शनिवार, अक्टूबर 29, 2022

रचना :- सुबोध कुमार झा "झारखंडी"

अंगिका रचना :- छठ पर्व होय छै बड़ा भारी..!

छठ पर्व पवित्र होय छै बड़ा भारी,
छठी मईया के हम् छिए आभारी,
करिहो सब मिल नियम  धरम सं,
बढ़तों  समृद्धि  बनभो  संस्कारी।

पैहलो  दिन  होय छै नहाय खाय,
मिली जुली जाय सब गंगा नहाय,
जरा सा मन मं पाप नाय  रखिहो,
प्रसाद  रूपों मं कद्दू भात बनाय।

दोसरका दिन छै फिरू व्रत खरना,
परबैतनी क् दिनभर भूखले रहना,
शाम क् सभे क् घर मं बोलाय क्,
अरगासन प्रसाद सबक् खिलाना।

कटि कटि सबकुछ खरीदन् आय,
ठेकूआ  कसारो  छै सबन् बनाय,
सबकुछ तनि तनि सूपो म् दैयक्,
माथा प्  लय क् गंगा घाट जाय।

सुनै छिए सूरज न् अरग देलो छेलै,
इह् खातिर सूरज के तेज बढ़लो छेलै,
मईया दयालु छै सबक् समान मानै छै,
कुलामों छौं त् करो जे करलो छेलै।

सूर्यास्त  सूर्योदय  क् अरग दै छै,
गंगाजल सं सब आचमन लगै छै,
छठी मईया आरो गंगा मईया संग, 
भगवान  सूरज के पूजन  करै छै।

चार दिनो केरो छै पावन त्योहार,
खुशी खुशी  रहै छै सभे  परिवार,
छठी मईया त् बड़ी दयालु छथिन,
सबके करकै करतै हमरो उपकार।

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आपबीती :- कैसी रही मेरी कल वाली दिवाली..??

कल मेरी वाली दिवाली खुब मनी,
ऐसा कि घर में दोनों में खुब ठनी।

खुशियाँ चहूँओर निखरी थी,
जो मेरे घर में भी बिखरी थी।

मैं शाम से बाहर ही सोया था,
पर मैं अंदर अंदर ही रोया था।

सोचा क्यों किसी की दिवाली खराब करूँ,
बस अभी कुछ कष्ट है स्वयं ही सहता रहूँ।

थोड़ा पड़ गया था मैं बीमार,
आ गया था सीजनल बुखार।

मुझे सोता देख उसकी सीमा पार कर गई, 
गुस्साई मेरी सीमा बस मेरे सामने आ गई। 

खीसियानी बिल्ली खम्भा नोचे,
गुस्साई बीबी बस पति को डाँटे।

बोलीं दिवाली का दिन है आप कितने हो अभागे,
इतना आलस है कि आज के दिन भी नहीं जागे।

शरीर टूट रहा हिल रहा है मकान,
अकेले नहीं पक रहे हैं पकवान।

जैसे ही गुस्से में उसने चादर हटाई,
गुस्सा काफूर जब मेरा शरीर गर्म पाई।

बहुत अफ़सोस करने लगी वह बेचारी,
क्या करतीं उनकी भी थीं कुछ लाचारी।

मुझे भी तो बस एक अफ़सोस हुआ,
दुख हुआ मुझे जब मैंने उसे था छूआ।

तप रहा था तन,
जल रहा था मन।

कराह रही थी वो, बुखार था उसे बड़ा भारी,
जल रही थी वो, फिर भी थी उपकारी।

कितनी त्यागी, कितनी होती है संस्कारी,
माँ स्वयं जलकर भी होती है परोपकारी।

अब मुझे उसपर थी बड़ी दया आई,
फिर बच्चों पर मैंने कुछ डाँट लगाई।

बच्चे को था बस कुछ सजा सुनाई, 
फिर हमने एक दूजे को दवा पिलाई।

अब आज अभी सबकुछ ठीक है,
आज खुशियाँ है सबकुछ नीक है।

बस कटी मेरी कल वाली दिवाली,
अब फिर से आई घर में हरियाली।

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समसामयिक व्यंग्य :- झारखंड में शिक्षा का भविष्य..!

जैक से सिलेबस हुआ बस जारी था,
भले ही यह विद्यार्थियों के लिए भारी था।
फिर भी सबने इसे सहर्ष स्वीकार किया,
फिर सरकार ने ऐसा क्यों व्यवहार किया?

विद्यार्थियों को पागल कर देगी सरकार,
अधर में मत लटकाओ सुधारो व्यवहार।
जब जो मन में आए परीक्षा नियम बनाए, 
शिक्षा जगत के लोगो बस करो प्रतिकार।

जो भी बस कहना हो कहो एकबार,
जो हो नियम बनना हो बनाओ एकबार,
क्या विद्यार्थियों पर दया नहीं आती?
जो भी जख्म देना हो दे दो एकबार।

कभी तो कहते परीक्षा होगी दो-दो बार, 
अब तो कहते हो यह होगी बस एक बार,
अब जब बस कुछ ही दिन शेष बचे हैं,
तो क्यों लटकाते सिर पर तलवार?

जान हलक में पर नेता अड़े हुए हैं;
सारे नियम ही फाइल्स में सड़े हुए है;
शिक्षा संस्कार की दुर्व्यवस्था तो देखो;
हर कोई अपनी मनमानी पर खड़े हुए हैं।

झारखंड कब सुधरा था जो अब सुधरेगा?
क्या हड़िया दारू में ही शिक्षा गुजरेगा?
कभी तो चिंता करो बस इस राज्य की?
एकला क्या करे सुबोध बस क्या लिखेगा?

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सामाजिक समरसता..!

समरस तन मन, समरस जीवन;
समरस हो बस सबका  अंतर्मन;
सुसंस्कृत हो भारत का जन-जन;
जब सबका हो सम्पूर्ण  समर्पण।

बस समरसता का ध्यान करें हम,
अपने भाई का बस मान करें हम,
अपने ही  घर  में वो अनजाना है,
आओ  उनका सम्मान  करें  हम।

दूर हो  रहे हैं  वो  बस हमसे;
पता नहीं प्रभावित है किससे?
कोशिश  हो  बस जानने  की;
जब घर घर सम्पर्क हो उससे।

आओ चलकर बस उन्हें मनाएँ;
घर-घर जाकर बस उन्हें जगाएँ;
बस समरसता का भाव जगाकर;
फिर लोकतंत्र  को सफल बनाएँ।

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हास्य व्यंग्य:-करवाचौथ..!

सुबह सबेरे आज उठा,देखा आदर भाव;
सुन्दर सा बस चाय मिली,फिर दूध एक पाव।

फिर दूध एक पाव,पीकर मैं गया गूसलखाने;
पत्नी तौलिया ले थी खड़ी,बोली जाओ अब नहाने।

जाओ अब नहाने, नास्ता कर लो गरम गरम;
पत्नी चली बताने, अपने बस प्रेम का मरम। 

अपने बस प्रेम का मरम,मुझे कुछ सच्ची लगी;
पत्नी प्रेम से लगा शरम,घर में मेरी बच्ची भली।

फिर भी मैंने पुछ लिया,क्या कुछ है बात?
शायद कल कुछ पैसे दिया,कटी कैसी है रात?

