़ते जाएँगे
न ही डरेंगे न ही झुकेंगे
हम तो आगे बढ़ते जाएँगे
अपना टाइम हम लाएँगे..!
समय देखकर उपहास जो किया
उसको भी हम अपनाएँगे
घृणा और ईर्ष्या की नगरी से
हम प्रेम की नगरी ले जाएँगे
अपना टाइम हम लाएँगे..!
निर्बल और कमजोर के अंदर
आशा का दीपक जलाएँगे
विश्व के कोने कोने में
हम तो उजियारा फैलाएँगे
अपना टाइम हम लाएँगे..!
सोचा न था कमजोर समय पर
सब बिछड़ते चले जाएँगे
फिर भी जीवन की संध्या बेला में
हम न रोएँगे घबराएँगे
अपना टाइम हम लाएँगे..!
सच्चाई और अच्छाई की राह पर
हम तो लिखते चले जायेंगे
एक दिन हम भी अपनी मेहनत से
सनातनी गूँजवायेंगे
अपना टाइम हम लाएँगे..!
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गले में टाई नहीं,
हम तो गमछा रखने वाले हैं।
माथे पर टोपी नहीं,
हम तो पगड़ी बाँधने वाले हैं।।
हम गाँव वाले हैं, हम गाँव वाले हैं।
ऊँची ईमारत नहीं,
हम झोपड़ी में रहने वाले हैं।
पलंग नहीं,
हम चारपाई में सोने वाले हैं।।
हम गाँव वाले हैं, हम गाँव वाले हैं।
स्विमिंग पूल नहीं,
हम तालाब और झरनों में नहाने वाले हैं।
पार्क नहीं,
हम प्रकृति का आनंद उठाने वाले हैं।।
हम गाँव वाले हैं, हम गाँव वाले हैं।
शॉपिंग मॉल नहीं,
हम साप्ताहिक हटिया जाने वाले हैं।
गाड़ी नहीं,
हम पैदल और साईकिल से चलने वाले हैं।।
हम गाँव वाले हैं, हम गाँव वाले हैं।
नौकरी नहीं,
हम खेती और मजदूरी करने वाले हैं।
आलसी नहीं,
हम खून पसीने से कमाने वाले हैं।।
हम गाँव वाले हैं, हम गाँव वाले हैं।
शहरी हम नहीं,
हम सनातनी गाँव वाले हैं।
इसीलिए छोटी सी पंक्ति को
सहज ही लिख डालें हैं।।
हम गाँव वाले हैं, हम गाँव वाले हैं।





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