कटी कैसी है रात, पत्नी मंद मंद मुस्काई;
उसकी यह कटू हँसी, मुझे समझ न आई।

मुझे समझ न आई,मन में लगा बस डर;
झाड़ू पोंछा हमने ही लगाई,फिर क्यों ऐसा है घर?

फिर क्यों ऐसा है घर,पुछा मैं बस मरकर;
ऐसा क्या हुआ असर,पुछा मैं डरकर।

जब पुछा मैं डरकर,बोली वो आज बस रहो साथ,
देख लेने दो जी भरकर,आशीष का बस धरो हाथ।

सारी बात समझ में आई,आज क्यूँ नहीं है मेरा उपहास;
फिदा है मेरे भाई की भौजाई,क्योंकि आज है करवाचौथ उपवास।

आज है करवाचौथ उपवास,क्या सब दिन ऐसे ही कटेंगे?
अब फिर न होगा वनवास,प्रेम सदा ऐसे ही मिलेंगे?

प्रेम सदा ऐसे ही मिलेंगे,बताओ न मेरी भागवान;
प्रेम से हमदोनों चलेंगे, देखने सुन्दर फिल्म बागवान।

सुन्दर फिल्म बागवान,कितना प्रेम था अमित हेमा में;
मत करो क्रोध मैं भी हूँ इन्सान,जाओ भर्ती हो जाओ सेना में।

ध्यान रहे कुछ भी खाने से,करवाचौथ व्रत छूट जाता है;
याद रहे पति का दिमाग भी चाटने से,करवाचौथ व्रत टूट जाता है

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आज सिर्फ और सिर्फ साहित्यकारों के लिए एक आलेख..!
मैं जानता हूँ कि जो मैं कहने जा रहा हूँ बहुत से मेरे साहित्यकार भाई बहनों को अनुचित लग सकते हैं लेकिन क्या करूँ मुझे तो बोल देने की आदत है इसलिए बोल देता हूँ अब अच्छा लगे या बुरा मुझे क्या फर्क पड़ता है ?
  आजकल देखता हूँ रचनाकार कम अदाकार अधिक हो गए।साथ ही अब पुराने दिन गए कि वो परम्परागत चाँद,तारे,बादल,वर्षा की बूंदें, वो प्रेयसी सब बकवास।अब कुछ अपना लिखने का प्रयास हो और अपना नाम हो। कुछ से कुछ लिखकर रचनात्मकता दिखाना बेकार लगता है इससे जिसे आप आदर्श मानते हो वो भी आपकी रचनाओं से नाराज होते हैं। विशेषकर बहनें रचनाकार जो लटके-झटके दिखाने लगती हैं वह बिल्कुल सही नहीं है।इसके लिए एक अलग प्लेटफॉर्म होता है वो बनाएँ और उसपर अपनी अदाकारी दिखाएँ या ऐसा अपने घर में करें, फेसबुक पर क्या जरूरी है? 
  पता नहीं आजकल क्या हो गया है रचना में कोई रहस्य ही नहीं होता।
रचनात्मकता ऐसी हो कि या तो हँसाओ या रूलाओ या समाज, सरकार या व्यवस्था को आइना दिखाओ।
    साहित्यकार को कैसा डर? साहित्यिकार समाज सुधारक व समाज का दर्पण होता है।आप जैसा देखते हो वैसा लिखते हो। लेखनी जागृत करो व्यवस्था का प्रतिकार करो।सामाजिक न्याय व परिवर्तन के लिए लड़ो।रचना में आधुनिकता का समावेश हो।हम कितना पुराने परम्परागत विरासत को आगे बढ़ाकर सिर्फ और सिर्फ उनकी ही भावनात्मक अभिव्यक्ति का अनुसरण करते रहें।वो मेरे आदर्श हैं इसलिए उनका हम संरक्षण करेंगे पर इस आधुनिक युग में निश्चित रूप से रचनात्मकता में अपनी सोच विकसित करने की आवश्यकता है।अब नीरस रचनाओं की कोई जरूरत नहीं है। रचनाएँ रूचिकर हो ताकि लोग चाव से किताबें खरीदकर पढ़े।आप रहें या ना रहें आपकी रचनाएँ या आपकी साहित्यिक विरासत आपकी आवाज बुलंद करे।भविष्य के हाइटेक बच्चों के सिलेबस का भाग हो।कोई भविष्य का काका हाथरसी, निराला , पंत, गुप्त या आधुनिक सुरेंद्र शर्मा और कुमार विश्वास बन सके।

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हास्य व्यंग्य :- अकाट्य वचन..!

सब्जी में आलू ;
जंगल में भालू ;
बिहार में लालू ;
बड़े होते महान। 

पक्षी   में   कौआ ; 
पेड़    में    झौवा ;
लकड़ी में महूआ ;
के बड़े हैं पहचान।

दुर्गा   की   शक्ति ;
शिव  की   भक्ति ;
दुर्जन से  विरक्ति ;
से न हो अनजान।

पेय   में  अंग्रेजी शराब ;
महफ़िल में देशी शबाब;
धन दौलत हो बेहिसाब;
पहुँचाते हैं ये व्यवधान।

अभिव्यक्ति की आजादी;
देश की बढ़ती  आबादी;
लोक सम्पत्ति की बर्बादी;
कराए देश का नुकसान।

अनजान के घर ठहराव;
घाटी सड़क का घुमाव;
उत्तर प्रदेश  का चुनाव;
बड़े  होते  हैं  घमासान।

भाई  समझो  तो  जानो;
फिर  खुद  को  पहचानो;
मानो   या    ना    मानो ;
न हो किसी का अपमान।

सबेरे  थोड़ा  हो नास्ता;
बस  सही  चुनो रास्ता;
सत्कर्मों से रखो वास्ता;
तभी   बनोगे   इन्सान।

एक बनो बस नेक बनो,
देश हित में काम करो;
सच कहने से मत डरो;
तभी बनेगा देश महान। 

सदा  ही  व्यस्त  रहो;
हर   वक्त  मस्त  रहो;
मेरे शब्दों से पस्त रहो;
रह जाओगे बस हैरान।

कवि  सुबोध  पर हँसना  नहीं;
हँस  भी  गए  तो फँसना  नही;
गर फँस भी गए तो डरना नहीं;
पुरे  होंगे  बस  सारे  अरमान। 

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एक ख्वाब जो देखा था मैंने..!
एक ख्वाब जो,देखा था मैंने,विश्वास तो, कुछ भी नहीं ;
वह बैठी थी जो सिरहाने में,बस पास तो,कुछ भी नहीं।

बस एक एहसास था,हमदर्द कोई खास था;
स्पर्श में,बहता गया, बस पास तो,कुछ भी नहीं।

सरदर्द जो,बस सर में था,अब वो जरा, उतर गया;
एक आह जो, बस दिल में थी,एहसास तो कुछ भी नहीं।

"एक प्रेम था, बस ममता थी,आयी थी आशियाने में;
सहला रही थी,सर को जो, बैठी मेरे सिरहाने में।"

कुछ आश थी,कोई पास थी,शायद वो मेरी,खास थी;
आँखें खुली,*मेरी माँ थी वो* पर पास तो कुछ भी नहीं।

गुजरे जमाने,हो गए, अब ख्वाब ही,बस रह गया;
एक एहसास ही तो रह गया,बस आश तो कुछ भी नहीं।

बस आश तो कुछ भी नहीं;
बस आश तो कुछ भी नहीं। 

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वर्तमान युग में महिलाओं की सक्षमता पुरूषों के समकक्ष है अपितु आज भी कुछ महिलाएँ दहलीज पार करने में सकुचाती है जबकि वे प्रतिभासंपन्न हैं।  अपनी इस छायावादी रचना द्वारा उनमें जागृति लाने का एक प्रयास है।रचना में एक उषा महिला का नाम है तथा दूसरे का अर्थ भोर है।
स्वागत हो सुप्रभात का..!
सपनों से जागो अब चल उठ उषा;
बीत गई जो थी परम्परागत निशा।
एक उषा बिखेर रही अपने किरणों को;
पर तुम हो कि संजोए रही अपने सपनों को।
प्रतिभासंपन्न हो अब बस तोड़ो ना सपना;
परिश्रम की पराकाष्ठा दिखाओ ना अपना;
चल उठ क्या तुम्हारी नहीं है उत्कंठा,
कि बढ़े समाज में तुम्हारी है प्रतिष्ठा।
एक उषा संग देखो कैसा तेज दिखा रहा है रवि;
चल उठ अब दिखा ना तुम भी अपनी जो है छवि।
अब सुनहरे दिन की करो तुम शुरुआत;
इन्तजार कर रहा तुम्हारा सुन्दर सुप्रभात।

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हास्य व्यंग्य सहित समसामयिक चित्रण..!
(  सुखा सावन :- बरसो सावन झूमके..!  )
सावन का है माह चल रहा;
पर सूर्य की तपिश भारी है;
गर्मी से तन बदन जल रहा;
पर वर्षा की कशिश जारी है।

कहीं  नहीं  देखा सावन  में;
श्रंगार करती  कोई नारी है;
गुमस भरे बस इस जीवन में;
अब वर्षा  पड़ने  की बारी है।

बादल  तो बस  ऐसे घूम  रहे हैं;
जैसे किसी शादी में घूमे फूफाजी
उमड़  घुमड़  बस गरज  रहे हैं;
जैसे बिना बात बिदके जीजाजी।

बरसो सावन  झूम झूमकर ;
कुछ दया करो किसानों पर;
तरस रहे हैं  शहर  दर शहर;
कुछ राहत करो इन्सानों पर।

धूल धूसरित यहाँ सड़क पर;
सुखा  पड़ा   है   यहाँ प्रदेश;
बरसो सावन यहाँ कड़क कर;
नहीं तो कैसे चले भारत देश?

कवियों की लेखनी रूकी है;
स्त्रियों का  रूका है श्रंगार;
बरसो  सावन जोर जोर से;
फसलों की बस हो भरमार।

परेशान है हर एक इन्सान;
धरती है पड़ी बंजर विरान;
अब बरसो सावन झूमकर;
पुकार रहे भारतीय किसान।✍️

🙏इसी संदेश के साथ सुप्रभात की हार्दिक शुभकामनाएँ।🙏

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माँ गंगा..!
(1)
बड़ा पावन है ये धरती जहाँ बहती है ये गंगा;
सदियों से लहर लहराई सी चलती है ये गंगा;
यह गंगोत्री से चलकर सुन्दरवन में मिलती है ;
कई नदियों को अपने में समा लेती है ये गंगा।
(2)
धरा पर भागीरथी प्रयास से आयी है ये गंगा;
भागीरथी नाम से प्रवाहित कहलाती है ध्रुवनंदा;
देवनदी,जाह्नवी,अमरतरंगिनी,सुरसरि,सुरसरिता ;
स्वर्गलोक से उतरी मंदाकिनी नामित है गंगा।
(इन पंक्तियों में वर्णित नाम गंगा के पर्यायवाची शब्द हैं।)
(3)
शिव की जटाओं का तो बस श्रृंगार है गंगा;
बड़े भूभाग को सिंचित करती रसधार है गंगा;
रौद्र रूप में वह सबकुछ अपने साथ बहा लेती;
सौम्य रूप में   बस सृष्टि का  आधार है गंगा।
(4)
पापियों की है मानो तो भँवर मंझधार है गंगा;
विशुद्ध मन से जरा जानो तो बस अवतार है गंगा;
हर एक पाप धूल जाते जरा बस भाव से देखो;
जरा महिमा को पहचानो तो पालनहार है गंगा।

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हास्य व्यंग्य पर आधारित एक काव्य परिचर्चा..!
      ( एक शिक्षक पर भैंस का गुस्सा )

सुनो एक प्राणी की दुखभरी कहानी;
जो उसने बताया मुझे अपनी जुबानी। 

मैं गया था बस दूध लाने एक खटाल;
भैंस ने सोचा अब आ गया गुरू घंटाल।

जैसे ही मुझपर नजर भैंस की पड़ी; 
ओह तपाक से वह हुई बस उठ खड़ी। 

उसने अपने मुँह को मेरे कान में सटाया;
फिर मुझे शिकायत भरे लहजे में बताया।

बोला गुरू तुमलोग बकवास करते हो;
हर हमेशा से ही पक्षपात करते हो।

तुम मेरा ही न दूध घर लेकर जाते हो ;
पर गाय का दूध मीठा है कहते हो।

कहते हो गाय का दूध पौष्टिक आहार है;
क्या यह तुम्हारा मेरे पर नहीं अत्याचार  है?

बच्चा जब बड़ा होता है;
तो मेरा ही दूध पीता है।

पर निबंध लिखने गाय,हाथी या कुत्ता पर कहते हो;
जबकि हम पर कुछ बोलने से तुमलोग हँसते हो।

कहते हो कि काला अक्षर भैंस बराबर;
रात में चरते जैसे निकलते निशाचर। 

क्यों बाँकी जानवरों ने बी ए(BA) पास कर ली है?
क्यों ईश्वर ने सिर्फ हमसब की ही बुद्धि हर ली है?

कहते हो भैंस के आगे बीन बजाना; 
क्यों गाय गाती है लता दीदी का गाना?
 
और बस कुछ होता है तो कहते हो गई भैंस पानी में; 
क्यों बांकी जानवर क्या जाता है शराब की घानी में?

माना कि गाय तुम्हारी माता है ;
पर हमको भी तो कुछ आता है।

अरे भाई कुछ तो शर्म करो;
मेरा भी तो कुछ मर्म समझो।

माता नहीं तो कम से कम मासी कह दो; 
नहीं तो भइया अब मुझे फाँसी ही दे दो।

अब तो भईया भैंसिया ने मार दी लताड़ी;
क्या करूँ मैं ही बस खड़ा था अगाड़ी;
सभी होशियार थे मैं ही था अनाड़ी;
भैंसिया की लताड़ी लगी मेरे पिछुआड़ी।

भैया अब मैं कभी उस भैंस को तो;
कभी अपना लाल पिछुआड़ देखता हूँ।

फिर सोचता हूँ कि दूध तो सबने पिया;
पर सजा क्यों सिर्फ मुझे ही उसने दिया?

शायद इसलिए कि मैं हूँ शिक्षक एक राष्ट्र निर्माता;
जो कुछ मैं कहता वही तो है बस किताबों में छपता।

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नरम दिल बनो पर ठगे मत जाओ..!
जीवन में बस सबकुछ सोच समझकर करो;
मददगार बनो पर कुछ कठोर भी बनकर रहो।

हर बातों को विचारकर ही बोलो;
जमाने के अनुसार अपना मुँह खोलो।

जितना आप सीधे और नरम दिल रहोगे;
उतना ही आप चतुर लोगों द्वारा ठगे जाओगे।

जिन्दगी ऐसी है बोलो तो बुरे कहलाओगे;
और अगर नहीं बोलो तो भी बुरे कहलाओगे।

जीवन की कश्ती जब चलती है;
तो जल्दी किनारा नहीं मिलता है।
और बस यह कश्ती जब डुबती है;
फिर कोई सहारा नहीं मिलता है।

सोच समझकर किसी को दो दिल;
स्वयं जोड़कर कहीं भी कोई दो बिल।

बस ईश्वर पर कुछ आश करो;
परंतु स्वयं पर विश्वास करो।
परिश्रम का फल मीठा होता है;
बाँकी तो सबकुछ झूठा होता है।

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रहे वसुंधरा हरी-भरी..!

आशान्वित है वसुंधरा की आत्मा;
बिखरी बिखरी है रहे हरीतिमा;
बस है ओढ़ चुनरिया हरी हरी;
सुशोभित रहे सम्पूर्ण महकमा।

शोभायमान है यह  वसुंधरा;
गुंजायमान है भ्रंवर से धरा;
कोमल पल्लव हैैं पल्लवित;
सौन्दर्यमान है पुष्पित भरा।

यही हरीतिमा है वर्षा का कारण;
ओढ़ बादलों का बस आवरण;
कोयलिया जब है गीत सुनाती;
वर्षाजल टपकती फिर छण छण।

खेतों में है छाती हरियाली;
कृषकों को आती खुशहाली;
गर वर्षाकाल ना हो प्रकृति में;
जीवन में आ जाती बदहाली।

वृक्ष पर्यावरण संतुलित करता;
समस्त जीवन संपोषित करता।
सुन्दर बिखेरती प्राकृतिक छटा;
तभी तो नभ में है संघनित घटा।

पर मानव तन कमजोर है;
वह सिर्फ बड़ा मुँहजोर है;
करता बखान है विज्ञान का;
फैलाता प्रदुषण चहूँओर है।

धरा पर वृक्ष बस कटता रहा;
प्राकृतिक सन्तुलन मिटता रहा;
जलस्तर भी कितना घट गया;
तभी तो जीवन बिलखता रहा।

जैसे देश में जरूरी है करारोपण;
संतुलन में जरूरी है वृक्षारोपण;
उत्सव दिवस पर वृक्ष लगाकर;
स्वस्थ समृद्ध रहो सदा आमरण।

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आज मजदूर दिवस के दिन मैं उन मजदूर भाइयों को याद करना चाहता हूँ जो अपने घर से दूर अपने जीविकोपार्जन हेतू गए थे परन्तु कुछ कलुषित राजनीति तथा कुछ प्राकृतिक विपदा के कारण कोरोना संक्रमण काल का दंश झेला था और निकल पड़े थे पैदल ही अपने घरों की ओर :-
प्रवासी मजदूर..!
हर गाँव, हर शहर;
चल रहा कोरोना कहर;
समस्या हीं समस्या;
हर घड़ी, हर डगर।

कोई लेने वाला नहीं खबर;
इन्सानियत जिन्दा है मगर;
ऐसे में कोई संभाले उन्हें अगर;
कर दे कोई आसान उनकी डगर।

हाँ मुझे चिंता है उनकी;
जो भटकते हैं दर ब दर;
पैदल ही शहर दर शहर;
दया नहीं आती उनपर;
जो फैला रहा राजनीतिक जहर।

हाँ याद दिलाता हूँ;
प्रवासी मजदूर;
घर से दूर-दूर;
कितना मजबूर?
समस्या से भरपूर; 
कोई मदद करो हुजूर, 
उन्हें घर जाना है जरूर।

बढ़े चलो, तुम हो कर्मवीर, 
अवश्य जागेगा किसी का जमीर,
बनेगा मददगार कोई अमीर, 
जो मंजिल तक पहुँचाएगा तुम्हें सशरीर।

उन्हें चलता देख;
हमारे दिल सिहर गए; 
कुछ को तो मंजिल मिली;
पर कुछ तो रास्ते में गुजर गए।

पता नहीं वह कैसा, कहाँ का और कौन था,
दुख से बोला सुबोध जो अब तक मौन था।
छोड़ो मुझे उनसे दोस्ती का इजहार करो,
निभाएगा शिद्दत से थोड़ा तो एतवार करो।

आज उन्हीं को याद करता हूँ;
बस उन्हीं पर कुछ लिखता हूँ;
थोड़ी इन्सानियत जिन्दा थी;
अभी भी कुछ को मदद करता हूँ।
शायद 
दुख के बाद सुख आता है,
यह तो चलता ही रहता है।
कर्मयोगी कहाँ घबराता है?
वह सदा हँसता ही रहता है।

******************

कहानी मधुर प्रेम की..!

सूर्योदय हुआ था अभी अभी ;
दरवाजे पर घंटी बजी तभी।
खुला डाक्टर साहब का दरवाजा;
वहाँ एक वयोवृद्ध खड़ा पाया।

फिर साहब की श्रीमती जी आईं,
वृद्ध को देखते ही वह मुस्काईं।

बोली दादा क्या है बात ?
कैसी कटी आज आपकी रात?
इतने सबेरे आप जो आए,
है कौन सी वह बात ?
क्यों कोई नहीं आए,
हैं आपके साथ?
मेरे द्वार आप हैं आए,
ये है आपकी मेहरबानी ;
पर यह तो आप ही बताएँ ,
आपको कौन सी है परेशानी?

बोला वृद्ध, 
अंगुठे के टांके कटवाने हैैं;
फिर खुद को, 
कहीं और पहुंचाने हैैं।

वह वृद्ध डाॅक्टर का पड़ोसी था;
इसीलिए वह कुछ हितैषी था।

डॉक्टर ने फिर अंगुठे की पट्टी खोली;
फिर कुछ मधुर स्वर में पत्नी बोली।
आपका घाव अब भर गया है;
फिर कौन सा डर घर कर गया है। 
आइए हमारे साथ कुछ नाश्ता कर लें;
आपके लिए भी कुछ आया है।
आपकी कुछ तकलीफ हर लें,
आपको जो संकट का कुछ साया है। 
आपको गर कहीं है जाना तो;
मैं छोड़ दूँ उनके द्वारे;
कुछ पुण्य का भागीदार बना तो,
जीवन धन्य हो जाए हमारे।

डाक्टर बड़ा दयालु था, 
वह बड़ा ही श्रद्धालु था।
बिल लेकर तो सभी उपचार करते हैं, 
पर दिल देकर कौन उपकार करते हैं?

कहा वृद्ध ने 
मैं तो यहाँ नास्ता कर लूँ ,
अपना पेट यहाँ मैं भर लूँ।
पर उन्हें नास्ता कौन कराएगा?
कोई मुझे बताएगा?
घर पर मेरे कोई नहीं हैं, 
मेरी पत्नी अस्पताल में बीमार पड़ी है,
उनको वहाँ कौन संभालेगा?
इसलिए अभी तो मैं घर जाऊँगा;
फिर मैं भोजन पकाऊँगा;
और तब अस्पताल पहुंच कर;
उनके साथ ही मिलकर खाऊँगा।

कहा वृद्ध ने,
मेरी पत्नी मुझसे,
बहुत प्यार करतीं थीं,
वह तो बस मेरे बिना, 
कभी नहीं रहतीं थीं।
अब उसे अल्जाइमर हो गया है, 
अब मेरा घर उदास हो गया है। 
अब उसकी याददाश्त चली गई है, 
इसीलिए पाँच साल से वह मुझे भूल गई है।
रोज सुबह अस्पताल जाता हूँ, 
फिर उसको नास्ता खिलाता हूँ। 
वह फटी आँखों से मुझे निहारती है, 
मानो आंसू भरी नेत्रों से मुझे पुकारती है।
मैं उसके लिए अब अनजाना हूँ,
पर मैं उसका पहले से ज्यादा दीवाना हूँ।

यह कहते हुए 
वृद्ध की आँखों में आंसू आ गए,
डाक्टर दम्पति भी सुनते हुए 
भाव विभोर हो गए।

दम्पति ने कहा 
आप रोज कई बार वहाँ जाते हैं, 
वृद्ध होकर भी कहाँ थकते हैं?
वे आपको नहीं जानतीं, 
फिर भी आप नहीं उबते हैं?
क्या आपके बेटे नहीं हैं?
यदि हैं तो फिर वे कहाँ रहते हैं?

फिर वृद्ध ने जो जवाब दिया 
सुन हृदय में एक अफ़सोस हुआ।
 
मैं हूँ देश का बड़ा आभारी;
जो था सेना में एक अधिकारी।
वहीं से कुछ पेन्सन मिलते हैं;
जिससे घर-परिवार चलते हैं।
हमने बेटे को बहुत पढ़ाया,
एक दिन उसने मुझे बहुत सुनाया।
फिर हमें छोड़ चले गए परदेश, 
बहुत पढ़ा लिखा था साब,
इसलिए नहीं भाया अपना देश।
माँ पड़ गई उसी से बिमार;
कहाँ हुआ बेटे का दीदार?

एक अकेला यहाँ मैं ही पड़ा हूँ, 
पर मैं पत्नी संग हरवक्त खड़ा हूँ। 
उसने जीवन में मेरी,
सदा ही सेवा की है, 
इसलिए ॠण चुकता करने की, 
बस मैंने भी कोशिश की है।  
पर मन भर जाता है उसे देखकर ,
जब उसे बिस्तर पर पड़े देखता हूँ। 
सोचता हूँ अगर वह यहाँ न होती, 
तो शायद मैं भी बिस्तर पकड़ लेता, 
इसी सोच से फिर ताकत आती है,
फिर अपने काम में लग जाता। 
उसका पिछले प्रेम से ही
आज मुझमें शक्ति आती है, 
और यही से ही
मुझमें उसके प्रति भक्ति लाती है। 
रोज उससे मिलने जाना,
उसके साथ ही नास्ता करना,
उसे अपने हाथों से खिलाना,
इसी में आनन्दित रहता हूँ, 
जो किया था उसने पहले
वही तो रिश्ता निभाता हूँ।
उसका दर्द भरा चेहरा,
सम्मोहित कर जाता है, 
उसी सम्मोहन में मेरा, 
प्रेम प्रवाहित हो जाता है।  
पारिवारिक जीवन में,
स्वार्थ एक अभिशाप है, 
जबकि प्रेम अटूट होता है,
जो आपसी विश्वास है।

वृद्ध ने कहा, 
वह नहीं जानती कि
मैं कौन हूँ, 
पर मैं तो जानता हूँ कि 
वह कौन है?

इतना कहते ही वृद्ध की,
आँखों से निकले अश्रुधार,
आंखें भर आयीं दम्पति की,
वे भी हो गए वहाँ लाचार।

प्रेम कम हो जाने से ही 
परिवार टुटता है,
वर्तमान समाज में बस
यही तो कुछ दिखता है। 

कहानी तो खत्म हो जाती है, 
पर वृद्ध का यह कहना कि 
वह नहीं जानती मैं कौन हूँ 
पर मैं तो जानता हूँ कि वह कौन है?
दिल में अथाह दर्द जगा जाता है।
प्रेम प्रवाहित कर जाते हैं, 
जिसमें सारे रिश्ते समाहित हो जाते हैं। 

अपने वो नहीं,
जो तस्वीर में साथ दिखे,
अपने तो वे हैं 
जो तकलीफ में साथ दिखे।

महल बनाए तो क्या हुआ, 
परिवार नहीं संग कोय;
ढ़ाई अक्षर प्रेम का, 
गढ़े सो परिवार होय।

कहानी कैसी लगी,
यह मैं नहीं जानता हूँ? 
पर पारिवारिक प्रेम का संदेश दे गई, 
इतना तो मैं जानता हूँ। 

******************

हास्य व्यंग्य :- नारी रहे नर पे भारी..!

अक्ल बँट रही नर नारी को;
पहूँच रहे वे ब्रम्हा के दरबार में; 
जल्दी भी क्या थी बेचारी को;
नारी सब व्यस्त थीं श्रृंगार में।

नारियों का स्वभाव तो देखो;
श्रृंगार प्रेम का भाव तो देखो;
अहम फैसला था जीवन का;
पर उनका भटकाव तो देखो।

बड़ी लम्बी थी लगी कतार;
अक्ल बँटने की लगी बाजार;
पर कोई नारियाँ वहाँ नहीं थीं;
ढूंढने निकला यम का सरदार।

ढ़ूंढ़त अब थक गई थी अँखियाँ;
ब्यूटीपार्लर में पड़ी थी सखियाँ;
खुब सज सँवर रही थी कि वो;
अपनी ही कर रही थी बतियाँ।

सभी मस्त थीं गपशप करने में;
सभी व्यस्त थीं मेकअप करने में;
अब आएगी बस उनकी ही बारी;
सभी त्रस्त थीं बकझक करने में।

अक्ल बड़ी है या कोई भैंस;
कहो तो नारियों में आए तैश;
यही बात जब यम ने समझाया;
आयीं वे गाली-गलौज से लैस।

उधर अक्ल सारे ही बँट गए थे;
पुरूष पहले से ही पहुंच गए थे;
प्रेम से श्रृंगार कर पहुंची महिलाएँ;
अब चहूँओर शोरगुल मच गए थे।

सूचना हुई अब हुए ब्रह्मा परेशान;
नारियों ने नहीं पाया कोई वरदान ;
अक्ल स्टाॅक खत्म बोर्ड लगा था ;
फिर नारियों ने मचाया घमासान।

बोले ब्रम्हा कहीं जाना होता है;
तो पहला काम सजना होता है;
तब नारियाँ पीछे छुट जातीं हैं;
फिर बाद में क्यों लड़ना होता है?

बस शुरू हुआ नारी आन्दोलन;
सबके हाथ में था एक एक बेलन।
बोली जग आधा भाग हमारा है;
हम लेके रहेंगे यही बस नारा है।

ब्रम्हा को यह तनिक ना भाया;
नारी क्रोध देख दाढ़ी खुजलाया;
बोला देता हूँ तुम्हें ऐसा वरदान;
अक्लमंद नर भी रहे परेशान।

अक्लमंद नर की मति मारी जाए;
यदि होठों पे थोड़ी भी हँसी आए;
उससे भी गर बात ना बने तो;
जार बेजार बेचारी रोती जाए।

बात बात पर झगड़ा करेगी नारी;
फिर भी नर होगा तेरा आभारी;
जो भी नर तेरा अमंगल करेगा;
उसके जीवन में सदा दंगल रहेगा।

कहत हास्यव्यंग्य कवि सुबोध;
हे अक्लमंद नर! ना बनो अबोध।
जो नारी भाव से बस बच जाएगा;
वही दुर्लभ नरप्राणी कहलाएगा।

सुनो नर मत करियो होशियारी;
सदा रहो बस नारी का आभारी ;
अक्ल नहीं फिर भी क्या समझो;
नर पर रहे सदा है नारी ही भारी।

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दुनियाँ बड़ी अजीब है..!

ये दुनियाँ बड़ी अजीब है,
सब कुछ मिलना कहाँ नसीब है;
चाहत तो होती है पाने की;
पर वह आता कहाँ करीब है।

धन दौलत से है जो भरपूर ;
पर दया भाव का मन नहीं;
दया भाव वाले होते मजबूर; 
कि खर्चने का उन्हें धन नहीं।

जिसकी आँखों में नींद है;
उसे अच्छा बिस्तर नसीब नहीं;
जिन्हें बिस्तर का आनंद है;
बस नींद उसके करीब नहीं।

जिनसे हम रिश्ता रखना चाहते;
उन्हें रिश्तों की है कद्र नहीं;
जो रिश्तों की कद्र करना जानते;
उनसे रिश्ता रखने की फिक्र नहीं।

जिनके पास बस भोजन है;
उनके संग भूख कहाँ करीब है;
जिन्हें पेट पीठ में भूख है;
उन्हें भोजन कहाँ नसीब है।

इच्छाएँ पूरी हों तो मोह बढ़ता है;
न पूरी हों तो बस क्रोध बढ़ता है;
बस हर स्थिति में धैर्य जरूरी है;
धैर्य खोने से विझोभ बढ़ता है।

****************

हनुमान जन्मोत्सव..!
           भाग-1
जो भूत भी,भविष्य भी;
चिरंजीव हैं, हनुमान भी;
जयन्ती क्यों,जन्मोत्सव कहो;
जो वर्तमान हैं,  विद्यमान भी।

भक्त भी, भगवान भी;
विनम्र भी, विद्वान भी;
निष्काम भक्ति से महान हैं;
रौद्र रूप, रूद्र समान  भी।

अपार शक्ति भी, बलवान  भी;
विलक्षण भक्ति व गुणवान भी;
सानिध्य भी श्रीराम का, 
है ब्रह्मा का वरदान भी।

बल  बुद्धि  विद्या  अपार भी;
दासत्व बोध  का संस्कार भी।
तुम दिव्य  भी,  तुम ज्योति भी;
तुम रामकंठ के अद्भुत मोती भी।

तुम हनुमान रूप सखा भी, 
तुम शिव  स्वरूप गुरू भी;
तुम्हीं पर खत्म रामकथा  भी, 
और तुम्हीं से है बस शुरू भी।

है शिव शक्ति  अपरंपार भी;
शस्त्र शास्त्र सिंदूर श्रृंगार भी;
भगवान का अवतार भी;
अधर्म का  प्रतिकार भी।

कहते हैं कि तुझमें कितना बल है;
बस तुम्हें याद दिलाना पड़ता है;
देखते नहीं यहाँ कितना छल है;
तुम्हें यह क्यों बताना पड़ता है?

याद दिलाए कवि सुबोध भी,
तुम हो बड़े बलशाली भी;
रामभक्ति का है आमोद भी;
तुम हो बड़े भाग्यशाली भी।

भाग-2

आज धरा अम्बर है उन्नत,
फिर भी हम रोते भय वियोग से;
अब तुम ही कुछ करो हनुमत,
अपने बल बुद्धि के प्रयोग से।

विराम लगाओ सारे बहस पर ,
जिससे मानवता है परेशान;
आज तुम्हारे प्राकट्य दिवस पर,
पुकारूँ संकटमोचक हे हनुमान।

देखो कैसी बेरंग है यह दुनियाँ,
आज कितना बेबस है  इन्सान,
करने चले थे मुट्ठी में  दुनियाँ,
आज मुँह लटकाए है विज्ञान।

जब जब घिरे थे घोर संकट में, 
हमारे  आराध्य प्रभू  श्रीराम, 
तब तब भार उठाया था तुमने, 
तुम आए थे प्रभु के ही काम। 

आज संकट है उनकी सृष्टि को,
सुनो पवनपुत्र महावीर बलवान,
फलित करो सुबोधित भक्ति को,
अपने जन्मोत्सव पर हे हनुमान।

******************

   माता का दरबार..!
( तर्ज- दुल्हे का सेहरा )

आज माता का दरबार सुहाना लगता है-2
हम भक्तों का दिल दीवाना लगता है। 
नेत्र लाल भृकुटी विकराल भी है लेकिन; 
पर उनका यह अवतार पुराना लगता है। 
माता का दरबार सुहाना लगता है;
हम भक्तों का दिल दिवाना लगता है।

तुम गौरी शिव शंकर प्यारी दुख भयहारिणी है; 
नमो नमो हे मां जगदंबे तुम जगतारिणी है; निरंकार है ज्योति तुम्हारी शत्रु निवारिणी है;
सुमरों चित से तुम्हें भवानी तुम कल्याणी है।
तेरे बिना घर बार बेगाना लगता है-2 
बस तेरा ही दरबार सुहाना लगता है।
आज माता का दरबार सुहाना लगता है ;
हम भक्तों का दिल तो दीवाना लगता है।

दुर्गा दुर्ग विनाशिनी मां तेरे दर आया हूँ;
भक्ति के हर भाव में मईया थाल सजाया हूँ;-2 
दर्शन दर्शन दर्शन दर्शन दर्शन दर्शन 
दर्शन दो हे मां जगदंबे आश लगाया हूँ; 
धूप दीप नैवेद्य आरती भोग लगाया हूँ। 
मुझको तो यह गीत पुराना लगता है-2
बस तेरे संग प्रीत सुहाना लगता है। माता का दरबार सुहाना लगता है;
हम भक्तों का दिल दीवाना लगता है;
नेत्र लाल भृकुटी विकराल भी है लेकिन; 
उनका यह अवतार पुराना लगता है।
माता का दरबार सुहाना लगता है;
हम भक्तों का दिल दिवाना लगता है।


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हिन्दू नववर्ष..!

भारतीय नववर्ष का प्रथम विहान;
बासंती माधुर्य से पुलकित जहान;
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ही नववर्ष है;
आओ मनाएँ हम समस्त सुजान। 

ब्रह्मा ने सृष्टि का किया शुभारंभ;
नवरात्र-पूजन का होता है प्रारंभ;
आराध्य श्रीराम का मिले आशीष;
तभी तो हुआ नववर्ष का आरम्भ।

धरा से अम्बर तक हर्ष है;
प्राकृत नैसर्गिक उत्कर्ष है;
परम वैभव प्राप्त भारतवर्ष है;
बस यही तो अपना नववर्ष है।

******************

खतरनाक हास्य व्यंग्य..!
घर-घर की कहानी :- बात का बतंगड़..!
एक दिन की बात है।पत्नी मायके जाने की जिद कर रही थी पर थोड़ी घर की व्यस्तता के कारण बाद में जाने को कहकर पति ने पत्नी से जो किचन में थी कुछ माँगने के लिए जोर से आवाज लगाई।अब सुनते हैं नोक-झोंक:-
पति - अजी सुनती हो ।
पत्नी - इतना जोर से बोलते हो लगता है मैं एकदम से जन्म से ही बहरी हूँ। धीरे नहीं बोल सकते क्या?
पति - मैंने यह कब कहा?
पत्नी - नहीं कहा तो अब कह लो तुम्हारी यह भी अधूरी हसरत पुरी हो जाएगी।
पति - अरे भागवान !
पत्नी - सुनो जी ! मुझे भागवान मत कहा करो ।तुमसे शादी कर मेरे करम फूट गए और तुम मुझे भागवान कहते हो।खबरदार यह अब दुबारा मत कहना।
पति - अच्छा छोड़ो; क्या मुझे एक कप चाय मिलेगी।
पत्नी - अच्छा किसको सुना रहे हो? मैं चाय तुम्हें नहीं दुँगी तो क्या पड़ोसन आकर बना देगी? ऐसा लगता है कि मैं तुम्हें चाय ही नहीं देती।एक कप क्या एक लोटा चाय बना दुंगी।लेकिन हल्ला मत करो।
पति - हे भगवान यह तो सीधे मुँह बात ही नहीं करती है।
पत्नी - हाँ मेरा मुँह  तो शुरू से ही टेढ़ा है।मैं थोड़े ना तुमसे गिड़गिड़ाने गई थी कि तुम मुझसे शादी करो। तुम्हीं तो दिनभर सड़क पर खड़े रहते थे। बात करते हो।
पति - तुमको क्या हो गया है आज कि बात का बतंगड़ बना रही हो।बकबक किए जा रही हो।
पत्नी - मैं बोलती हूँ।तुम बोलवाते हो।
पति - अरे भागवान क्या कहा मैंने सिर्फ और सिर्फ एक कप चाय ही तो मांगी थी मैंने।
पत्नी - क्या नहीं कहा तुमने। तुमने तो मुझे बहरी भी कहा।
पति - क्यों झूठ बोल रही है मैंने तुम्हें बहरी कब कहा?
पत्नी - तुमने नहीं कहा कि अजी सुनती हो ।
पति - अरे भागवान। 
पत्नी - अभी मैं चाय नहीं बना सकती।मैं नहाने जा रही हूँ।और सुनो बहुत देर लगेगी क्योंकि बालों में सैम्पू भी लगानी है।इसलिए खुद चाय बना लो।
पति - छोड़ो। 
पत्नी - और सुनो बच्चे को स्कूल पहूँचा दो । सिर्फ मेरे बच्चे नहीं हैं।कोई मैंने दहेज में नहीं लायी थी।हम दोनों ही भागीदार थे।
पति- क्या क्या बकती हो? कभी तो मीठा बोल लिया करो?
पत्नी - मतलब मैं मीठा नहीं बोलती ।मीठा नहीं बोलती तो  ये दो दो नमूने कहाँ से आ गए पड़ोस से मैं उठा लायी क्या?इससे ज्यादा मुझे मीठा बोलने की अब हिम्मत नहीं रही ।बात करते हो।
पति - तुम भूल रही हो कि -
पत्नी - क्या भूल रही हूँ?
पति - अरे बात तो पुरी होने दो।यही कि मैं तेरा पति हूँ।
पत्नी - अच्छा याद कराने के लिए धन्यवाद। लगता है कि मैं भूलकर अबतक इन्हें पड़ोसी समझ रहा था।
पति- तुम तो एकदम लड़ने पर उतर आयी हो।
पत्नी - लड़ने --- तुम लड़ने का मौका कहाँ  देते हो बार-बार पड़ोसी से लड़ना पड़ता है।
पति - छोड़ो मुझे नहीं चाहिए तुम्हारी चाय।
पत्नी - अब ज्यादा भोले मत बनो ।चाय बना देती हूँ पीकर जाना।
पति - गजब हो तुम। खामख्वाह लड़ती हूँ।
बिडम्बना तो देखिए उधर पत्नी किचन से ही इतना बोलते बोलते चाय भी बनाकर ले आई। फिर दोनों ने मिल बैठकर चाय पी ली।पति बच्चे पहूँचाने स्कूल गया और पत्नी नहाने ।
*नैतिकता जनहित में जारी*- लड़ाई करना स्त्रियों का जन्मसिद्ध अधिकार है।उनके इस अधिकार का हनन मत करें।यह कानूनन अपराध है। हँसना मना है।

************************

शहीद दिवस पर अभिव्यक्ति..!

राजगुरु, सुखदेव, भगत सिंह ;
माँ भारती के वे वीर सपूत ;
याद कहाँ रख पाया हमने;
स्मृति किया उनका नेस्तनाबूद।

माना कि आजादी मिली चरखे से;
बस उनकी शहादत भूला दिया;
गूँजा देश अहिंसा की चर्चे से;
इन शहीदों को कैसा सिला दिया?

बापू बाँधा करते थे बकरी को;
वह रस्सी हमें तो याद रहा;
पर फाँसी लगी थी जिससे इनको;
वह रस्सी कहाँ हमें याद रहा?

जब आता है भारत में 23 मार्च;
हम सिर्फ पुष्प अर्पित कर देते हैं;
हर योजना में और सभी हैं होते;
बस इन्हें ही विस्मृत कर जाते हैं।

क्या कुछ उन्हें अर्पण करें?
कैसे उन्हें नमन वंदन करें?
एहसान बहुत है उनके हमपर;
आओ सम्पूर्ण समर्पण करें।

शहीद दिवस पर माँ भारती के वीर सपूत सुखदेव,भगत सिंह और राजगुरु की शहादत को शत शत नमन वंदन। 

******************
वर्ष 1999 में यूनेस्को ने विश्व स्तर पर कवियों की सृजनशीलता तथा लेखन,पठन-पाठन,शिक्षण व प्रकाशन को सम्मान देने के उद्देश्य से प्रति वर्ष 21 मार्च को विश्व कविता दिवस की घोषणा की। यह वास्तव में यूनेस्को द्वारा साहित्यकारों व उनकी सृजनात्मक महिमा का सम्मान देना हमारा हौसला बढ़ाना है।
आज विश्व कविता दिवस पर यूनेस्को सहित सम्पूर्ण साहित्यकारों को शुभकामनाएँ।

इस अवसर पर मैं अपनी एक रचना प्रेषित करता हूँ जिसमें कविता के गुण धर्म और उसमें उपस्थित कविता के सम्पूर्ण भावों का दर्शाया गया है क्योंकि कवियों के मन में जो भाव आते हैं बस वही शब्द कागज पर लिखे जाते हैं :-

कविता के रूप 
                       (1)
अपने शब्दों को पिरोया है हमने कविता में;
मन के भावों को बताया है हमने कविता में;
ऐसे दुनियाँ में कई राग हैं सुने हमने;
उन्हीं रागों को सजाया है हमने कविता में।
         (2)
कविताओं में मन के भाव देखे जाते हैं;
उन्हीं भावों को तो शब्दों में लिखे जाते हैं;
ऐसे कई भाव आते जाते हैं चंचल मन में;
है वही भाव जो कविता में पढ़े जाते हैं।
          (3)
कुछ कविता में आंसूओं की धार होती है;
कई कविताओं में आत्मा हमारी रोती है;
हम भी इन्सान हैं कुछ दर्द है सहा हमने;
है वही दर्द जो कविता समेटे होती है।
         (4)
ऐसा नहीं कि सिर्फ है रोती कविता;
हास्य व्यंग का भी पुट है देती कविता;
कविताओं में है हर भाव समाहित होते;
है छायावाद से दुनियाँ को जगाती कविता।
        (5)
शब्दों की तेज धार में बहती कविता;
कवियों के मन के भाव को पढ़ती कविता;
हम उन्हीं शब्दों का रसपान किया करते हैं;
सदा साहित्य की सेवा में है रहती कविता।

********************

यह कविता लोकतंत्र के उन वाहकों के लिए है जो अपने फर्ज से विमुख हैं।ध्यान रहें यह सभी पर लागू नहीं होता है क्योंकि बहुत ऐसे हैं जो अभी भी कर्तव्यनिष्ठ हैं। इसलिए सभी माननीय अपनी अन्तरात्मा से ही पुछ लें।
कविता तो बस रंगोली है, बुरा ना मानो होली है..!

बुरा मान गए वो..!

हमने ही भेजा तुम्हें पर हमें ही सुना गए,
संसद का चौखट पहुँच हमें ही भुला गए..!
जनता हूँ ठगी जाती हूँ कुछ बोल देती हूँ,
कैसा अदब जब तुम हमें भूखे ही सुला गए..!! 

वो जो कुर्सी है बैठे हो हमने ही दी है तुम्हें,
बस थोड़ी सी ही हिलाया कि बुरा मान गए..!
उसे ही खाक कर रहे हो जिसने पहुँचाया तुम्हें,
बस यही कुछ जो सुनाया कि बुरा मान गए..!!
उस वक्त वादे तो बड़े बड़े किए थे तुमने,
वही याद दिलाया कि बुरा मान गए..!
लोकतंत्र मंदिर में गालियाँ देते सुना हमने,
बस हमने यही सुनाया तो बुरा मान गए..! 
सादे लिबास पर खून के छींटे देखा हमने,
वही दुनियाँ को दिखाया तो बुरा मान गए..!!

क्या करूँ तुमने ही तो दिखाए थे सपने,
उस वक्त वो तुम ही थे जो बने थे अपने..!
गलियों में घुमते तुम ही तो लगे थे गले,
जब आँखे खुली तो बस सिफर ही मिले..!!
तुमने ही तो किए थे हमें वो सारे वादे,
भला हम क्या करें जो तुम मुकर गए..!!

और अंत में,

आदतन हमने तो तुम्हें बस वोट दिया,
पर आदतन तुमने तो हमें ही चोट दिया..!
हमने तो जो कुछ भी दिया था तुम्हें,
आदतन तुमने बस सारा ही घोट लिया..!!


***********************

एक आवाज जो दिल से निकलती है..!
आप मंत्री, संतरी यहाँ तक कि प्रधानमंत्री तक बन सकते हैं पर इतना तो सत्य है कि आप कवि कदापि नहीं बन सकते। अरे कवि के शब्द तो आत्मा से  निकली आवाज है जिसका कनेक्शन प्रत्यक्ष रूप से ईश्वर से होता है जो किसी व्यक्ति विशेष को ही प्राप्त होता है। ईश्वर के चाहने पर ही उद्गार आते हैं और वही उद्गार कलमबद्ध होकर जमाने के लिए आ जाते हैं और फिर अपने अपने हिसाब से तालियाँ बटोरते हैं।यह बात अलग है कि लोग उसे अलग अलग चश्मे से देखते  हैं। लेकिन ईश्वर ने आपको जमाने को सही और झूठ की पहचान दिलाने के लिए ही शब्द दिये हैं जिसका प्रयोग आप निश्चित रूप से बेबाकी के साथ कर सकते हैं।विचारधारात्मक विसंगतियां हो सकतीं हैं । सबकी अपनी अपनी अभिव्यक्ति हो सकती हैं।परन्तु उसे आने तो दें।
   परन्तु आज लेखनी सिसकती है ।पन्नों पर उद्धरित होने को बेताब है पर जमाने ने उसे बाँध रखा है और वह बस फड़फड़ा कर रह जाती है।जब कोई कहता है मैं राष्ट्रवादी हूँ; मैं सेकुलरवादी हूँ;मैं न्यूट्रलवादी हूँ तो कहीं न कहीं उनके आत्मविश्वास को ठेस लगती है और फिर वही लेखनी सिर्फ और सिर्फ महज एक मनोरंजन का साधन बन कर रह जाती है।हम यह क्यों नहीं समझते कि हम सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं लिखते। हमारी लेखनी कुछ ऐसा क्यों न करे जो समाज कल्याण हेतु जागृत हों।चाहे आप जिस सोच के हों आप कवि हैं और इसे सामने आने दें।यह मत कहें कि यह नहीं हो वह नहीं हो,यहाँ यह न लिखें वह न लिखें। यदि ऐसी सोच है तो निश्चित रूप से आप कवि नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन के साधन हैं और तब फिर ईश्वरीय रूप नहीं हैं।
  हे भाई! चाहे कोई कुछ भी सोचे मैं तो वही लिखूँ जो मेरी आत्मा कहती है।
बंदिशों में डर डर कर जीना कोई जीना है यारो 
आप वो साहित्यकार हैं जो अपने शब्दों से दरिया की धार बदल सकते हैं;
आप वो शिल्पकार हैं जो अपने हुनर से पत्थर को मूरत में बदल सकते हैं;
आने दे उसे रूह की आवाज है वो मत देख कि जमाना क्या सोचता ;
आप वो कलाकार हैं जो अपनी विधाओं से सबकी व्यवहार बदल सकते हैं।



सुप्रभात, खतरनाक हास्यव्यंग्य से..!
1. 
समय बड़ा अजीब है भैया ,वह घायल करता है;
इसीलिए तो घड़ी में, फूल नहीं बस काँटे होते हैं।
2.
यदि जुते लटकाने भर से गाड़ी दुर्घटना से बच सकती है; 
तो भैया मैं तो अपने गले में जुता लटकाकर घुमूँ 
ताकि मेरी भी सदा के लिए जान बच जाए। 
3.
समय पर घर पहुँचने से- 
खाना गरम और पत्नी नरम मिलती है।
पर देर से घर पहुँचने  से- 
खाना नरम और पत्नी गरम मिलती है।
अर्थात 
एक तो खाना ठंड़ा और उपर से पत्नी का डंडा;
क्योंकि घर घर में बजता है बस उनका ही डंका ।
******************
( सुबोध कुमार झा "झारखंडी" द्वारा रचित रचनाओं व आलेखों के विस्तृत संग्रह को पढ़ने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें )


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आलेख :- रब नवाज़ आलम نامنگار :- ربنواز عالم

साहिबगंज की बेटी सीमा सिंह को बिहार में मिला गार्गी अचीवर्स अवार्ड..! साहिबगंज :- 15/03/2024. साहिबगंज शहर की बेटी सीमा सिंह को अंतरराष्ट्री...